न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-और रूपसे आदि लेकर चार तथा शब्द ये पांचों गुण नेत्रादि
बाह्यपांचों इन्द्रियोंसे ग्रहण होतेहैं अर्थात् चक्षुः, श्रोत्र, रसना, घ्राण, तथा त्वक् इन
पांचों बाह्य एक एक इन्द्रियसे यथाक्रम रूप शब्द रस गन्ध तथा स्पर्श ये पांच गुण
ग्रहण होतेहैं.
-गुरुत्वादृष्टभावनाः ॥ ९३ ॥
अतीन्द्रिया विभूनां तु ये स्युर्वैशेषिका गुणाः ॥
अकारणगुणोत्पन्ना एते तु परिकीर्तिताः ॥ ९४ ॥
भाषा-गुरुत्व अदृष्ट अर्थात् धर्माधर्म तथा भावनाख्य संस्कार ये चार गुण
किसी इन्द्रियसे ग्रहण नहीं होते अर्थात् इन चारोंका केवल अनुमानद्वारा लाभ
होता है. और आकाशादि विभु द्रव्योंके जो शब्दादि विशेष गुणहैं वे सब अकारण
गुण उत्पन्न हैं अर्थात् जैसे रूपादि कारणगुणोत्पन्न हैं वैसे ये नहीं हैं ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
विभूनामिति। बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना शब्दा
इत्यर्थः । अकारणेति। कारणगुणेन कार्ये ये गुणा उत्पद्यंते ते
कारणगुणपूर्वका रूपादयो वक्ष्यन्ते, बुद्ध्यादयस्तु न तादृशा
आत्मादेः कारणाभावात् ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
भाषा-भाव यह कि-“कारणगुणपूर्वकः कार्यगुणो दृष्टः २० अ० २ आह्नि १”
यह कणादमुनिका सिद्धान्त है; परन्तु यह विभुंके विशेषगुणोंमें नहीं घटता अर्थात्
जैसे रूपादि 'स्वाश्रय समवायिसमवेतगुणजन्यत्व' सम्बन्धसे अपने कारणके गुणो-
से उत्पन्न होतेहैं; वैसे बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म,
भावना तथा शब्द ये .दश कारणगुणसे उत्पन्न नहीं हैं.
कपालादि कारणगुणसे जो घटादिकार्यमें रूपादि गुण उत्पन्न होतेहैं वही कारणगु-
णपूर्वक कहलातेहैं. उनको हम आगे कहेंगे. बुद्धि आदि तो वैसे नहींहैं; क्योंकि
आत्माका तथा आकाशका कोई कारण नहीं है ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
अपाकजास्तु स्पर्शान्ता द्रवत्वं च तथाविधम् ॥
स्नेहवेगगुरुत्वैकपृथक्त्वपरिमाणकम् ॥ ९५ ॥
स्थितिस्थापक इत्येते स्युः कारणगुणोद्भवाः ॥
भाषा-अपाकज अर्थात् अग्निसंयोगसे न उत्पन्न होनेवाले रूप, रस, गन्ध,
तथा स्पर्श एवं अपाकज द्रवत्व, स्नेह, वेगाख्य संस्कार, गुरुत्व एकपृथक्त्व,