न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ मनोनिरूपणम् ]
योंकी कल्पनाकीभी क्या आवश्यकता है ? अर्थात् एक अदृष्टकी कल्पनाहीसे निर्वाह
होय सकताहै.
न च दीर्घशष्कुलीभक्षणादौ नानावधानभाजां च कथमेकदा ना-
नेन्द्रियज्ञानमिति वाच्यम्। मनसोऽतिलाघवात् त्वरया नानेन्द्रि-
यसम्बन्धानानाज्ञानोत्पत्तेः । उत्पलशतपत्रभेदादिवद्यौगपद्यप्र-
त्ययस्य तु भ्रान्तत्वात् ।
शंका-दीर्घ ( शष्कुली ) जलेबी आदिके भक्षणसे तथा नाना ( अवधान )
प्रतीतिभाजि पुरुषोंको कैसे एकही कालमें अनेक इन्द्रियजन्य ज्ञान होताहै? भाव
यह कि-गरम २ दीर्घ जलेबी आदिके भक्षणमें उसके मधुर रसका तथा गन्धका
तथा कोमल उष्णस्पर्श आदिका एकही कालमें पुरुषको भान होता है. एवं एकही
कालमें ज्ञानसम्बन्धि अनेक कार्य करनेवाले पुरुषभी इस संसारमें बहुत हैं. यदि मन
अणु होय तो यह सब नहीं होना चाहिये. समा०-मन अत्यन्त लघु तथा वेगशाली
है. इसलिये बहुत शीघ्र नाना इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होकर नाना ज्ञानोंकी उत्पत्ति
होतीहै. कमलशतपत्रभेदनकी तरह ज्ञानोंमेंभी यौगपद्यप्रत्यय भ्रमरूपही समझना
चाहिये अर्थात् जैसे कमलके शतपत्रको नीचे ऊपर रखकर सूचीसे भेदन करें तो
सूचीभेदन क्रमसेही होगा परन्तु अतिशीघ्र होनेसे प्रतीत ऐसे होताहै कि, एकही
कालमें हुआ ऐसेही ज्ञानोंमेंभी अत्यन्ताव्यवहित कालोत्पत्तिकत्वरूप दोषसे यौगपद्य
उत्पत्ति प्रतीत होती है, वस्तुतः नहींहै.
न च मनसः सङ्कोचविकाशशालित्वादुभयोपपत्तिरस्त्विति वा-
च्यम् । नानावयवतन्नाशादिकल्पने गौरवाल्लाघवात्रिरवयवस्या-
णुरूपस्यैव मनसः कल्पनात् । इति संक्षेपः ॥ ८५ ॥
॥ इति द्रव्यपदार्थव्याख्या समाप्ता ॥
शंका-मनको संकोचविकाशस्वभाववाला मानलिया जाय तो एक तथा नाना
उभय तरहके ज्ञानकी उपपत्ति होसकतीहै अर्थात् संकोचावस्थामें मनका एकही
इन्द्रियके साथ सम्बन्ध होताहै इसलिये एकही ज्ञानका उत्पादक है और विकाशाव-
स्थामें नाना इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होताहै इसलिये एकही कालमें नानाज्ञानका
उत्पादक है. समा०-मनके नाना अवयव तथा उनके संकोच विकाश या ध्वंस
प्रागभावादि माननेमें अतिगौरव है इसलिये लाघवसे निरवयव अणुरूप मनकी कल्प-
नाही साध्वी है. यह संक्षेपसे मनका निरूपण है ॥ ८५ ॥
॥ इति द्रव्यनिरूपणम् ॥