न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ शब्द-
‘ राज ’ पदका तात्पर्यग्रह होनेसे पुत्रके साथही अन्वयबोध होताहै और पुरुषके
साथ तात्पर्यग्रह होनेसे पुरुषके साथही अन्वयबोध होताहै-इति ।
तात्पर्यं निर्वक्ति, वक्तुरिच्छेति-
भाषा-‘ वक्तुरिच्छा ’ इत्यादि ग्रंथसे तात्पर्यार्थ कहते हैं-
-वक्तुरिच्छा तु तात्पर्यं परिकीर्तितम् ॥८४॥
भाषा-वक्ताने श्रोताके प्रति यादृश वाक्यार्थबोधनकी इच्छासे वाक्योच्चारण
कियाहै उस इच्छाका नाम तात्पर्य है ॥ ८४ ॥
यदि तात्पर्यज्ञानं कारणं न स्यात्तदा ‘सैन्धवमानय’ इत्यादौ
क्वचिदश्वस्य क्वचिल्लवणस्य बोधो न स्यात् । न च तात्पर्यग्रा-
हकप्रकरणादीनामेव शाब्दबोधे कारणत्वमस्त्विति वाच्यम्,
तेषामननुगमात् ।
भाषा-शाब्दबोधमें यदि वक्ताका तात्पर्यज्ञान कारण न होय तो “सैन्धवमा-
नय” इत्यादि वाक्योंसे कहीं यात्राप्रसंगमें ‘अश्व’ का तथा कहीं भोजनादिप्रसंगमें
‘लवण’ का बोध होताहै, वह नहीं हुआ चाहिये. शंका-वक्तृतात्पर्यके ग्राहक जो
प्रकरणादि यदि उनहीको शाब्दबोधके प्रति कारण मानकर निर्वाह होसके तो
पृथक् तात्पर्य माननेकी क्या आवश्यकता है? समाधान-प्रकरणादिकोंका एक-
रूपसे अनुगम होना कठिन है.
तात्पर्यज्ञानजनकत्वेन तेषामनुगमे तु तात्पर्यज्ञानमेव लाघवा-
त्कारणमस्तु । इत्थं च वेदस्थलेऽपि तात्पर्यज्ञानार्थमीश्वरः
कल्प्यते ।
शंका-वह सभी स्वस्वस्थलमें तात्पर्यज्ञानके जनक हैं इसलिये ‘ तात्पर्यज्ञान-
जनकत्वेन’ उन सबका अनुगम होसकताहै. समाधान-ऐसे गुरुभूत अनुगमसे तो
तात्पर्यज्ञानहीमें कारणता माननेमें लाघव है. ( इत्थञ्च ) ऐसेही वेदवाक्योंमेंभी
तात्पर्यज्ञानके लिये ईश्वरकी कल्पना होसकतीहै.
न च तत्राध्यापकतात्पर्यज्ञानं कारणमिति वाच्यम् । सर्गादाव-
ध्यापकाभावात् । न च प्रलय एव नास्तीति कुतः सर्गादिरिति
वाच्यम् । प्रलयस्यागमप्रतिपाद्यत्वात् ।