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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 350 में से

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पृष्ठ 241

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २१७
हैं. इसलिये उनका वारण हुआ और कर्म कर्मसे भिन्न नहीं है, इसलिये उसकाभी
वारण हुआ और द्रव्य निर्गुण नहीं है इसलिये उसकाभी वारण हुआ.
निष्क्रियेति स्वरूपकथनं , न तु लक्षणं गगनादावतिव्याप्तेः ।
भाषा-मूलमें 'निष्क्रियाः' यह गुणोंका लक्षण नहीं है किन्तु स्वरूपमात्रका कथनहै.
आकाशादिकोंमें अतिव्याप्ति दोषसे दुष्ट होनेसे इसको लक्षण मानना उचितभी नहीं.
रूपं रसः स्पर्शगन्धौ परत्वमपरत्वकम् ॥ ८६ ॥
द्रवो गुरुत्वं स्नेहश्च वेगो मूर्त्तगुणा अमी ॥
भाषा-रूप, रस, स्पर्श, गन्ध, परत्व, अपरत्व, ॥८६ ॥ द्रवत्व, गुरुत्व, स्नेह, तथा
वेग, ये दश गुण मूर्त्तद्रव्यहीमें रहतेहै.
मूर्त्तगुणा इति । अत्र वेगेन स्थितिस्थापकोऽप्युपलक्षणीयः ।
अमूर्तेषु न वर्तन्त इत्यर्थः । लक्षणं तु तावदन्यान्यत्वमे-
वमग्रे ऽपि ।
भाषा-यहां वेगाख्य संस्कारसे स्थितिस्थापक संस्कारकाभी ग्रहण जानलेना
अर्थात् वहभी मूर्त्तद्रव्यहीमें रहताहै; यह सब अमूर्त्तद्रव्यमें कदापि नहीं रहते. इन
सबका अनुगत एकलक्षण ( तावत् ) एतद्भिन्न भिन्नत्वरूपही जानना चाहिये
अर्थात् इनसे भिन्न प्रपञ्चमात्रका भेद इन दशहींमें रहेगा ऐसेही आगेभी ऐसेही
लक्षण समझलेने.
धर्माधर्मौ भावना च शब्दो बुद्ध्यादयोऽपि च ॥८७॥
एतेऽमूर्तगुणाः सर्वे विद्वद्भिः परिकीर्तिताः ॥
अमूर्तगुणा इति । मूर्तेषु न वर्तन्त इत्यर्थः ।
भाषा-धर्म, अधर्म, भावनाख्य संस्कार, शब्द, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष,
और प्रयत्न ॥ ८७ ॥ ये दश गुण अमूर्त द्रव्यहीमें रहतेहैं. ऐसे विद्वान् लोगोंका
निश्चयपूर्वक कथन है अर्थात् ये मूर्त्तद्रव्योंमें कदापि नहीं रहते-इति ।
संख्यादयो विभागान्ता उभयेषां गुणा मताः ॥८८॥
उभयेषामिति । मूर्तामूर्तगुणा इत्यर्थः ॥ ८८ ॥
भाषा-संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, तथा विभाग, ये पांच गुण मूर्त तथा
अमूर्त दोनों तरहके द्रव्योंमें रहतेहैं ॥ ८८ ॥
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