न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ स्मृति-
अथ स्मृतिप्रक्रिया ।
पूर्वमनुभवस्मरणभेदाद्बुद्धैर्द्वैविध्यमुक्तम् । तत्रानुभवप्रकारा द-
र्शिताः, सुगमतया स्मरणं न दर्शितम्-
भाषा-पूर्व "बुद्धिस्तु द्विविधा मता" इत्यादि मूलसे अनुभव तथा स्मरण
भेदसे बुद्धि दो प्रकारकी कही.उसमें अनुभवकी रीति तो प्रत्यक्ष अनुमिति उपमिति
तथा शाब्द भेदसे चार प्रकारकी कहचुके. शेष रहा स्मरणका प्रकार सो वह सुगम
है इसलिये पूर्व नहीं दिखलाया किन्तु अवसरसंगतिसे अब कहतेहैं--
तत्र हि पूर्वानुभवः कारणम् । अत्र केचित् । अनुभवत्वेन न
कारणत्वं किंतु ज्ञानत्वेनैव । अन्यथा सकृदनुभूतस्थले स्मर-
णानन्तरं स्मरणं न स्यात् समानप्रकारकस्मरणेन पूर्वसंस्कार-
स्य विनष्टत्वात् । मन्मते तु तेनैव स्मरणेन संस्कारान्तरद्वारा
स्मरणान्तरं जन्यत इत्याहुः ।
भाषा-उस स्मरणात्मक ज्ञानमें पूर्वानुभव कारण है अर्थात् जो वस्तु पूर्व अनु-
भूत होय उसीका स्मरण होसकताहै औरका नहीं.(अत्र केचित्) परन्तु यहां कई एक
विद्वानलोग ऐसा कहतेहैं कि-स्मरणके प्रति अनुभवत्वेन रूपेण अनुभवको कारणता
नहीं किन्तु ज्ञानत्वरूप सामान्यधर्मसे कारणता माननीही उचित है. (अन्यथा)यदि
ज्ञानत्वरूप सामान्यधर्मसे कारणता न स्वीकार करीजाय तो एकवार देखी हुई वस्तुका
स्मरणसे उत्तर फिर स्मरण नहीं हुआ चाहिये; क्योंकि अनुभूत वस्तुके अनुभवका
तथा उस अनुभवसे उत्पन्न हुए संस्कारोंका समानप्रकारक स्मरणसे नाश होचुकाहै
अर्थात् यादृश वस्तुविषयक अनुभवजन्य संस्कार थे, उद्बोधक समवधानसे तादृश
वस्तुविषयक स्मरण जननानन्तर स्वयं शान्त होचुकेंगे तो स्मरणानन्तर स्मरण नहीं
होनाचाहिये, परन्तु होता तो है; क्योंकि बहुतसे ऐसे प्रिय पदार्थ हैं जिनके एकवार
अवलोकनसे इस जीवको वे अनेकवार (स्मरण) याद आतेहैं और मेरे मतमें तो
यह दोष नहीं, क्योंकि मैं तो ज्ञानत्वेन रूपेण ज्ञानको कारणता मानता हूं. प्रथमसं-
स्कारोंसे जो स्मरण हुआहै वहभी एक ज्ञानही है, उस स्मरणसे फिर संस्कारोंकी
उत्पत्ति, संस्कारोंसे फिर स्मरण; ऐसे अनेकवार स्मरण होसकताहै.
तन्न । यत्र समूहालम्बनोत्तरं घटपटादीनां क्रमेण स्मरणमजनिष्ट,
सकलविषयकस्मरणं तु नाभूत्, तत्र फलस्य संस्कारनाशकत्वा-
भावात् कालस्य रोगस्य चरमफलस्य वा संस्कारनाशकत्वं वा-
च्यम् । तथाच न क्रमिकस्मरणानुपपत्तिः ।