न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिरूपणम् ] भाषाटीकासमेता. २१३
च्छेः। एवं दुःखादीनामसमवायिकारणसंयोगाश्रयतया मनःसि-
द्धिर्बोद्धव्या।
शंका-ऐसेही दुःखादिके साक्षात्कारके लिये कारणान्तर मानने पड़ेंगे. समा-
धान-लाघवसे एक मनहीमें तादृश सभीके साक्षात्कारके प्रति कारणता सिद्ध हो
सकतीहै. इसलिये पृथक् २ माननी अनुचित है. ऐसेही सुखादिका असमवायिकारण
जो संयोग उस संयोगाश्रयत्वेनभी मनकी सिद्धि होसकतीहै. यहां अनुमान ऐसा
करना कि-"सुखदुःखाद्यसमवायिकारणं संयोगः प्रतियोगित्वेन क्वचिदाश्रितः मुख्य-
सम्बन्धत्वात्, समवायवत्" इस अनुमानसेभी मनकी सिद्धि होसकतीहैं.
मनसोऽणुत्वे प्रमाणमाह, अयौगपद्यादिति-
भाषा-'अयौगपद्यात्' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार मनके अणुत्वमें प्रमाण कहतेहैं-
अयौगपद्याज्ज्ञानानां तस्याणुत्वमिहेष्यते ॥ ८५ ॥
भाषा-एककालमें अनेक ज्ञानोंके न होनेसे मनमें अणुपनेका निश्चय होताहै ८५।
ज्ञानानां चाक्षुषरासनादीनां यौगपद्यमेककालोत्पत्तिर्नास्तीत्य-
नुभवसिद्धम्। तत्र नानेन्द्रियाणां सत्यपि विषयसन्निकर्षे यत्सम्ब-
न्धादेकेन्द्रियेण ज्ञानमुत्पद्यते यदसम्बन्धाच्च परैर्ज्ञानं नोत्पद्यते
तन्मनः, तन्मनसो विभुत्वे चासन्निधानं न सम्भवतीति न विभु
मनः।
भाषा-चाक्षुषरासनादि ज्ञानोंकी एककालावच्छेदेन उत्पत्ति नहीं होती यह वार्ता
अनुभवसिद्ध है. वहां नेत्रादि नानेन्द्रियोंका अपने २ विषयके साथ सम्बन्ध हुएभी
जिसके सम्बन्धसे एक इन्द्रियसे ज्ञान उत्पन्न होताहै और जिसके न सम्बन्ध होनेसे
और इन्द्रियोंसे ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, वह मन है. (तत्) वह असन्निधान मनके
विभु माननेसे नहीं बनसकता, इसलिये मन विभु नहीं है.
न च तदानीमदृष्टविशेषोद्बोधकविलम्बादेव तज्ज्ञानविलम्ब इ-
ति वाच्यम्। तथा सति चक्षुरादीनामप्यकल्पनापत्तेः।
शंका-जिस किसी नेत्रादि विशेषइन्द्रियसे ज्ञान उत्पन्न हुआहै वहां उस ज्ञानके
जनक अदृष्टसहकारी हैं और जिन शेष घ्राणादि इन्द्रियोंसे ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआहै
वहां उस कालमें उन ज्ञानोंके उत्पादक अदृष्टविशेष उद्बोधकके विलम्बसेही ज्ञान
उत्पत्तिमें विलम्ब समझना चाहिये. समाधान-(तथा सति) दृष्टसामग्रीके होत
संतेभी यदि अदृष्ट विलम्बसे कार्यका विलम्ब अङ्गीकार होय तो चक्षुःआदि इन्द्रि-