न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिये द्रव्यत्वेनभी कारणताका मानना अनुचित नहीं तथापि ऐसा किसी विद्वान्को
सम्मत नहीं. भाव यही कि-विशेषधर्मके होतसन्ते सामान्यधर्मसे कारणता कोई
नहीं मानता.
न चान्तरालिकस्मरणानां संस्कारनाशकत्वसंशयाद्व्यभिचारसं-
शय इति वाच्यम् । अनन्तसंस्कारतन्नाशकल्पनापेक्षया लाघवे-
न चरमस्मरणस्यैव संस्कारनाशकत्वकल्पनेन व्यभिचारसंश-
याभावात् ॥ ८४ ॥ ॥ इति स्मृतिप्रक्रिया ॥
शंका-अन्तिमस्मरणसे पहले बीचमें होनेवाले स्मरणोंसेभी संस्कारनाशकी शंका
हो सकतीहै. एवं मध्यपातिस्मरणोंसे संस्कारनाशके सन्देह होनेसे स्मृतित्वावच्छिन्नके
प्रति अनुभवत्वेन कार्यकारणभावके व्यभिचारकाभी सन्देह होसकताहै. समा०-अनेक
संस्कार और उनके नाशकी कल्पना करनेसे लाघवसे अन्तिमस्मरणहीको संस्कार
नांशकता कल्पना करनी उचित है. एवं कार्यकारणभावके व्यभिचारका सन्देहभी
नहीं होता-इति ॥ ८४ ॥ ॥ इति स्मृतिप्रक्रिया ॥
अथ मनोनिरूपणम् ।
इदानीं क्रमप्राप्तं मनो निरूपयति, साक्षात्कार इति-
भाषा-अब मूलकार निरूपणक्रमसे प्राप्त मनका ‘साक्षात्कारे’ इत्यादि ग्रन्थसे
निरूपण करतेहैं-
साक्षात्कारे सुखादीनां करणं मन उच्यते ।
भाषा-सुखदुःखादिके साक्षात् करनेमें (करण) साधनको मन कहतेहैं.
एतेन मनसि प्रमाणं दर्शितम् । तथाहि । सुखसाक्षात्कारः
सकरणको जन्यसाक्षात्कारत्वाच्चाक्षुषवदित्यनुमानेन मनसः
करणत्वसिद्धिः ।
भाषा-इस मूलग्रन्थसे मनमें अनुमानप्रमाण दिखलाया है. (तथाहि) सुखा-
दिका साक्षात्कारजन्य साक्षात्कार है; इसलिये अवश्य किसी एक (करण) साधनसे
जन्य है; जैसे घटादिका साक्षात्कार जन्यसाक्षात्कार है और नेत्रादि उसके कारणभी
प्रसिद्ध हैं इत्याकारक अनुमान प्रमाणसे सुखादिके करणात्मक मनकी सिद्धि होती है.
न चैवं दुःखादिसाक्षात्काराणामपि कारणान्तराणि स्युरिति वा-
च्यम् । लाघवादेकस्यैव तादृशसकलसाक्षात्कारकरणतया सि-