न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९५
तस्स्वशक्यार्थशाब्दबोधं प्रति पदानां सामर्थ्यावधारणात् । वाक्ये
तु शक्तेरभावाच्छक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाऽपि नास्ति ।
भाषा-( किन्तु ) परन्तु ‘ लाक्षणिक ’ पद ( अनुभावक ) शाब्दबोधका जनक
नहीं है किन्तु लाक्षणिकार्थके शाब्दबोधमें ( पदान्तर ) घोषादि पदान्तर कारण हैं;
क्योंकि शक्तिसम्बन्धसे या लक्षणासम्बन्धसे उपस्थित जो ( इतरपदार्थ ) तीरादि
उस तीरादिके साथ अन्वित जो ( स्व ) घोषादिपद शक्यार्थ गोपालग्राम तादृश
तीराद्यन्वित गोपालग्रामविषयक शाब्दबोधके प्रति ( पदानां ) घोषादि पदोंका
सामर्थ्य निश्चय होताहै; शक्तपदही होताहै; वाक्य नहीं होता. इसलिये वाक्यमें
शक्तिका अभाव होनेसे शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणाभी वाक्यमें नहीं है.
यत्र गंभीरायां नद्यां घोष इत्युक्तं तत्र नदीपदस्य नदीतीरे लक्ष-
णा , गंभीरापदार्थस्य नद्या सहाभेदेनान्वयः क्वचिदेकदेशान्व-
यस्यापि स्वीकृतत्वात् ।
शंका-“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि वाक्यस्थलमें ‘ नदी ’ पदकी
नदीतीरमें लक्षणा माननेसे गम्भीरपदार्थका नदीरूप पदार्थके एकदेशके साथ
अन्वय मानना होगा अर्थात् नदीपदबोध्य जो ‘ नदीतीर ’ उसका एकदेश जो नदी
उसके साथ'गम्भीर'पदका अन्वय मानना होगा, परन्तु ऐसा माननेसे“पदार्थः पदार्थेना-
न्वेति न तु पदार्थैकदेशेन ” इस नियमके साथ विरोध होताहै और “ नीलो घटः ”
इत्यादि स्थलोंमें नीलपदार्थका घटपदार्थ एकदेश घटत्वादिमें अन्वय बोधवारणार्थ इस
नियमका माननाभी आवश्यक है; इसलिये “ गम्भीरायां नद्यां घोषः” इत्यादिस्थलमें
पदलक्षणाका असम्भव होनेसे वाक्यलक्षणाही माननी उचित है. समाधान-
“ गम्भीरायां नद्यां घोषः ” इत्यादि स्थलमें केवल ‘ नदी ’ पदकी नदीतीरमें लक्षणा
है और गम्भीरपदार्थका नदीके साथ अभेदान्वय है अर्थात् गम्भीराभिन्न जो नदी
तादृश नदीतीरमें घोष है; यह बोध हुआ. ( क्वचित् ) “ चैत्रस्य गुरुकुलम् ” इत्यादि
स्थलविशेषोंमें एकदेशअन्वयभी विद्वान् लोगोंके अभिमत है. यहां चैत्रोत्तरवर्त्ति षष्ठ्य-
र्थसम्बन्धका गुरुके साथ अन्वय है.
यदि तत्रैकदेशान्वयो न स्वीक्रियते तदा नदीपदस्य गंभीरनदी-
तीरे लक्षणा गंभीरापदं तात्पर्यग्राहकम् । बहुव्रीहावप्येवम् ।
तत्र हि चित्रगुपदादौ यद्येकदेशान्वयः स्वीक्रियते तदा गोपदस्य
१९६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
गोस्वामिनि लक्षणा गवि चित्राभेदान्वयः । यदि त्वेकदेशान्वयो
न स्वीक्रियते तदा गोपदस्य चित्रगोस्वामिनि लक्षणा चित्रपदं
तात्पर्यग्राहकम् ।
भाषा-परन्तु यदि यहां एकदेशान्वय न स्वीकार होय तो “ गम्भीरायां नद्यां
घोषः” इत्यादि स्थलमें 'नदी' पदकी गम्भीरनदीतीरमें लक्षणा करनी और 'गम्भीर'
पदको “ नदीपदं गम्भीरनदीतीरविषयकबोधजनकं भवतु ” इत्याकारक वक्ताकी
इच्छारूप जो तात्पर्य तादृश तात्पर्यका ग्राहक है. ऐसेही बहुव्रीहिसमासस्थलमेंभी
वाक्यके अवयवहीमें लक्षणा माननी उचित है. “ चित्रा गावो यस्यासौ चित्रगुः ”
इत्यादि बहुव्रीहिस्थलमें यदि एकदेशान्वय स्वीकृत होय तो 'गो'पदकी गैयोंके स्वामीमें
लक्षणा करनी और 'चित्रा'पदार्थका गोपदार्थके साथ अभेदान्वय करना परन्तु यदि
एकदेशान्वय न अभिमत होय तो गोपदकी चित्रगैयोंके स्वामीमें लक्षणा करनी और
‘ चित्र ’ पदको पूर्वोक्त रीतिसे वक्तृतात्पर्यका ग्राहक समझना.
एवमारूढवानरो वृक्ष इत्यत्र वानरपदस्य वानरावेशकर्मणि लक्ष-
णा, आरूढपदं च तात्पर्यग्राहकम् । एवमन्यत्रापि ।
भाषा-ऐसेही “ आरूढो वानरोऽयमसौ आरूढवानरो वृक्षः ” इत्यादि स्थलमें
'वानर' पदकी वानरके आरोहणरूप कर्ममें लक्षणा करनी और पूर्वोक्तरीतिसे 'आरूढ'
पद वक्तृतात्पर्यका ग्राहक समझना यही क्रम और और प्रयोग स्थलोंमेंभी जानलेना.
तत्पुरुषे तु पूर्वपदे लक्षणा । तथाहि । राजपुरुषादिपदे राज-
पदार्थेन पुरुषादिपदार्थस्य साक्षान्नान्वयो निपातातिरिक्तनामार्थ-
योर्भेदेनान्वयबोधस्याव्युत्पन्नत्वात्, अन्यथा राजा पुरुष इत्य-
त्रापि तथाऽन्वयबोधः स्यात् ।
भाषा-एवं तत्पुरुष समासस्थलमें पूर्वपदमें लक्षणा होतीहै अर्थात् पूर्वपद लाक्षणिक
होताहै. (तथाहि) जैसे “ राज्ञः पुरुषः राजपुरुषः ” इत्यादि षष्ठीतत्पुरुष समासस्थलमें
राजपदार्थके साथ पुरुषपदार्थका साक्षात् सम्बन्धसे अन्वय नहीं है;क्योंकि अव्ययनि-
पातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेद सम्बन्धसे अन्वय बोध (अव्युत्पन्न) असिद्ध है;
( अन्यथा ) यदि अव्ययनिपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंकाभी भेद सम्बन्धसे अन्वय-
बोध मानलिया जाय तो “ राजा पुरुषः ” इत्यादि स्थलोंमेंभी भेदसम्बन्धसे अन्व-
यबोध होना चाहिये.
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. १९७
पटो न घट इत्यादौ घटपटाभ्यां नञः साक्षादेवान्वयान्निपाता-
तिरिक्तेति नीलो घट इत्यादौ नामार्थयोरभेदसम्बन्धेनान्वया-
द्भेदेनेति ।
भाषा-“घटो न पटः” इत्यादि स्थलमें घटपटके साथ नञ् अर्थभेदका साक्षात् ही
अन्वय होताहै अर्थात् किसीप्रत्ययार्थके द्वारा नहीं होता; इसलिये नियममें निपाता-
तिरिक्त कहा. नञ् निपात है, इसीसे इसके योगसे भेदेन अन्वयबोध होसकताहै. परन्तु
निपातातिरिक्त नामार्थ नामार्थोंका भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध नहीं होसकता “नीलो
घटः ” इत्यादि स्थलोंमें नामार्थनामार्थोंका अभेदसम्बन्धसे अन्वय होताहै; इसलिये
नियममें भेदेन कहा अर्थात् निपातातिरिक्त नामार्थनामार्थका अभेदेन अन्वयबोध तो
सिद्धही है परन्तु भेदसम्बन्धसे अन्वयबोध अव्युत्पन्न है “एवं राजपुरुषः” इत्यादि-
स्थलमेंभी निपातातिरिक्त नामार्थोंकी उपस्थिति होती है. यहांभी भेदेन अन्वयबोध
नहीं होसकेगा और अभेदेन विवक्षित नहींहै इसलिये कोई उपायान्तर सोचना चाहिये.
न च राजपुरुष इत्यादौ लुप्तविभक्तेः स्मरणं कल्प्यमिति वाच्य-
म् । अस्मृतविभक्तेरपि ततो बोधोदयात् । तस्माद्राजपदादौ
राजसम्बन्धिनि लक्षणा, तस्य च पुरुषेण सहाभेदान्वयः ।
द्वन्द्वे तु धवखदिरौ छिन्धीत्यादौ धवः खदिरश्च विभक्त्यर्थद्वि-
त्वप्रकारेण बुध्यते तत्र न लक्षणा ।
शंका-“राजपुरुषः” इत्यादिस्थलमें राजपदोत्तरवर्त्ति लुप्त हुई षष्ठीविभक्तिके
स्मरणकी कल्पना कर उस विभक्तिके सम्बन्धादि अर्थद्वाराही राजाका तथा पुरुषका
परस्पर अन्वय होगा इसलिये पूर्वोक्त नियमके साथ विरोध नहींहै. समाधान-जिस
पुरुषको विभक्तिका स्मरण नहींभी होता अर्थात् प्रकृतिप्रत्ययानभिज्ञ पुरुषकोभी
(ततो) “राजपुरुषः” इत्यादि वाक्यसे शाब्दबोधका उदय होना अनुभवसिद्ध है.
(तस्मात्) इसलिये‘राजपुरुषः’ इत्यादिस्थलोंमें राजादि पदोंकी राजसम्बन्धिमें लक्षणा
मानके उस सम्बन्धीका पुरुषके साथ अभेदान्वय बोध माननाही उचित है.
“एवं राजसम्बन्ध्यभिन्नः पुरुषः” इत्याकारक शाब्दबोध होगा. एवं “धवखदि-
रौ च्छिन्धि” इत्यादि इतरेतरद्वन्द्वस्थलमें द्वितीयाविभक्तिके द्विवचनार्थ द्वित्वप्रकारसे
धव तथा खदिर दोनोंका बोध होताहै इसलिये वहां लक्षणा माननेकी अवश्य-
कता नहीं है.
१९८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
न च साहित्ये लक्षणीति वाच्यम् । साहित्यशून्ययोरपि द्वन्द्वद-
र्शनात् ।
मीमांसक-धव खदिर उभयमें रहनेवाला जो सहवृत्तित्वरूप साहित्य उस
साहित्यके आश्रयमें यदि 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो हानि क्या है?
समाधान-सहवृत्तित्वरूप साहित्यसे शून्य हिम विन्ध्यादिपदार्थोंकाभी " हिम
विन्ध्यौ " इत्याकारक ऐतरेतरयोगरूप द्वन्द्व देखा जाताहै इसलिये द्वन्द्वस्थलमें
उत्तरपदकी साहित्याश्रयमें लक्षणा माननी उचित नहीं है.
न चैकक्रियान्वयित्वरूपं साहित्यमस्तीति वाच्यम्।क्रियाभेदेपि
धवखदिरौ पश्य छिन्धीत्यादिदर्शनात् साहित्यस्याननुभवाच्च ।
तस्मात् साहित्यादिकं नार्थः । अतएव राजपुरोहितौ सायुज्य-
कामौ यजेयातामित्यत्र लक्षणाभावाद्द्वन्द्व आश्रीयते तस्मात्सा-
हित्यंनार्थः । किंतु वास्तवो भेदो यत्र तत्र द्वन्द्वः ।
शंका-हम सहवृत्तित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे यहां लक्षणा नहीं कहते किन्तु
एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यके तात्पर्यसे कहतेहैं. एवं छेदनरूपा जो एकक्रिया
तादृश एकक्रियान्वयित्व धव तथा खदिर उभयमें विद्यमान है. इस रीतिसे एक
क्रियान्वयित्वरूप साहित्यके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणा मान लीजाय तो क्या
हानि है? समाधान-" धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि प्रयोगस्थलमें क्रियाके
भेद होनेसेभी द्वन्द्व देखाजाताहै.भाव यह कि-एक क्रियान्वयित्वरूप साहित्य यदि
नियमसे इतरेतरयोगद्वन्द्वस्थलमें रहे तो उसके आश्रयमें 'खदिर' पदकी लक्षणाभी
मान लीजाय; परन्तु उसका तो "धवखदिरौ छिन्धि पश्य" इत्यादि क्रियान्वयस्थलमें
व्यभिचार प्रतीत होताहै. इसलिये साहित्यमें लक्षणा माननी उचित नहीं और
वास्तवमें एकक्रियान्वयित्वरूप साहित्यका " धवखदिरौ छिन्धि " इत्यादिवाक्यके
शाब्दबोधमें अनुभवभी नहीं होता. ( अतएव ) द्वन्द्वस्थलमें लक्षणाके अभाव होने-
सेही " राजपुरोहितौ सायुज्यकामौ यजेयाताम्-अर्थात् सायुज्यमुक्तिकी कामनावाले
राजा तथा पुरोहित दोनों यजन करें " इत्यादि वाक्यस्थलमें लक्षणाके अभावसे
द्वन्द्वका आश्रयण पूर्व आचार्यलोगोंने कियाहै. ( तस्मात् ) इसलिये साहित्य किसी
पदका अर्थ नहींहै किन्तु पदार्थद्वयका जहां वास्तवभेद होताहै वहां द्वन्द्वसमास
होताहै.
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २९९
न च नीलघटयोरभेद इत्यादौ कथमिति वाच्यम् । तत्र नीलप-
दस्य नीलत्वे घटपदस्य घटत्वे लक्षणा, अभेद इत्यस्य चाश्रया-
भेद इत्यर्थात् । समाहारद्वन्द्वे तु यदि समाहारोऽप्यनुभूयत इ-
त्युच्यते तदाऽहिनकुलमित्यादौ परपदेऽहिनकुलसमाहारे लक्ष-
णा पूर्वपदं तात्पर्यग्राहकम् ।
शंका-“नीलो घटः-इत्यत्र नीलघटयोरभेदः” इत्यादिवाक्यस्थलमें “नील-
घटयोः” यह द्वन्द्व कैसे हुआ? अर्थात् यह वाक्य असंगतभी नहीं और समासभी
“नीलश्च घटश्च नीलघटौ, तयोः नीलघटयोः ‘नीलो घटः’ इत्यत्राभेदः” यही
मानना होगा, फिर वास्तवसे पदार्थद्वयभेदस्थलमें द्वन्द्व होताहै यह नियम आपका
कहां रहा? समाधान-ऐसे स्थलमें ‘नील’ पदकी नीलत्वमें तथा ‘घट’ पदकी घटत्वमें
लक्षणा मानकर द्वन्द्व हुआ है और ‘अभेद’ यह शब्द आश्रयाभेदका बोधक है
अर्थात् ‘नीलत्वघटत्वाश्रययोरभेदः” यह वाक्यार्थ हुआ. एवं समाहारद्वन्द्व स्थलमें
यदि किसी विद्वान्को (समाहार) समुच्चयका अनुभवभी होता होय तो “अहिन-
कुलम्’ इत्यादि वाक्योंमें (पर) नकुलादिपदोंकी अहिनकुलसमाहारमें लक्षणा
माननी और (पूर्व) अहिआदि पदको पूर्वोक्त रीतिसे तात्पर्यका ग्राहक जानना
उचित है.
न च भेरीमृदंगं वादयेत्यत्र कथं समाहारस्यान्वयः, अपेक्षाबुद्धि-
विशेषरूपस्य तस्य वादनासम्भवादिति वाच्यम् । परम्परास-
म्बन्धेन तदन्वयात् ।
शंका-“भेरीमृदङ्गं वादय” इत्यादि स्थलमें समाहारका वादन क्रियामें
अन्वय कैसे होगा? क्योंकि अनेक पदार्थोंमें एकत्वावगाहन करनेवाली अपेक्षा बुद्धिही
विशेषरूप समाहारका वादन नहीं बनसकता. भाव यह कि-अभिघाताख्य संयोगा-
वच्छिन्नक्रिया वादनपदार्थ है. सो उसका अपेक्षाबुद्धिविशेषरूप समाहारमें होनाही
असम्भव है. समाधान-ऐसे स्थलमें ‘स्वाश्रयवृत्तित्व’ रूप परम्परासम्बन्ध
मानके वादनक्रियाका समाहारमें अन्वय है. यहां ‘स्व’ शब्दसे अपेक्षाबुद्धिविशे-
षरूप समाहार, उसका आश्रयविषयतासम्बन्धसे भेरीमृदङ्गादि तद्वृत्तित्व वादन-
रूपा क्रियाको इति एतादृशपरम्परासम्बन्धसे अन्वय होसकताहै.
एवं पञ्चमूलीत्यादावपि । परे त्वहिनकुलमित्यादावहिश्च नकुलश्च
बुध्यते प्रत्येकमेकत्वान्वयः, समाहारसंज्ञा च यत्रैकत्वं नपुं-
२०० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
सकत्वं च प्राणितूर्येत्यादिसूत्रेणोक्तं तत्रैव, अन्यत्रैकवचनमसाध्वि-
ति इत्याहुः ।
भाषा-एवं “ पञ्चमूली ” इत्यादि द्विगुअर्थसमाहारस्थलमेंभी उत्तरपदकी
समाहारमें लक्षणा तथा पूर्वपदको तात्पर्य ग्राहकत्व मानना उचित है और ( परेतु )
नवीन नैयायिक तो यह मानतेहैं कि-“अहिनकुलम् ” इत्यादि स्थलमें अहि तथा
नकुल दोनोंका बोध होता है किन्तु समाहारका बोध नहीं होता और एकवचन
बोधित एकत्वसंख्याका अहि तथा नकुल प्रत्येकके साथ अन्वय है; इसलिये
‘ अहिनकुलं ’ इत्यादि लक्ष समाहारद्वन्द्वका नहीं है; किन्तु समाहारसंज्ञा वहां होती
है, जहां एकवचनान्तता तथा नपुंसकता “ द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् २ । ४।२।
इत्यादि सूत्रसे बोधित होय. एवं समाहारके उदाहरण “ पाणिपादम् ” इत्यादि
जानने चाहिये. एवं ( अन्यत्र ) समाहारातिरिक्त द्वन्द्वस्थलमें यदि एकवचन होय
तो असाधु जानना चाहिये ( इत्याहुः ) यह सब नवीनोंका कथन है.
पितरौ श्वशुरावित्यादौ पितृपदे जनकदम्पत्योः श्वशुरपदे स्त्री-
जनकदम्पत्योर्लक्षणा । एवमन्यत्रापि । घटा इत्यादौ तु न लक्ष-
णा, घटत्वेन रूपेण नानाघटोपस्थितिसम्भवात् ।
भाषा-एवं “ पितरौ, श्वशुरौ ” इत्यादि एकशेष समासस्थलमें ‘ पितृ ’ पदकी
पुरुषके जनक माता पिता दोनोंमें लक्षणा तथा ‘ श्वशुर ’ पदकी स्त्रीके जनक
माता पिता दोनोंमें लक्षणा है. ऐसेही और स्थलोंमेंभी जानलेना ‘ घटाः ’ इत्यादि
प्रयोगस्थलमें लक्षणया नानाघटकी उपस्थिति नहीं है किन्तु ‘घट’ पदं उच्चारणसे
घटत्वेन रूपेणही नानाघट उपस्थितिका सम्भव होसकता है.
कर्मधारयस्थले तु नीलोत्पलमित्यादावभेदसम्बन्धेन नीलपदार्थ
उत्पलपदार्थे प्रकारः तत्र च न लक्षणा, अत एव निषादस्थपतिं
याजयेदित्यत्र न तत्पुरुषो लक्षणापत्तेः किंतु कर्मधारयो लक्ष-
णाभावात् ।
भाषा-एवं “ नीलोत्पलं ” इत्यादि कर्मधारयसमासस्थलमें नीलपदार्थ उत्प-
लपदार्थमें अभेदसम्बन्धसे प्रकार है. इसलिये यहांभी लक्षणा नहीं है. ( अतएव )
कर्मधारयस्थलमें लक्षणा नहीं है. इसलिये “ निषादस्थपतिं याजयेत ” इत्यादि
श्रुतिवाक्यस्थलमें निषादानां स्थपतिः निषादस्थपतिः ” इत्याकारक तत्पुरुषसमास
का आश्रयण विद्वान् लोगोंने नहीं किया है. क्योंकि तत्पुरुष माननेसे पूर्वोक्त
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०१
रीतिसे तत्पुरुषस्थलमें लक्षणाभी माननी पड़ेगी और लक्षणा जघन्यवृत्ति है. यदि
प्रकारान्तरसे शक्तिवृत्तिसे निर्वाह होय सके तो लक्षणा माननी उचित नहीं. एवं
“ निषादश्चासौ स्थपतिश्चेति निषादस्थपतिः ” इत्याकारक कर्मधारयसमासही
मानना उचित है; क्योंकि लक्षणा नहीं माननी पड़ती.
न च निषादस्य सङ्करजातिविशेषस्य वेदानधिकाराद्याजनासं-
भव इति वाच्यम्, निषादस्य विद्याप्रयुक्तेस्तत एव कल्पनात् ।
शंका-‘स्थपति’ शब्द स्वामीका वाचक है. एवं इस वाक्यमें कर्मधारयसमास
माननेसे निषादरूप स्थपतिकाही बोध होगा; परन्तु उसका प्रकृतमें उपयोग नहीं
क्योंकि निषादनामक संकरजातिविशेषको “ स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम् ” इस वचनसे
वेदपठनका अधिकार नहीं और अध्ययनविधि सिद्धज्ञानके न होनेसे उसको
याजनभी नहीं बन सकता. इसलिये तत्पुरुषसमासद्वाराही निषादोंके स्वामी किसी
ब्राह्मण या क्षत्रियका ग्रहण करना उचित है. एवं उसको याजनका सम्भव होनेसे
वाक्य सार्थक होसकता है. समाधान–निषादको याजनके लिये यथासम्भव
वेदविद्याप्रयुक्तभी होना चाहिये. इस वार्त्ताकी कल्पनाभी हम ( तत एव ) निषादके
प्रति श्रुतिबोधित याजनानुपपत्तिसेही करसकतेहैं.
लाघवेन मुख्यार्थस्यान्वये तदनुपपत्त्या कल्पनायाः फलमुख-
गौरवत्याऽदोषत्वादिति ।
शंका–निषादको वेदविद्याकी कल्पना करनेमें आपको गौरव होगा.समाधान–
कर्मधारयसमासद्वारा प्रथम मुख्यार्थके साथ अन्वय होनेके पीछे उस अन्वयकी
अनुपपत्तिसें निषादको विद्याकी कल्पना करनी फलमुखगौरव है; इसलिये वह दोष
कर नहीं है.
उपकुम्भमर्द्धपिप्पलीत्यादौ परपदे तत्सम्बन्धिनि लक्षणा पूर्वपदा-
र्थप्रधानतया चान्वयबोध इति । इत्थं च समासे न क्वापि शक्तिः
पदशक्त्यैव निर्वाहादिति ।
भाषा–एवं “ उपकुम्भम्, अर्द्धपिप्पली ” इत्यादि प्रयोगस्थलोंमें कुम्भ-
पिप्पली आदि परपदोंकी कुम्भपिप्पली आदिके सम्बन्धिमें लक्षणा माननी. एवं
“ कुम्भसम्बन्ध्यभिन्नं समीपं ” तथा “ पिप्पलीसम्बन्ध्यभिन्नमर्द्धं ” इत्याकारक
पूर्वपदार्थप्रधान शाब्दबोध ऐसे स्थलोंमें हो सकतेहैं. ( इत्थञ्च ) इस पूर्वोक्त रीतिसे
वैयाकरणोंके अभिमतसमासमें शक्ति कहींभी नहीं बन सकती; क्योंकि हरएकस्थल-
में समासघटकीभूत पदशक्तिलक्षणाहीसे निर्वाह होसकता है–इति ।
१७
२०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
आसत्तियोग्यताकांक्षा तात्पर्यज्ञानमिष्यते ॥८२ ॥
कारणं -
भाषा-आसत्ति, योग्यता, आकांक्षा और तात्पर्यज्ञान ये चार शाब्दबोधमें
कारण हैं ॥ ८२ ॥
आसत्तिरित्यादि । आसत्तिज्ञानं योग्यताज्ञानमाकांक्षाज्ञानं
तात्पर्यज्ञानं च शाब्दबोधे कारणम् ॥
भाषा-अर्थात् आसत्तिका ज्ञान योग्यताका ज्ञान आकांक्षाका ज्ञान और वक्ताके
तात्पर्यका ज्ञान ये चार ज्ञान शब्दमात्रके शाब्दबोधमें कारण हैं.
तत्रासत्तिपदार्थमाह, सन्निधानं त्विति-
भाषा-उनमें ' सन्निधानन्तु ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आसत्तिपदार्थको
कहते हैं.
-सन्निधानं तु पदस्यासत्तिरुच्यते ।
भाषा-पदोंकी परस्पर ( सन्निधि ) समीपताका नाम 'आसत्तिः' है.
यत्पदार्थस्य यत्पदार्थेनान्वयोऽपेक्षितस्तयोरव्यवधानेनोपस्थि-
तिः कारणम् । तेन 'गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन' इत्यादौ न
शाब्दबोधः ।
भाषा-जिस पदार्थका जिस पदार्थके साथ अन्वय अपेक्षित होय उन दोनोंकी
पदोंद्वारा (अव्यवधानेन) अव्यवहितरूपसे उपस्थापितिभी शाब्दबोधमें कारण है. इसलिये
“गिरिर्भुक्तं अग्निमान् देवदत्तेन” इत्यादि वाक्योंसे शाब्दबोध नहीं होताहै; क्योंकि
यहां गिरिपदार्थ तथा भुक्तपदार्थका परस्पर अन्वयबोध वक्ताके तात्पर्यका विषय नहीं
है.किन्तु गिरिपदार्थ तथा अग्निमान् पदार्थका परस्पर अन्वयबोध वक्ताके तात्पर्यका
विषय है परन्तु वे दोनों परस्पर अव्यवहित नहीं हैं .एवं ऐसे स्थलमें आसत्तिके न
होनेसे शाब्दबोधभी नहींहोता.
'नीलो घटो द्रव्यं पटः' इत्यादावासत्तिभ्रमाच्छाब्दबोधः । आस-
त्तिभ्रमाच्छाब्दभ्रमाभावेऽपि न क्षतिः।
भाषा-एवं जहां “नीलो घटो द्रव्यं पटः” इत्यादि वाक्यस्थलमें नीलपदार्थ
तथा पटपदार्थके परस्पर अन्वयबोधमें वक्ताका तात्पर्य है;वहां 'नील'पदकी तथा 'घट'
पदकीभी परस्पर आसत्ति नहींहै.भाव यह कि-वक्ताके तात्पर्यविशिष्ट पदोंकी परस्पर
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०३
सन्निधिका नाम 'आसत्ति' है. प्रकृतमें वक्ताका तात्पर्य तो 'नील' पदार्थका 'पट' पदार्थके
साथ अन्वयबोधका है और पदोंका परस्पर सन्निधान 'नील' पदका 'घट' पदके साथ
है;वह सन्निधान वक्तृतातपर्यशून्य होनेसे आसत्ति नहीं कहासकता, परंतु ऐसे स्थलमें
‘ नीलाभिन्नो घटः ” इत्यादि शाब्दबोध श्रोताको होताहै, वह केवल आसत्तिके
भ्रमसे समझना चाहिये. आसत्तिके भ्रमसे शाब्दबोधमें भ्रम नाभी होय तो हानि नहींहैः
ननु यत्र 'छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्तः' इत्युक्तं तत्रोत्तरपद-
स्मरणेन पूर्वपदस्मरणस्य नाशादव्यवधानेन तत्तत्पदस्मरणास-
म्भव इति चेत् । न। प्रत्येकपदानुभवजन्यसंस्कारैश्चरमस्य ता-
वत्पदविषयकस्मरणस्याव्यवधानेनोत्पत्तेः ।
शंका—आपने अव्यवधानसे पदोंकी उपस्थिति शाब्दबोधमें कारण कही;परन्तु
जहां “छत्री कुण्डली वासस्वी देवदत्तः ” इत्याकारक अनेकपदघटित वाक्य
वक्ताने कहाहै वहां ( २७ वी कारिका ) की व्याख्यामें प्रोक्त आपके “ योग्य
विभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्त्तिगुणनाश्यत्वात् ” इस सिद्धान्तानुसार उत्तरपदके स्मर-
णसे पूर्वपदके स्मरणका नाश होनेसे अव्यवधानरूपसे उत्तरपदके स्मरणका असम्भव-
है. समाधान—हरएक पदके अनुभवसे उत्पन्न हुए संस्कारोंसे अन्तमें होनेवाले पद-
विषयक स्मरणका अव्यवधानसे होना सम्भव है.
नानासन्निकर्षैरेकप्रत्यक्षस्येव नानासंस्कारैरेकस्मरणोत्पत्तेरपि
सम्भवात् । तावत्पदसंस्कारसहितचरमवर्णज्ञानस्योद्बोधकत्वा-
त् । कथमन््यथा नानावर्णैरेकपदस्मरणम् ।
भाषा—जैसे एकही कालमें घटचक्षुःसंयोग तथा पटचक्षुःसंयोगरूप नाना
सन्निकर्षोंसे “ इमौ घटपटौ ” इत्याकारक एकही प्रत्यक्ष होता है; वैसेही नाना
संस्कारोंसे एक स्मरणकी उत्पत्तिभी होसकती है; इसमें कोई बाधक नहीं है. पूर्व-
पदोंके संस्कारसहित जो अन्तिम वर्णका ज्ञान वही उस स्मरणमें उद्बोधक है. यदि
नानासंस्कारोंको एक स्मरणजनकता न मानी जाय तो ( कथमन््यथा ) नानावर्णोंके
प्रत्येक संस्कारोंसे नानावर्णगोचर एकपदका स्मरणभी कैसे होगा? अर्थात् नहीं होना
चाहिये. एवं ऐसे माननेसे सर्वत्र शाब्दबोधकी अनुपपत्ति होगी; इसलिये हरएक
स्थलमें पदजन्य पदार्थोंपस्थिति समूहालम्बनात्मकही शाब्दबोधमात्रमें कारण
माननी उचित है.
परंतु तावत्पदार्थानां स्मरणादेकदैव खले कपोतन्यायात् तावत्प-
२०४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
दार्थानां क्रियाकर्मभावेनान्वयबोधरूपः शाब्दबोधो भवतीति
केचित् । “वृद्धा युवानः शिशवः कपोताः खले यथाऽमी युगपत्
पतन्ति ॥ तथैव सर्वे युगपत् पदार्थाः परस्परेणान्वयिनो
भवन्ति ”।
भाषा-(परन्तु) यहां कई एक प्राचीन लोग ऐसे मानते हैं कि-उन उन पदजन्य
पदार्थोंके स्मरणसे एककालावच्छेदेन ही ‘ खले कपोतन्यायं’ से उन उन पदार्थोंका
क्रियाकर्मभावसे अन्वयरूप शाब्दबोध होजाता है अर्थात् जैसे वृद्ध युवा तथा बाल
अवस्थाके ( कपोत ) कबूतर ( खले ) सबीज केदारमें सभी एकही कालमें ऊपरसे
उड़ते २ गिरते हैं, वैसेही सभी पदार्थ एकही कालमें उपस्थित हुए परस्पर अन्वयको
प्राप्त होते हैं-इति ।
अपरे तु “ यद्यदाकांक्षितं योग्यं सन्निधानं प्रपद्यते । तेन
तेनान्वितः स्वार्थः पदैरेवावगम्यते” । तथा च खण्डवाक्यार्थ-
बोधानन्तरं तथैव पदार्थस्मृत्या महावाक्यार्थबोध इत्यप्याहुः ।
एतेन तावद्वर्णाभिव्यङ्ग्यः पदस्फोटोऽपि निरस्तः । तत्तद्व-
र्णसंस्कारसहितचरमवर्णोपलम्भेन तद्व्यञ्जकेनैवोत्पत्तेरिति ।
भाषा-(अपरेतु ) दूसरे कई एक आचार्य ऐसा कहते हैं कि-जो जो पद
परस्पर आकांक्षा योग्यता तथा सन्निधिके युक्त हैं, उन उन पदोंके साथ अन्वित
हुआ पदार्थभी उन पदोंसेही ज्ञात होजाता है. ( तथाच ) एवं खण्डवाक्यार्थबोधके
अनन्तर अर्थात् पदजन्य पदार्थबोधके अनन्तर वैसेही पदार्थस्मरणद्वारा महा-
वाक्यार्थबोध होता है. इस पूर्वोत्तर कथनसे वैयाकरणोंके अभिमत जो
(वर्णाभिव्यङ्ग्य ) वर्णोंसे बोधित पदस्फोट इसकाभी निरास जानलेना चाहिये;
क्योंकि पूर्व पूर्व वर्णोंके संस्कारसहित जो अन्तिम वर्णका उपलाभ, उस उपलाभ
को पदका व्यञ्जक माननेसेभी निर्वाह होसकता है.
इदं तु बोध्यम् । यत्र द्वारमित्युक्तं तत्र पिधेहीति पदस्य ज्ञाना-
देव बोधो न तु पिधानादिरूपार्थज्ञानात्, पदजन्यपदार्थोपस्थिते-
स्तच्छाब्दबोधे हेतुत्वात् । किञ्च क्रियाकर्मपदानां तेन तेनैव
सह साकांक्षत्वात् तेन क्रियापदं विना कथं शाब्दबोधः स्यात् ।
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०५
भाषा-( इदन्तु बोध्यम् ) इतना यहां औरभी विशेष जानना उचित है कि--
जहां वक्ताने ' द्वारं ' इतना मात्र कहा है, वहां ( पिधेहि ) अर्थात् 'बन्द करो'
इत्यादि पदके ज्ञानहीसे शाब्दबोध होता है किन्तु द्वारके ( पिधान ) निरोधनादिरूप
अर्थज्ञानसे शाब्दबोध नहीं होता;क्योंकि 'तत्तत्' पदजन्य 'तत्तत्' पदार्थ उपस्थितिको
तत्तत् शाब्दबोधमें हेतुता निश्चित है. ( किञ्च ) क्रियाकर्मादि पदोंकी उस उस विशेष
रूपहीसे परस्पर आकांक्षा देखनेमें आतीहै किन्तु " द्वारं कर्मत्वं, पिधानं कृतिः "
इत्याकारक विपरीत वाक्य योजनासे द्वारकर्मक पिधानात्मकान्वयबोध नहीं
होसकता एवं प्रकृतमेंभी ' पिधेहि ' इस क्रियापदके बिना केवल 'द्वारं ' इस
पदसे शाब्दबोध होना दुर्घट है.
तथा पुष्पेभ्य इत्यादौ स्पृहयतीति पदाध्याहारं विना चतुर्थ्यनु-
पपत्तेः पदाध्याहार आवश्यकः ।
भाषा-ऐसेही यदि ' स्पृहयति ' इत्यादि क्रियापदका अध्याहार न कियाजाय
तो 'पुष्पेभ्यः ' इत्यादि कर्मपदोंमें चतुर्थीविभक्तिका होनाभी दुर्घट है अर्थात्
'स्पृहेरीप्सितः । १ । ४ । ३६ । " इस अनुशासनसे कर्मत्वार्थक चतुर्थीका 'स्पृह-
यति ' आदिके योगहीसे विधान कियाहै; इसलिये हरएक साकांक्षित स्थलमें पदका
अध्याहार अवश्य करना चाहिये.
योग्यतां निर्वक्ति, पदार्थ इत्यादिना-
भाषा-'पदार्थे' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार योग्यताका निरूपण करताहै-
पदार्थे तत्र तद्वत्ता योग्यता परिकीर्तिता ॥८३॥
भाषा-एक पदार्थमें अपर पदार्थवत्ताका नाम योग्यता कहा है ॥ ८३ ॥
एकपदार्थेऽपरपदार्थसम्बन्धो योग्यतेत्यर्थः। तज्ज्ञानाभावाच्च 'व-
ह्निना सिञ्चति'इत्यादौ न शाब्दबोधः ।
भाषा-अर्थात् एक पदार्थमें अपरपदार्थके सम्बन्धविशेषका नाम योग्यता है.
उस योग्यताका ज्ञान जहां " वह्निना सिञ्चति " इत्यादि वाक्योंमें नहीं होता वहां
शाब्दबोधभी नहीं होता अर्थात् सेचनक्रियाकी जलमें योग्यता है वह्निमें नहीं;
इसलिये यहां शाब्दबोध नहीं होता.
नन्वेतस्या योग्यताया ज्ञानं शाब्दबोधात्प्राक् सर्वत्र न सम्भव-
ति वाक्यार्थस्यापूर्वत्वादिति चेत् । न । तत्तत्पदार्थस्मरणे सति
२०६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली-- [ शब्द-
क्वचित्संशयरूपस्य क्वचिन्निश्चयरूपस्यापि योग्यताया ज्ञानस्य
सम्भवात् ।
शंका-हरएकस्थलमें वाक्यार्थबोध अपूर्वही होता है; परन्तु योग्यताके प्रथम
कारणता माननेमें शाब्दबोधमें वह अपूर्वता नहीं रहती. इसलिये योग्यताज्ञानको
शाब्दबोधके पहले हरएक स्थलमें कारण माननेका कुछ काम नहीं है. समाधान-
हरएकस्थलमें 'तत्तत्'पदजन्य 'तत्तत्' पदार्थके स्मरण होनेसे योग्यताका ज्ञान कहीं
संशयरूपसे और कहीं निश्चयरूपसे शाब्दबोधके पूर्व अवश्य विद्यमान रहता है.
नव्यास्तु योग्यताया ज्ञानं न शाब्दज्ञाने कारणम्, 'वह्निना सिञ्च-
ति' इत्यादौ सेके वह्निकरणकत्वाभावरूपाऽयोग्यता(निश्चयेन
प्रतिबन्धान्न शाब्दबोधः। तदभावनिश्चयस्य लौकिकसन्निकर्षज-
न्यदोषविशेषाजन्यज्ञानमात्रे प्रतिबन्धकत्वाच्छाब्दबोधं प्रत्यपि
प्रतिबन्धकत्वं सिद्धम् । योग्यताज्ञानविलम्बाच्च शाब्दबोध-
विलम्बोऽसिद्ध इति वदन्ति ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
भाषा-और नवीनलोग तो यह कहतेहैं कि- योग्यताका “ ज्ञान शाब्दबोधमें
कारणही नहीं है. “वह्निना सिञ्चति” इत्यादि स्थलमें सेचनक्रियामें वह्निकरण-
त्वाभावरूप अर्थात् सेचनरूपा क्रिया वह्निसे नहीं होसकती इत्याकारक जो अयो-
ग्यताका निश्चय एतादृश निश्चयको विपरीत शाब्दबोधके प्रति प्रतिबन्धकता है;
क्योंकि पूर्वबाधस्थल उक्तरीतिसे अनाहार्याप्रामाण्यज्ञानानास्कन्दित तद्धर्मिक
तदभावका निश्चय लौकिकसन्निकर्षाजन्य तथा दोषविशेषाजन्य ज्ञानमात्रके प्रति
प्रतिबन्धक है. इसलिये शाब्दज्ञानके प्रतिभी प्रतिबन्धक होसकता है और योग्यता-
ज्ञानके विलम्बसे शाब्दबोधमें विलम्बभी किसी स्थलविशेषमें सिद्ध नहीं है. इस
लिये योग्यताका ज्ञान शाब्दबोधमें कारण नहीं है-इति ॥ ८२ ॥ ८३ ॥
आकांशां निर्वक्ति, यत्पदेनेत्यादि-
भाषा-‘यत्पदेन’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकांक्षाको कहतेहैं-
यत्पदेन विना यस्याऽननुभावकता भवेत् ।
आकांक्षा-
भाषा-जिस पदसे बिना जिस पदमें ( अननुभावकता ) शाब्दबोधजननकी
असमर्थता है उस पदकी उस पदके साथ आकांक्षा है.
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०७
येन पदेन विना यत्पदस्यानन्वयानुभावकत्वं तेन पदेन सह तस्या-
कांक्षेत्यर्थः। क्रियापदं विना कारकपदं नान्वयबोधं जनयतीति
तेन तस्याकांक्षा।
भाषा-अर्थात् जिस 'क्रियादि' पदसे विना जिस 'कर्मादिकारक' पदका
अन्वयबोध नहीं होसकता उस क्रियापदके साथ उस 'कारक' पदकी आकांक्षा है.
क्रियापदसे विना केवल 'कारक' पद अन्वय बोधका जनक नहीं होता. इसलिये
'क्रिया'पदके साथ 'कारक' पदकी आकांक्षा है.
वस्तुतस्तु क्रियाकारकपदानां सन्निधानमासत्त्या चरितार्थम्।
परंतु घटकर्मताबोधं प्रति घटपदोत्तरद्वितीयाकांक्षाज्ञानं कार-
णम्, तेन घटः कर्मत्वमानयनं कृतिरित्यादौ न शाब्दबोधः।
भाषा-और वास्तवसे तो क्रियाकारकादिपदोंकी अव्यवधानरूपसे सन्निधि .
अंशका लाभ पूर्वोक्त आसत्तिसेही होचुका है. इसलिये क्रियाकारक पदोंकी
आकांक्षाका पृथक् वर्णन करना उचित नहीं है (परन्तु) तथापि प्रत्ययमें प्रकृति
उत्तरत्वरूप आकांक्षाज्ञान आसत्तिसे पृथक्रूपेण शाब्दबोधमें कारण है; इसलिये
आकांक्षा ज्ञानभी पृथक् कारण है. जैसे घटनिष्ठ कर्मताबोधके प्रति 'घट' पदके
अव्यवहित उत्तर (अमादि) द्वितीयाविभक्तिरूप आकांक्षाका ज्ञान शाब्दबोधमें कारण
है एवं 'घटः कर्मत्वं आनयनं कृतिः' इत्यादि विपरीत वाक्यस्थलोंमें “घटमा-
नय” इत्यादि साकांक्षवाक्यके सदृश शाब्दबोध नहीं होसकता.
'अयमेति पुत्रो राज्ञः पुरुषोऽपसार्यताम्'इत्यादौ तु पुत्रेण सह
राजपदस्य तात्पर्यग्रहात्तेनैवं सहान्वयबोधः। पुरुषेण सह ता-
त्पर्यग्रहे तु तेन सहान्वयबोधः स्यादेव।
भाषा-एवं“अयमेति पुत्रो राज्ञः पुरुषोऽपसार्यताम्” इत्यादि उभयाकांक्षावाक्य
स्थलमें वक्ताके तात्पर्यज्ञानानुरोधसे शाब्दबोध होता है. भाव यह कि-यहां
'राज'पद उत्तरसम्बन्धविशेषकी बोधिका षष्ठीविभक्ति राजपदार्थका पुत्र तथा पुरुष
दोनोंमें अन्वयबोधन करतीहै. यदि पुत्रके साथ अन्वयमें वक्ताका तात्पर्य होय तो
वाक्यार्थ यह होगा कि-'यह राजाका पुत्र आताहै, आगेसे जनसमुदायको कनारे
करो' और यदि पुरुषके साथ अन्वयमें वक्ताका तात्पर्य होय तो वाक्यार्थ यह होगा
कि-राजाका पुरुष आताहै आगेसे अपने पुत्रको कनारे करो. एवं 'पुत्र'पदके साथ
२०८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
‘ राज ’ पदका तात्पर्यग्रह होनेसे पुत्रके साथही अन्वयबोध होताहै और पुरुषके
साथ तात्पर्यग्रह होनेसे पुरुषके साथही अन्वयबोध होताहै-इति ।
तात्पर्यं निर्वक्ति, वक्तुरिच्छेति-
भाषा-‘ वक्तुरिच्छा ’ इत्यादि ग्रंथसे तात्पर्यार्थ कहते हैं-
-वक्तुरिच्छा तु तात्पर्यं परिकीर्तितम् ॥८४॥
भाषा-वक्ताने श्रोताके प्रति यादृश वाक्यार्थबोधनकी इच्छासे वाक्योच्चारण
कियाहै उस इच्छाका नाम तात्पर्य है ॥ ८४ ॥
यदि तात्पर्यज्ञानं कारणं न स्यात्तदा ‘सैन्धवमानय’ इत्यादौ
क्वचिदश्वस्य क्वचिल्लवणस्य बोधो न स्यात् । न च तात्पर्यग्रा-
हकप्रकरणादीनामेव शाब्दबोधे कारणत्वमस्त्विति वाच्यम्,
तेषामननुगमात् ।
भाषा-शाब्दबोधमें यदि वक्ताका तात्पर्यज्ञान कारण न होय तो “सैन्धवमा-
नय” इत्यादि वाक्योंसे कहीं यात्राप्रसंगमें ‘अश्व’ का तथा कहीं भोजनादिप्रसंगमें
‘लवण’ का बोध होताहै, वह नहीं हुआ चाहिये. शंका-वक्तृतात्पर्यके ग्राहक जो
प्रकरणादि यदि उनहीको शाब्दबोधके प्रति कारण मानकर निर्वाह होसके तो
पृथक् तात्पर्य माननेकी क्या आवश्यकता है? समाधान-प्रकरणादिकोंका एक-
रूपसे अनुगम होना कठिन है.
तात्पर्यज्ञानजनकत्वेन तेषामनुगमे तु तात्पर्यज्ञानमेव लाघवा-
त्कारणमस्तु । इत्थं च वेदस्थलेऽपि तात्पर्यज्ञानार्थमीश्वरः
कल्प्यते ।
शंका-वह सभी स्वस्वस्थलमें तात्पर्यज्ञानके जनक हैं इसलिये ‘ तात्पर्यज्ञान-
जनकत्वेन’ उन सबका अनुगम होसकताहै. समाधान-ऐसे गुरुभूत अनुगमसे तो
तात्पर्यज्ञानहीमें कारणता माननेमें लाघव है. ( इत्थञ्च ) ऐसेही वेदवाक्योंमेंभी
तात्पर्यज्ञानके लिये ईश्वरकी कल्पना होसकतीहै.
न च तत्राध्यापकतात्पर्यज्ञानं कारणमिति वाच्यम् । सर्गादाव-
ध्यापकाभावात् । न च प्रलय एव नास्तीति कुतः सर्गादिरिति
वाच्यम् । प्रलयस्यागमप्रतिपाद्यत्वात् ।
परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०९
शंका-वेदवाक्योंमें अध्यापक गुरुहीका तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण मान
लिया जाय तो हानि क्या है? समाधान-प्रथमसृष्टीके आद्यकालमें अध्यापक
कोई नहीं होता, वहां ईश्वरहीका तात्पर्य मानना उचित है. शंका-प्रपञ्चके प्रलय
होनेके पीछे सर्गके आद्यकालका सम्भव होसकताहै, परन्तु प्रलयही तो नहीं होता;
फिर सर्गका आद्यकालका कैसे होसकता है? समाधान-प्रलयका होना "नाहो न
रात्रिर्न नभो न भूमिर्नासीत्तमो ज्योतिरभून्न चान्यत्-अर्थात् एकप्रकाशरूप (ज्योतिः)
चेतनके सिवाय दिन रात्रि आकाश भूमि इत्यादि और कुछभी न होताभया "
इत्यादि शास्त्रवचनंस सिद्ध है.
इत्थंच शुकवाक्येऽपीश्वरीयतात्पर्यज्ञानं कारणम्, विसंवादि-
शुकवाक्ये तु शिक्षयितुरेव तात्पर्यस्य ज्ञानं कारणम् ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे शाब्दबोधमात्रके प्रति तात्पर्यज्ञानको कारण
होनेसे ( शुक ) तोते मैनादिके वचनोंमेंभी ईश्वरहीके तात्पर्यज्ञानको कारण मानना
उचित है अर्थात् तोते मैनाके उच्चारण किये श्लोकोंसे पुरुषको शाब्दबोध होताहै
परन्तु उनका तात्पर्य कुछ नहीं होता; इसलिये ऐसे वाक्यस्थलोंमें भगवत्तात्पर्यकी
कल्पना करके कार्यकारणभावके सहचारका निर्वाह करना उचित है; परन्तु जहां
शुकादिने ( विसंवादि ) निष्फल प्रवृत्तिजनक मिथ्यावाक्य उच्चारण कियाहै वहां
उसको सिखलानेवाले पुरुषका तात्पर्यज्ञानशाब्दबोधमें कारण जानना चाहिये.
अन्ये तु नानार्थादौ क्वचिदेव तात्पर्यज्ञानं कारणम्, तथा च
शुकवाक्ये विनैव तात्पर्यज्ञानं शाब्दबोधः। वेदे त्वनादिमीमां-
सापरिशोधिततर्कैरेवार्थावधारणमित्याहुः॥ ८४॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्त-
मुक्तावल्यां शब्दखण्डम् ॥ ४ ॥
भाषा-( अन्येतु ) और कईएक विद्वान्लोग यह कहतेहैं कि-तात्पर्यज्ञानको
हरएक स्थलमें कारणता नहींहै, किन्तु किसी नानार्थक " सैन्धवमानय " इत्यादि
वाक्यविशेषहीमें होसकतीहै. ( तथाच ) एवं शुकवाक्यसे वक्तृतात्पर्यज्ञानसे विनाभी
शाब्दबोध होनेमें बाधा नहींहै और वेदवाक्योंमेंभी ईश्वरका तात्पर्य माननेका कुछ
काम नहीं, किन्तु ( अनादि ) गुरुपरम्परापरिग्राप्त (मीमांसा) लाघवज्ञानात्मक तर्ककी
सहकारिताहीसे अर्थका निश्चय होसकताहै-इति ॥८४॥
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायमुक्तावली-
प्रकाशे शब्दपरिच्छेदः ॥ ४ ॥
२१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ स्मृति-
अथ स्मृतिप्रक्रिया ।
पूर्वमनुभवस्मरणभेदाद्बुद्धैर्द्वैविध्यमुक्तम् । तत्रानुभवप्रकारा द-
र्शिताः, सुगमतया स्मरणं न दर्शितम्-
भाषा-पूर्व "बुद्धिस्तु द्विविधा मता" इत्यादि मूलसे अनुभव तथा स्मरण
भेदसे बुद्धि दो प्रकारकी कही.उसमें अनुभवकी रीति तो प्रत्यक्ष अनुमिति उपमिति
तथा शाब्द भेदसे चार प्रकारकी कहचुके. शेष रहा स्मरणका प्रकार सो वह सुगम
है इसलिये पूर्व नहीं दिखलाया किन्तु अवसरसंगतिसे अब कहतेहैं--
तत्र हि पूर्वानुभवः कारणम् । अत्र केचित् । अनुभवत्वेन न
कारणत्वं किंतु ज्ञानत्वेनैव । अन्यथा सकृदनुभूतस्थले स्मर-
णानन्तरं स्मरणं न स्यात् समानप्रकारकस्मरणेन पूर्वसंस्कार-
स्य विनष्टत्वात् । मन्मते तु तेनैव स्मरणेन संस्कारान्तरद्वारा
स्मरणान्तरं जन्यत इत्याहुः ।
भाषा-उस स्मरणात्मक ज्ञानमें पूर्वानुभव कारण है अर्थात् जो वस्तु पूर्व अनु-
भूत होय उसीका स्मरण होसकताहै औरका नहीं.(अत्र केचित्) परन्तु यहां कई एक
विद्वानलोग ऐसा कहतेहैं कि-स्मरणके प्रति अनुभवत्वेन रूपेण अनुभवको कारणता
नहीं किन्तु ज्ञानत्वरूप सामान्यधर्मसे कारणता माननीही उचित है. (अन्यथा)यदि
ज्ञानत्वरूप सामान्यधर्मसे कारणता न स्वीकार करीजाय तो एकवार देखी हुई वस्तुका
स्मरणसे उत्तर फिर स्मरण नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि अनुभूत वस्तुके अनुभवका
तथा उस अनुभवसे उत्पन्न हुए संस्कारोंका समानप्रकारक स्मरणसे नाश होचुकाहै
अर्थात् यादृश वस्तुविषयक अनुभवजन्य संस्कार थे, उद्बोधक समवधानसे तादृश
वस्तुविषयक स्मरण जननानन्तर स्वयं शान्त होचुकेंगे तो स्मरणानन्तर स्मरण नहीं
होनाचाहिये, परन्तु होता तो है; क्योंकि बहुतसे ऐसे प्रिय पदार्थ हैं जिनके एकवार
अवलोकनसे इस जीवको वे अनेकवार (स्मरण) याद आतेहैं और मेरे मतमें तो
यह दोष नहीं, क्योंकि मैं तो ज्ञानत्वेन रूपेण ज्ञानको कारणता मानता हूं. प्रथमसं-
स्कारोंसे जो स्मरण हुआहै वहभी एक ज्ञानही है, उस स्मरणसे फिर संस्कारोंकी
उत्पत्ति, संस्कारोंसे फिर स्मरण; ऐसे अनेकवार स्मरण होसकताहै.
तन्न । यत्र समूहालम्बनोत्तरं घटपटादीनां क्रमेण स्मरणमजनिष्ट,
सकलविषयकस्मरणं तु नाभूत्, तत्र फलस्य संस्कारनाशकत्वा-
भावात् कालस्य रोगस्य चरमफलस्य वा संस्कारनाशकत्वं वा-
च्यम् । तथाच न क्रमिकस्मरणानुपपत्तिः ।
मक्रिया ] भाषाटीकासमेता २११
भाषा-( तन्न ) यह मन्तव्य समीचीन नहीं है; क्योंकि जिस स्थलमें पहले
“ घटपटमठाश्च” इत्याकारक समूहालम्बनात्मक अनुभव हुआहै और पीछे उद्बोधक
समवधानसे घटपटादिका क्रमसे स्मरण हुआहै किन्तु समूहालम्बनात्मक स्मरण नहीं
हुआ ऐसे स्थलमें समानप्रकारक स्मरणरूप फलको संस्कारनाशकता नहींहै. इस-
लिये हरएक फलको संस्कारनाशकता माननी उचित नहीं, किन्तु दीर्घकालको या
दर्घिरोगको या ( चरम ) अंतिम फलको संस्कारनाशकता माननी उचित है. एवं
जहां स्मरणउत्तर वारंवार फिर स्मरण होता है वहां जिसके अनन्तर स्मरणान्तर
नहीं होना उस अन्तिमस्मरणकोही संस्कारनाशकता माननी उचित है; ऐसे माननेसे
स्मरणउत्तर वारंवार स्मरणकी अनुपपत्ति नहीं है.
न च पुनः पुनः स्मरणाद्दृढतरसंस्कारानुपपत्तिरितिवाच्यम् ।
झटित्युद्बोधकसमवधानस्य दाढर्यपदार्थत्वात् ।
शंका-एकही संस्कारोंसे पुनःपुनः स्मरण हुए उन संस्कारोंमें दृढतरता नहीं
रहेगी अर्थात् फिर २ स्मरणरूप कार्यके जननसे वे संस्कार शिथिल पड़जायेंगे.
समा०-सादृश्यज्ञान एकान्तचिन्तनादि उद्बोधककी निर्विलम्ब सन्निधिही संस्कारोंमें
दृढतरता है अर्थात् जिस पदार्थके संस्कार चित्तमें जमे हैं उसके जैसा पदार्थान्तर
देखनेसे या उसको एकान्तमें फिर २ चिन्तन करनेसे उसके संस्कार पक्के होजातेहैं.
न च विनिगमनाविरहादेव ज्ञानत्वेनापि जनकत्वं स्यादिति
वाच्यम् । विशेषधर्मेण व्यभिचाराज्ञाने सामान्यधर्मेणान्यथासि-
द्धत्वात् ।
शंका-आपने स्मृतित्त्वावच्छिन्नके प्रति अनुभवत्वेन कारणता मानी और हम
ज्ञानत्वेन मानतेहैं. इनमें ( विनिगमना ) एक पक्षके कहनेवाली युक्तिके ( विरहात् )
न होनेसे यदि ज्ञानत्वेनभी जनकता मान लीजाय तो हानि क्याहै? समा०-यदि
विशेषधर्मसे कार्यकारणभावका व्यभिचार ज्ञात न होय तो सामान्यधर्मसे कार्यकार-
णभावकी कल्पना करनी निरर्थक है. यहां अनुभवत्वविशेष धर्म है,क्योंकि वह प्रत्य-
क्षादि चारहीमें रहताहै और ज्ञानत्व सामान्यधर्म है; क्योंकि वह भ्रम स्मरणादि
सभी ज्ञानोंमें रहताहै.
कथमन्यथा दण्डस्य भ्रमिद्वारा द्रव्यत्वेन रूपेण न कारणत्वम् ।
भाषा-(कथमन्यथा) यदि सामान्यधर्मेणही कारणता स्वीकृत होय तो घटादि
कार्यके प्रति दण्डको भ्रमीद्वारा द्रव्यत्वेनभी कारणता मान लेनी चाहिये भाव यह
कि-यद्यपि दण्डमें दण्डत्व तथा द्रव्यत्व दो धर्म समानियतवृत्ति विद्यमान हैं, इस-
लिये द्रव्यत्वेनभी कारणताका मानना अनुचित नहीं तथापि ऐसा किसी विद्वान्को
सम्मत नहीं. भाव यही कि-विशेषधर्मके होतसन्ते सामान्यधर्मसे कारणता कोई
नहीं मानता.
न चान्तरालिकस्मरणानां संस्कारनाशकत्वसंशयाद्व्यभिचारसं-
शय इति वाच्यम् । अनन्तसंस्कारतन्नाशकल्पनापेक्षया लाघवे-
न चरमस्मरणस्यैव संस्कारनाशकत्वकल्पनेन व्यभिचारसंश-
याभावात् ॥ ८४ ॥ ॥ इति स्मृतिप्रक्रिया ॥
शंका-अन्तिमस्मरणसे पहले बीचमें होनेवाले स्मरणोंसेभी संस्कारनाशकी शंका
हो सकतीहै. एवं मध्यपातिस्मरणोंसे संस्कारनाशके सन्देह होनेसे स्मृतित्वावच्छिन्नके
प्रति अनुभवत्वेन कार्यकारणभावके व्यभिचारकाभी सन्देह होसकताहै. समा०-अनेक
संस्कार और उनके नाशकी कल्पना करनेसे लाघवसे अन्तिमस्मरणहीको संस्कार
नांशकता कल्पना करनी उचित है. एवं कार्यकारणभावके व्यभिचारका सन्देहभी
नहीं होता-इति ॥ ८४ ॥ ॥ इति स्मृतिप्रक्रिया ॥
अथ मनोनिरूपणम् ।
इदानीं क्रमप्राप्तं मनो निरूपयति, साक्षात्कार इति-
भाषा-अब मूलकार निरूपणक्रमसे प्राप्त मनका ‘साक्षात्कारे’ इत्यादि ग्रन्थसे
निरूपण करतेहैं-
साक्षात्कारे सुखादीनां करणं मन उच्यते ।
भाषा-सुखदुःखादिके साक्षात् करनेमें (करण) साधनको मन कहतेहैं.
एतेन मनसि प्रमाणं दर्शितम् । तथाहि । सुखसाक्षात्कारः
सकरणको जन्यसाक्षात्कारत्वाच्चाक्षुषवदित्यनुमानेन मनसः
करणत्वसिद्धिः ।
भाषा-इस मूलग्रन्थसे मनमें अनुमानप्रमाण दिखलाया है. (तथाहि) सुखा-
दिका साक्षात्कारजन्य साक्षात्कार है; इसलिये अवश्य किसी एक (करण) साधनसे
जन्य है; जैसे घटादिका साक्षात्कार जन्यसाक्षात्कार है और नेत्रादि उसके कारणभी
प्रसिद्ध हैं इत्याकारक अनुमान प्रमाणसे सुखादिके करणात्मक मनकी सिद्धि होती है.
न चैवं दुःखादिसाक्षात्काराणामपि कारणान्तराणि स्युरिति वा-
च्यम् । लाघवादेकस्यैव तादृशसकलसाक्षात्कारकरणतया सि-
निरूपणम् ] भाषाटीकासमेता. २१३
च्छेः। एवं दुःखादीनामसमवायिकारणसंयोगाश्रयतया मनःसि-
द्धिर्बोद्धव्या।
शंका-ऐसेही दुःखादिके साक्षात्कारके लिये कारणान्तर मानने पड़ेंगे. समा-
धान-लाघवसे एक मनहीमें तादृश सभीके साक्षात्कारके प्रति कारणता सिद्ध हो
सकतीहै. इसलिये पृथक् २ माननी अनुचित है. ऐसेही सुखादिका असमवायिकारण
जो संयोग उस संयोगाश्रयत्वेनभी मनकी सिद्धि होसकतीहै. यहां अनुमान ऐसा
करना कि-"सुखदुःखाद्यसमवायिकारणं संयोगः प्रतियोगित्वेन क्वचिदाश्रितः मुख्य-
सम्बन्धत्वात्, समवायवत्" इस अनुमानसेभी मनकी सिद्धि होसकतीहैं.
मनसोऽणुत्वे प्रमाणमाह, अयौगपद्यादिति-
भाषा-'अयौगपद्यात्' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार मनके अणुत्वमें प्रमाण कहतेहैं-
अयौगपद्याज्ज्ञानानां तस्याणुत्वमिहेष्यते ॥ ८५ ॥
भाषा-एककालमें अनेक ज्ञानोंके न होनेसे मनमें अणुपनेका निश्चय होताहै ८५।
ज्ञानानां चाक्षुषरासनादीनां यौगपद्यमेककालोत्पत्तिर्नास्तीत्य-
नुभवसिद्धम्। तत्र नानेन्द्रियाणां सत्यपि विषयसन्निकर्षे यत्सम्ब-
न्धादेकेन्द्रियेण ज्ञानमुत्पद्यते यदसम्बन्धाच्च परैर्ज्ञानं नोत्पद्यते
तन्मनः, तन्मनसो विभुत्वे चासन्निधानं न सम्भवतीति न विभु
मनः।
भाषा-चाक्षुषरासनादि ज्ञानोंकी एककालावच्छेदेन उत्पत्ति नहीं होती यह वार्ता
अनुभवसिद्ध है. वहां नेत्रादि नानेन्द्रियोंका अपने २ विषयके साथ सम्बन्ध हुएभी
जिसके सम्बन्धसे एक इन्द्रियसे ज्ञान उत्पन्न होताहै और जिसके न सम्बन्ध होनेसे
और इन्द्रियोंसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, वह मन है. (तत्) वह असन्निधान मनके
विभु माननेसे नहीं बनसकता, इसलिये मन विभु नहीं है.
न च तदानीमदृष्टविशेषोद्बोधकविलम्बादेव तज्ज्ञानविलम्ब इ-
ति वाच्यम्। तथा सति चक्षुरादीनामप्यकल्पनापत्तेः।
शंका-जिस किसी नेत्रादि विशेषइन्द्रियसे ज्ञान उत्पन्न हुआहै वहां उस ज्ञानके
जनक अदृष्टसहकारी हैं और जिन शेष घ्राणादि इन्द्रियोंसे ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआहै
वहां उस कालमें उन ज्ञानोंके उत्पादक अदृष्टविशेष उद्बोधकके विलम्बसेही ज्ञान
उत्पत्तिमें विलम्ब समझना चाहिये. समाधान-(तथा सति) दृष्टसामग्रीके होत
संतेभी यदि अदृष्ट विलम्बसे कार्यका विलम्ब अङ्गीकार होय तो चक्षुःआदि इन्द्रि-
२१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ मनोनिरूपणम् ]
योंकी कल्पनाकीभी क्या आवश्यकता है ? अर्थात् एक अदृष्टकी कल्पनाहीसे निर्वाह
होय सकताहै.
न च दीर्घशष्कुलीभक्षणादौ नानावधानभाजां च कथमेकदा ना-
नेन्द्रियज्ञानमिति वाच्यम्। मनसोऽतिलाघवात् त्वरया नानेन्द्रि-
यसम्बन्धानानाज्ञानोत्पत्तेः । उत्पलशतपत्रभेदादिवद्यौगपद्यप्र-
त्ययस्य तु भ्रान्तत्वात् ।
शंका-दीर्घ ( शष्कुली ) जलेबी आदिके भक्षणसे तथा नाना ( अवधान )
प्रतीतिभाजि पुरुषोंको कैसे एकही कालमें अनेक इन्द्रियजन्य ज्ञान होताहै? भाव
यह कि-गरम २ दीर्घ जलेबी आदिके भक्षणमें उसके मधुर रसका तथा गन्धका
तथा कोमल उष्णस्पर्श आदिका एकही कालमें पुरुषको भान होता है. एवं एकही
कालमें ज्ञानसम्बन्धि अनेक कार्य करनेवाले पुरुषभी इस संसारमें बहुत हैं. यदि मन
अणु होय तो यह सब नहीं होना चाहिये. समा०-मन अत्यन्त लघु तथा वेगशाली
है. इसलिये बहुत शीघ्र नाना इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होकर नाना ज्ञानोंकी उत्पत्ति
होतीहै. कमलशतपत्रभेदनकी तरह ज्ञानोंमेंभी यौगपद्यप्रत्यय भ्रमरूपही समझना
चाहिये अर्थात् जैसे कमलके शतपत्रको नीचे ऊपर रखकर सूचीसे भेदन करें तो
सूचीभेदन क्रमसेही होगा परन्तु अतिशीघ्र होनेसे प्रतीत ऐसे होताहै कि, एकही
कालमें हुआ ऐसेही ज्ञानोंमेंभी अत्यन्ताव्यवहित कालोत्पत्तिकत्वरूप दोषसे यौगपद्य
उत्पत्ति प्रतीत होती है, वस्तुतः नहींहै.
न च मनसः सङ्कोचविकाशशालित्वादुभयोपपत्तिरस्त्विति वा-
च्यम् । नानावयवतन्नाशादिकल्पने गौरवाल्लाघवात्रिरवयवस्या-
णुरूपस्यैव मनसः कल्पनात् । इति संक्षेपः ॥ ८५ ॥
॥ इति द्रव्यपदार्थव्याख्या समाप्ता ॥
शंका-मनको संकोचविकाशस्वभाववाला मानलिया जाय तो एक तथा नाना
उभय तरहके ज्ञानकी उपपत्ति होसकतीहै अर्थात् संकोचावस्थामें मनका एकही
इन्द्रियके साथ सम्बन्ध होताहै इसलिये एकही ज्ञानका उत्पादक है और विकाशाव-
स्थामें नाना इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होताहै इसलिये एकही कालमें नानाज्ञानका
उत्पादक है. समा०-मनके नाना अवयव तथा उनके संकोच विकाश या ध्वंस
प्रागभावादि माननेमें अतिगौरव है इसलिये लाघवसे निरवयव अणुरूप मनकी कल्प-
नाही साध्वी है. यह संक्षेपसे मनका निरूपण है ॥ ८५ ॥
॥ इति द्रव्यनिरूपणम् ॥