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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 350 में से

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पृष्ठ 246

२२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-‘स्पर्श’ शब्दसे यहां अनुष्णस्पर्शका ग्रहण करना. एवं मूलमें पठित
( एकपृथक्त्व ) यहां ‘त्व’ प्रत्ययका दोनोंके साथ सम्बन्ध करके ( एकत्व ) तथा
'पृथक्त्व’ ऐसे जान लेना. यहां प्रकृतमें ‘पृथक्त्व’ पदसे केवल एकपृथक्त्व वांछित है.
भवेदसमवायित्वमिति । घटादिरूपरसगन्धस्पर्शाः कपालादि-
रूपरसगन्धस्पर्शोभ्यो भवन्ति । एवं कपालादिपरिमाणादीनां घ-
टादिपरिमाणाद्यसमवायिकारणत्वम् । एवं शब्दस्यापि द्विती-
यशब्दं प्रत्यसमवायिकारणत्वम् । एवं स्थितिस्थापकैकपृथक्त्व-
योरपि बोध्यम् ।
भाषा-( भवेदसमवायित्वमिति ) घटादिके रूप रस गन्ध तथा स्पर्श कपाला-
दिकोंके रूप रस गन्ध तथा स्पर्शसे यथाक्रम उत्पन्न होतेहैं. ऐसेही कपालादिगत
परिमाणादिकोभी घटादिगत परिमाणादिके प्रति असमवायिकारणता है. ऐसेही
शब्दकोभी स्वाव्यवहितोत्तर उत्पन्न द्वितीयशब्दके प्रति असमवायिकारणता है. ऐसेही
स्थितिस्थापकाख्य संस्कारोंको तथा एकपृथक्त्वकोभी जानलेना अर्थात् कारणगत
संस्कार तथा एकपृथक्त्व ( कटादि ) चटाईआदि कार्यगत संस्कारोंके तथा एकपृ-
थक्त्वके जनक हैं.
–अथ वैशेषिके गुणे ॥ ९७ ॥
आत्मनः स्यान्निमित्तत्वं–
भाषा-जीवात्माके ( बुद्धि ) ज्ञानादि विशेषगुणोंमें गुणान्तरोंके प्रति नियमसे
निमित्तकारणताही रहतीहै.
निमित्तत्वमिति । बुद्ध्यादीनामिच्छादिनिमित्तत्वादिति भावः ।
भाषा-जीवात्माके ज्ञानादि विशेषगुण पूर्वोक्त युक्तिके अनुरोधसे इच्छादि
विशेषगुणोंके प्रति निमित्तकारणही स्वीकार कियेहैं.
–उष्णस्पर्शगुरुत्वयोः ॥
वेगेऽपि च द्रवत्वे च संयोगादिद्वये तथा ॥९८॥
द्विधैव कारणत्वं स्यात्–
भाषा-उष्णस्पर्श, गुरुत्व, वेगाख्यसंस्कार, द्रवत्व, संयोग तथा विभाग इन
छःमें ॥ ९८ ॥ असमवायि तथा निमित्तभेदसे दोतरहकी कारणता रहती है.