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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 350 में से

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पृष्ठ 233

परिच्छेदः ४ ] भाषाटीकासमेता. २०९
शंका-वेदवाक्योंमें अध्यापक गुरुहीका तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण मान
लिया जाय तो हानि क्या है? समाधान-प्रथमसृष्टीके आद्यकालमें अध्यापक
कोई नहीं होता, वहां ईश्वरहीका तात्पर्य मानना उचित है. शंका-प्रपञ्चके प्रलय
होनेके पीछे सर्गके आद्यकालका सम्भव होसकताहै, परन्तु प्रलयही तो नहीं होता;
फिर सर्गका आद्यकालका कैसे होसकता है? समाधान-प्रलयका होना "नाहो न
रात्रिर्न नभो न भूमिर्नासीत्तमो ज्योतिरभून्न चान्यत्-अर्थात् एकप्रकाशरूप (ज्योतिः)
चेतनके सिवाय दिन रात्रि आकाश भूमि इत्यादि और कुछभी न होताभया "
इत्यादि शास्त्रवचनंस सिद्ध है.
इत्थंच शुकवाक्येऽपीश्वरीयतात्पर्यज्ञानं कारणम्, विसंवादि-
शुकवाक्ये तु शिक्षयितुरेव तात्पर्यस्य ज्ञानं कारणम् ।
भाषा-( इत्थञ्च ) इस रीतिसे शाब्दबोधमात्रके प्रति तात्पर्यज्ञानको कारण
होनेसे ( शुक ) तोते मैनादिके वचनोंमेंभी ईश्वरहीके तात्पर्यज्ञानको कारण मानना
उचित है अर्थात् तोते मैनाके उच्चारण किये श्लोकोंसे पुरुषको शाब्दबोध होताहै
परन्तु उनका तात्पर्य कुछ नहीं होता; इसलिये ऐसे वाक्यस्थलोंमें भगवत्तात्पर्यकी
कल्पना करके कार्यकारणभावके सहचारका निर्वाह करना उचित है; परन्तु जहां
शुकादिने ( विसंवादि ) निष्फल प्रवृत्तिजनक मिथ्यावाक्य उच्चारण कियाहै वहां
उसको सिखलानेवाले पुरुषका तात्पर्यज्ञानशाब्दबोधमें कारण जानना चाहिये.
अन्ये तु नानार्थादौ क्वचिदेव तात्पर्यज्ञानं कारणम्, तथा च
शुकवाक्ये विनैव तात्पर्यज्ञानं शाब्दबोधः। वेदे त्वनादिमीमां-
सापरिशोधिततर्कैरेवार्थावधारणमित्याहुः॥ ८४॥
इति श्रीविश्वनाथपञ्चाननभट्टाचार्यविरचितायां सिद्धान्त-
मुक्तावल्यां शब्दखण्डम् ॥ ४ ॥
भाषा-( अन्येतु ) और कईएक विद्वान्लोग यह कहतेहैं कि-तात्पर्यज्ञानको
हरएक स्थलमें कारणता नहींहै, किन्तु किसी नानार्थक " सैन्धवमानय " इत्यादि
वाक्यविशेषहीमें होसकतीहै. ( तथाच ) एवं शुकवाक्यसे वक्तृतात्पर्यज्ञानसे विनाभी
शाब्दबोध होनेमें बाधा नहींहै और वेदवाक्योंमेंभी ईश्वरका तात्पर्य माननेका कुछ
काम नहीं, किन्तु ( अनादि ) गुरुपरम्परापरिग्राप्त (मीमांसा) लाघवज्ञानात्मक तर्ककी
सहकारिताहीसे अर्थका निश्चय होसकताहै-इति ॥८४॥
इति श्रीगोविन्दसिंहसाधुकृते आर्यभाषाविभूषितन्यायमुक्तावली-
प्रकाशे शब्दपरिच्छेदः ॥ ४ ॥