न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २२१
परिमाण ॥ ९५ ॥ तथा स्थिति, स्थापकाख्य संस्कार ये सब ११ गुण कारण
गुणोंसे उत्पन्न होते हैं.
अपाकजास्त्विति । पाकजरूपादीनां कारणगुणपूर्वकत्वाभावाद-
पाकजा इत्युक्तम् । तथाविधमपाकजम् ॥ ९५॥ कारणगुणोद्भवा
इति । तथैकत्वमपि बोध्यम् ।
भाषा-पाकज रूपादिकोंकी उत्पत्ति कारणगुणपूर्वक नहीं है; इसलिये 'अपा-
कज' यह कहा है. मूलगत 'तथाविधम्' इसकाभी 'अपाकज' ही अर्थ है; वैसेही
एकत्वकोभी कारणगुणपूर्वकही जानना चाहिये.
संयोगश्च विभागश्च वेगश्चैते तु कर्मजाः ॥ ९६ ॥
भाषा-संयोग विभाग और वेगाख्य संस्कार ये तीन गुण कर्मसे उत्पन्न
होतेंहैं ॥ ९६ ॥
कर्मजा इति । यद्यपि कर्मजत्वं न साधर्म्यं घटादावतिव्याप्तेः,
संयोगजसंयोगेऽव्याप्तेश्च । तथापि कर्मजवृत्तिगुणत्वव्याप्यजाति-
मत्त्वं बोध्यम्, एवमन्यत्राप्यूह्यम् ॥ ९६ ॥
भाषा-यद्यपि चक्रभ्रमणादि कर्मजन्यत्व घटादिकोंमेंभी है. उनमें इन संयोगादि
तीनके लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी. एवं हस्त पुस्तकादिसंयोगसे उत्पन्न होनेवाले
काय पुस्तकादि संयोगजसंयोगमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; क्योंकि 'संयोगज-
संयोग' यह कर्मजन्य नहीं है किन्तु संयोगजन्य है तथापि (कर्मसे उत्पन्न होनेवा-
लोंमें रहनेवाली जो गुणत्वकी व्याप्य संयोगत्वादिरूपा जाति तादृशजातिमत्ता) इन
तीनके सिवाय और कहीं नहीं है ऐसेही और स्थलोंमेंभी ऐसेही जातिघटित लक्षण
करके निर्वाह करना उचित है. ॥ ९६॥
स्पर्शान्तपरिमाणैकपृथक्त्वं स्नेहशब्दके ॥
भवेदसमवायित्वं,-
भाषा-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, एकत्व, पृथक्त्व, स्नेह, और शब्द, इन
नवोंमें गुणान्तरोंके प्रति नियमसे असमवायि कारणताही रहती है.
स्पर्शान्तेति । स्पर्शोऽत्रानुष्णो ग्राह्यः । एकपृथक्त्वेत्यत्र त्वप्र-
त्ययस्य प्रत्येकमन्वयादेकत्वं पृथक्त्वं च ग्राह्यम् । पृथकपदेन
चैकपृथक्त्वं विवक्षितम् ।