न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-केवल (चक्षुः) नेत्रइन्द्रियसे जिसका ग्रहण हो उसका नाम 'रूप' है. वह
रूप द्रव्यादिकोंकी उपलब्धिमें नेत्रइन्द्रियका सहायकभी है.
चक्षुरिति । रूपत्वजातिस्तु प्रत्यक्षसिद्धा। रूपशब्दोल्लेखिनी प्र-
तीतिर्नास्तीति चेत् । मास्तु रूपशब्दप्रयोगस्तथापि नीलपीता-
दिष्वनुगतजातिविशेषोऽनुभवसिद्ध एव । रूपशब्दाप्रयोगेऽपि
'नीलो वर्णः पीतो वर्णः' इति वर्णशब्दोल्लेखिनीप्रतीतिरस्त्येव ।
एवं नीलत्वादिकमपि प्रत्यक्षसिद्धम् ।
भाषा-' रूपं रूपं' इस अनुगत प्रत्ययसे रूपत्वजाति तो प्रत्यक्ष प्रमाणहीसे
सिद्ध है. शंका-ऐसी वस्तु तो संसारमें कोई प्रतीत नहीं होती, जिसमें केवल 'रूप'
शब्दका प्रयोग किया जाय किन्तु नीलपीतादि व्यक्तियां प्रतीत होती हैं. समा०-
मत हो किसी पदार्थमें केवल 'रूप' शब्दका प्रयोग, तथापि नीलपीतादि अनेक व्यक्ति-
योंमें एक अनुगत जाति विशेष तो अनुभवसिद्ध है. एवं नीलपीतादिव्यक्तियोंमें मत
हो अनुगतरूपेण 'रूप' शब्दका प्रयोग; तथापि "नीलो वर्णः, पीतो वर्णः" इस अनुगत
प्रत्ययसे ' रूप ' शब्दपर्यायवाचि ' वर्ण ' शब्दका प्रयोग तो होताही है. एवं रूप-
त्वकी व्याप्य नीलत्वादि जातियांभी प्रत्यक्षही सिद्ध हैं.
न चैकैका एव नीलरूपादिव्यक्तय इत्येकव्यक्तिवृत्तित्वान्नील-
त्वादीर्न जातिरिति वाच्यम् । 'नीलो नष्टो रक्त उत्पन्न' इत्यादि-
प्रतीतेर्नीलादेरुत्पादविनाशशालितया नानात्वात् । अन्यथैकनी-
लनाशे जगदनीलमापद्येत ।
शंका-नीलपीतादि व्यक्ति तो संसारमात्रमें एक २ ही है; इसलिये उन एक२में
रहनेवाले नीलत्वपीतत्वादि धर्म जातिरूप नहीं होसकते. समाधान-आमनिक्षिप्त
घटादिमें " नीलो नष्टो रक्त उत्पन्नः " इत्यादि प्रतीति होती है. इस प्रतीतिसे नील
पीतादि व्यक्तियोंको उत्पादविनाशवाली होनेसे उनमें अनेकता सिद्ध होती है.
( अन्यथा ) यदि संसारमात्रमें एकही नीलव्यक्ति अङ्गीकार करें तो उसके नाश
होनेसे शेष संसार नीलवर्णरहित होजाना चाहिये.
नच नीलसमवायरक्तसमवाययोरेव विनाशोत्पादविषयकोऽसा-
वेष प्रत्यय इति वाच्यम् । प्रतीत्या समवायानुल्लेखात् ।