सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

भूमिका
( १ ) प्राथमिक निवेदन ।
हर्षका विषय है कि आजकलके विद्वानोंका हृदय क्रमशः धार्मिक विषयोंमें उदार
विचारों का होता जा रहा है। भिन्न २ मत वाले विद्वानोंके द्वारा भिन्न २ मतकी
पुस्तकों का सम्पादन उसीका शुभ परिणाम है। यद्यपि प्राचीन कालके भारतीय
विद्वान् भी भिन्न २ मतोंके ग्रन्थोंका अध्ययन करते थे तथापि उनका अध्ययन प्रायः
उन ग्रन्थोंका खण्डनमण्डन करनेके उद्देश्यसे ही होता था, जैसा कि स्वामी शङ्कराचार्य,
जैन न्यायके उद्धारक श्री अकलङ्कदेव आदिके ग्रन्थोंको देखनेसे पता चलता है। हर्षकी
बात है कि आजकलके बहुतसे विद्वानोंका यह मत हो गया है कि प्रत्येक धर्ममें अधिक
परिमाणमें सत्य विद्यमान है। पश्चिमीय विद्वानोंके विचार इस विषयमें बहुत ही
प्रशंसनीय हैं। हमारे बहुतसे ग्रन्थोंको और बौद्ध साहित्यके अधिकांश ग्रन्थोंको
संसारके प्रकाशमें लानेका श्रेय उन्हींको प्राप्त है। प्रस्तुत ग्रन्थ और उसके कर्त्ता
आचार्य धर्मकीर्ति और धर्मोत्तरके विषयमें भी हमको सर्व प्रथम उन्हींसे विदित
हुआ था। यद्यपि आचार्य धर्मकीर्ति और न्यायबिन्दु का नाम सर्वदर्शनसंग्रह इत्यादि
हिन्दूग्रन्थों और प्रमेयकमलमार्त्तण्ड आदि जैन ग्रन्थों में विद्यमान होनेके कारण
भारतीय विद्वानोंको पहिलेसे ही विदित था, किन्तु अनुसन्धानप्रियताके अभावके
कारण उनका जानना न जानना एक सा ही था। हमको पहिले पहल 'आचार्य धर्मो-
त्तर' का नाम बतलानेवाला पश्चिमीय विद्वान् ( W. Wassiljew ) डब्ल्यू वैसिल्ज्यू
नामका एक रूसी विद्वान् था। यह विद्वान् सन् १८४० से १८५० तक ( दस वर्ष
तक ) पेकिनमें रहा। यह चीनी और तिब्बी दोनों भाषाओंका अच्छा पण्डित था। इसने
इन भाषाओंके ज्ञानसे बहुतसे बौद्ध ग्रन्थोंका पता लगाया।
इन्होंने अपने सबसे पहिले ग्रन्थ 'बुधिज्म, इटस् डाग्मस, हिस्ट्री ऐण्ड लिटेरेचर'
( Buddhism, its Dogmas, History & Literature ) में धर्मोत्तरके
विषयमें बहुत कुछ बतला दिया है।
न्यायबिन्दुको सर्व प्रथम प्रो. पीटर्सन साहिबने १८८९ में निकाला था।
यह संस्करण उन्होंने उक्त ग्रन्थकी दो हस्तलिखित प्रतियों ( Manuscripts )
की सहायतासे सम्पादन किया था, जिनमें से एक उनको काम्बेके शान्तिनाथके जैन
मन्दिरमें ताड़पत्र पर लिखी हुई मिली थी। (पीटर्सन साहबने इस प्रतिका नाम (A)
और हमने (क) रखा है।) और दूसरी रायल एशियाटिक सोसायटी की बम्बई
शाखाके भाऊ दाजीके हस्तलिखित ग्रन्थोंके संग्रहमें भगवान् दास केवलदास की
सूचनाओंमेंसे मिली थी। (पीटर्सन साहबने इसका नाम (B) और हमने (ख)

२ भूमिका ।
रखा है ।) क. और ख. दोनों पुस्तकोंमें धर्मोत्तराचार्य की न्यायबिन्दु टीका थी, किन्तु
धर्मकीर्ति का मूल ग्रन्थ केवल ख. में ही था ।
हमने पाठोंके परिवर्तन क. और ख. से चिह्नित किये हैं । छपी पुस्तकको हमने
अपनी टिप्पणीमें मुद्रित पुस्तक ही लिखा है और हमारी सम्मतिमें जहाँ मुद्रित
पुस्तकका पाठ बदलने योग्य था उसको भी हमने टिप्पणीमें दिखला दिया है । यद्यपि
हमने पीटर्सन साहिबकी सभी अशुद्धियोंको बतलाया है तथापि हमारे ग्रन्थमें भी प्रूफ़
सम्बन्धी बहुतसी अशुद्धियां अनुभव हीनताके कारण रह गई होंगी । आशा है
विद्वज्जन मुझको इसके लिए क्षमा करते हुए उनको सुधार कर पढ़ेंगे ।
( २ ) बौद्धन्यायके इतिहास पर एक दृष्टि ।
यद्यपि दर्शनशास्त्रके आरंभिक कालमें भी बहुतसे शास्त्रार्थ हुआ करते थे तथापि
उस समय न्यायकी ओर किसीका विशेष लक्ष्य न था । बुद्धके निर्वाणके समयकी
पुस्तकोंमें भी इसका कुछ विवरण नहीं है। गौतमका न्यायसूत्र उस समय तक बन
चुका था । किन्तु बौद्ध और जैन दार्शनिकोंका ध्यान अभी तक उधर आकर्षित नहीं
हुआ था । यद्यपि सुत्तपिटकके दिग्घनिकायके भाग ब्रह्मजाल सुत्त, मज्झिमनिकायके
भाग अनुमान सुत्त और खुद्दकनिकायके भाग उद्दान तथा विनयपिटकके परिवार
और पातिमोक्ख तथा अभिधम्मपिटकके कथावत्थुप्रकरण आदि ग्रन्थोंमें न्यायके कुछ
शब्द तथा निर्णय करनेके कुछ नियम मिलते हैं किन्तु हमारी सम्मतिमें उनपर भी
गौतमके न्यायसूत्रोंकी छाप पूर्ण रूपसे लगी हुई है । क्योंकि उनमें 'उपनय' तथा
'निग्रह' का भी कुछ वर्णन किया गया है । नीति ( अथवा न्याय ) शब्दका उल्लेख
पालीके केवल एक ग्रन्थ मलिन्दपन्होमें ( जो कि भिक्षुसूत्र भी कहलाता है ) मिलता
है । इससे भलीप्रकार पता चल सकता है कि उस समयके बौद्ध आचार्योंने इस विषय
पर कितना प्रकाश डाला है ।
ईस्वी सन्‌के आरम्भमें भारत पर कुशान, तुरुष्क अथवा सीथियन लोगोंके
आक्रमण हुए । उनके एक सरदारका नाम कनिष्क था । उसने काश्मीर, पल्हव और
देहलीको विजय किया । उसके विषयमें कहा जाता है कि उसीने ईस्वी सन् ७८ में
एक संवत् की नींव डाली । उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और बौद्धोंका एक
नया सम्प्रदाय महायानको स्थापित किया । तबसे पाली त्रिपिटकमें वर्णित प्राचीन
सम्प्रदाय हीनयान कहा जाने लगा । महायान क्रमशः नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया, चीन,
जापान और कोरिया आदिमें फैल गया और हीनयान सिंहल और वहांसे बर्मा और
श्याम आदिमें फैल गया । भारतमें दोनों ही सम्प्रदाय चलते रहे ।
कनिष्कके संरक्षण तथा पार्श्व ( या पूर्णक ) और वसुमित्रके निरीक्षणमें ५०० बौद्ध
भिक्षुओंकी एक वृहत्सभा जालन्धरमें हुई । इसमें पालीके सुत्त, विजय तथा अभिधम्म
इन त्रिपिटकोंकी टीका स्वरूप क्रमशः सूत्र उपदेश, विनय विभाषा और अभिधर्म
विभाषा बनाये गये । महायान सम्प्रदायके साहित्यमें सबसे प्राचीन यही ग्रन्थ है ।

भूमिका । ३
यद्यपि कनिष्कसे पहिले भी संस्कृतमें कुछ बौद्ध ग्रन्थोंकी रचना हो चुकी थी
(उदाहरणके लिये अभिधर्म विभाषा अथवा अभिधर्म महाविभाषा शास्त्र जिसकी
रचना कनिष्ककी सभामें की गई थी, कात्यायनी पुत्रके अभिधर्मज्ञान प्रस्थानशास्त्र
(यह पाली अभिधम्म पिटककी टीका है और बुद्धके निर्वाणके ३०० वर्ष पश्चात् तथा
कनिष्कसे १०० वर्ष पहिले बनाया गया था) के ऊपर टीका है) तथापि संस्कृतको
बौद्धसाहित्यकी भाषा बनानेका श्रेय उसीको प्राप्त है । उसके समयसे लगाकर असंख्य
संस्कृत बौद्धग्रन्थोंकी रचना हुई है, जिनमेंसे नवधर्म संज्ञक नौ ग्रन्थ महायान सम्प्रदायके
विशेष रूपसे पूज्य हैं ।
नव धर्म ये हैं—
(१) अष्ट साहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता, (२) गंडव्यूह, (३) दशभूमीश्वर, (४) समा-
धिराज, (५) लंकावतार, (६) सद्धर्मपुण्डरीक, (७) तथागतगुह्यक, (८) ललितविस्तर
और (९) सुवर्णप्रभास । इनमें अनेक स्थलों पर न्यायका भी उल्लेख किया गया है ।
बुद्धने अपना उपदेश पाली अथवा मागधी भाषामें दिया था । उसके पश्चात्
उसकी शिक्षायें बौद्ध भिक्षुओं की तीन सभाओंमें एकत्रित की गईं । ये सभायें राजगृह,
वैशाली और पाटलिपुत्रमें क्रमसे राजा अजातशत्रु, कालाशोक और अशोकके संरक्षणमें
हुई थीं । पहिली सभा ईसासे ४९० वर्ष, दूसरी ३९० वर्ष तथा तीसरी २५५ वर्ष पूर्व हुई
थी । (पहिली सभा बुद्धके निर्वाणके संवत्‌में, दूसरी उसके १०० वर्ष पश्चात् और तीसरी
अशोकके शासनकालके १७वें वर्षमें हुई थी । अशोक ईसासे २७२ वर्ष पूर्व सिंहासन-
पर बैठा था) । जो भिक्षु प्रथम सभामें एकत्रित हुए थे वह (१) थेरा कहे जाने लगे ।
वैशालीकी द्वितीय सभाके निर्णयसे दस सहस्र भिक्षु थेरावादके कुछ नियमों का उल्लंघन
करनेके कारण थेरा संघसे पृथक् कर दिये गये । ये निकाले हुए धर्मगुरु (२) महा-
सांघिका कहलाये । मूल बौद्ध धर्ममें से पृथक् होने वाला पहिला सम्प्रदाय यही था ।
उन्होंने थेरावादमें कुछ नियम घटाये तथा कुछ बढ़ा दिये । इसके पश्चात् बुद्धके
निर्वाणके २०० वर्षोंके भीतर मूलधर्मसे पृथक् (Heretical) सोलह और सम्प्रदाय
चले, उनके नाम ये हैं—(३) गोकुलिका, (४) एकव्वोहारिक, (५) पण्णति, (६) बाहु-
लिक (७) चेतिय, (८) सब्बत्थि, (९) धर्म्मगुत्तिक, (१०) कस्सपीय, (११) संकतिक,
(१२) सुत्त, (१३) हिमवत, (१४) राजगिरीय, (१५) सिद्धत्थिक, (१६) पुब्बसेलिय,
(१७) अपरसेलिय, (१८) वजिरिय ।
तीसरी सभाके पश्चात् लगभग ईसाके २५५ वर्ष पूर्व अशोकके पुत्र महिन्दने
त्रिपिटकों की शिक्षाका सिंहलमें प्रचार किया । जहाँ के पुरोहितोंने इसको कण्ठ
रख २ कर चलाये रखा । महावंश अध्याय ३३ के अनुसार प्रथम ये राजा वत्तगा-
मणिके समयमें लिखे गये, जिसने ईसासे १०४ वर्ष से ७६ वर्ष पूर्व तक सिंहलका
राज्य किया था । त्रिपिटकके अतिरिक्त अन्य भी बहुतसे ग्रन्थ पाली में लिखे गये थे
जिससे पाली साहित्य बहुत विस्तीर्ण हो गया ।

४ भूमिका ।
कुछ समय के पश्चात् उपरोक्त १९ सम्प्रदायोंमें से कुछ लोप हो गये तथा कुछ
नये उत्पन्न हो गये । इसके परिणामस्वरूप कनिष्कके समयमें चार समुदायोंमें
निम्नलिखित १८ सम्प्रदाय थे—
१. आर्यसर्वास्तिवाद
(१) मूल सर्वास्तिवाद
(२) काश्यपीय
(३) महीशासक
(४) धर्मगुप्तिय
(५) बहुश्रुतीय } ये सब वैभाषिक दर्शनके
(६) ताम्रथारीय } सिद्धान्त वाले हैं ।
(७) विभज्यवादिन्
२. आर्यसम्मतीय
(८) कुरुकुल्लक
(९) आवन्तिक
(१०) वात्सीपुत्रीय
३. आर्यमहासांघिक
(११) पूर्व शैल
(१२) अपर शैल
(१३) हैमवत
(१४) लोकोत्तरवादिन् } ये दार्शनिक विचारोंमें सौत्रान्तिक
(१५) प्रज्ञप्तवादिन् } सम्प्रदायके हैं ।
४. आर्यस्थविर
(१६) महाविहार
(१७) जेतवनीय, और
(१८) अभयगिरिवासिन्
उपरोक्त सब सम्प्रदाय हीनयानके हैं, यद्यपि पीछेसे ये महायानमें भी मिल
गये थे । इनके दार्शनिक विचार क्रमसे वैभाषिक और सौत्रान्तिक मत के हैं ।
कनिष्कके स्थापित किए हुए महायानने माध्यमिक और योगाचार नामके दो और
दार्शनिक सम्प्रदायोंकी नींव रखी । अब बौद्धोंमें चार दार्शनिक सम्प्रदाय हो गये—
(१) वैभाषिक, (२) सौत्रान्तिक, (३) माध्यमिक और (४) योगाचार ।
वैभाषिक सर्वास्तिवाद सम्प्रदायका ही पीछे का नाम है, जो अपने नामके अनुसार
संसारकी आन्तरिक और बाह्य वास्तविकताको स्वीकार करता है । वैभाषिक कहता है
कि हमारा ज्ञान और ज्ञेय ( उस ज्ञानके विषय ) दोनों ही वास्तविक हैं । इस सम्प्रदाय
का मुख्य ग्रन्थ अभिधर्मज्ञान प्रस्थान शास्त्र अथवा केवल ज्ञान प्रस्थान शास्त्र है, जो

भूमिका । ५

बुद्धके ३०० वर्ष पश्चात् बना था । इसका दूसरा ग्रन्थ अभिधर्म महाविभाषा शास्त्र
अथवा केवल विभाषा है, जो सन् ७८ ईस्वीके लगभग कनिष्ककी सभामें बनाया गया
था । इस सम्प्रदायका नाम वैभाषिक इसी विभाषासे आया है। क्योंकि विभाषाका अर्थ
टीका है । ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्धकी शिक्षाओंपर निर्भर करनेकी अपेक्षा
टीकाओंपर ही निर्भर करनेके कारण यह सम्प्रदाय वैभाषिक कहलाता है । संघभद्रका
न्यायानुसार शास्त्र अथवा कोशकारक शास्त्र, ( जो ४८९ ईस्वीके लगभग बना था )
इस सम्प्रदायका बड़ा विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ है ।
सौत्रान्तिक ज्ञान और बाह्य विषयोंकी सत्ताको अनुमानके द्वारा स्वीकार करता है ।
सौत्रान्तिक शब्द सूत्रान्तसे निकाला गया है, जिसका अर्थ सूत्रका अन्त है। सम्भवतः
टीकाओंकी अपेक्षा बुद्धकी शिक्षाओं पर ही निर्भर करने के कारण यह सम्प्रदाय
सौत्रान्तिक कहलाता है। वह मूल जिसके आधार पर सौत्रान्तिक दर्शन बना है आर्य-
स्थविर ( अथवा पालीके अनुसार थेराओं ) और महासांघिकों के सम्प्रदायसे सम्बन्ध
रखता है । यह कहा जाता है कि इस सम्प्रदायके दार्शनिक सिद्धान्तोंको एक धर्मोत्तर
या उत्तरधर्म नामके आचार्यने कनिष्कके समयमें सन् ७८ ई० के लगभग काश्मीरमें
बनाया था । परन्तु चीनी यात्री हुएन्त्सांग ( जो भारतमें ७ वीं शताब्दीके प्रारम्भमें
आया था ) के अनुसार इस सम्प्रदायका संस्थापक तक्षशिलाका प्रसिद्ध अध्यापक
कुमारलब्ध था, जिसने इस विषय पर बहुतसे अमूल्य ग्रन्थ लिखे थे । कुमारलब्ध,
नागार्जुन, आर्यदेव और अश्वघोषके समकालीन थे, अतएव उनके सन् ३०० ई० के
लगभग होनेका अनुमान किया जाता है । दूसरे अत्यन्त प्रसिद्ध अध्यापक श्रीलब्ध थे,
जिन्होंने सौत्रान्तिक सम्प्रदायके विभाषाशास्त्र को लिखा था । हुएन्त्सांगने अयोध्यामें
संघारामके वह खंडहर देखे थे जिनमें श्रीलब्ध रहते थे ।
योगाचारका सिद्धान्त है कि बाह्य पदार्थ तो वास्तविक नहीं हैं किन्तु हमारे
ज्ञानकी वास्तविकताका निषेध नहीं किया जा सकता । योगाचार शब्द योग और
आचार दो शब्दों से बना है। योग करने को योगाचार कहते हैं । भूमियों ( बौद्ध
पूर्णताकी १७ श्रेणियों ) की प्राप्तिका असाधारण कारण केवल योगको ही कहनेके
कारणसे यह योगाचार कहलाता है । योगाचारमें प्रतिपादित किया हुआ मुख्य
सिद्धान्त आलय विज्ञान है । यह चेतनात्मक ( Conscious ) अवस्थाओं का मूल
है और हमारे 'आत्मा' के समान है। इस सम्प्रदायके संस्थापकका कुछ भी पता नहीं
चलता । परन्तु तिब्बत और चीनकी पुस्तकोंमें लंकावतार सूत्र, महासमय सूत्र,
बोधिसत्त्वचर्यानिर्देश और सप्तदश भूमिशास्त्र को इस संप्रदायके प्राचीन तथा प्रामाणिक
ग्रन्थ मानते हैं । मैत्रेयनाथ और आर्य असङ्ग इसके आरंभिक अध्यापक थे ।
ऐसा प्रतीत होता है कि योगाचार की स्थापना लगभग सन् ३०० ई० में हुई थी, जब
कि लंकावतार सूत्र आदि बनाये गये थे ।
माध्यमिकोंका सिद्धान्त है कि हमारा विज्ञान और उनके विषयीभूत बाह्यपदार्थ
२ न्या० भू०

न तो पूर्ण रूपसे वास्तविक और न पूर्ण रूपसे काल्पनिक ही हैं । माध्यमिक शब्द
मध्यमसे बनता है । मध्यम बीच को कहते हैं । दोनों अन्तके सिद्धान्तोंको छोड़नेके
कारणसे यह माध्यमिक कहलाता है । अर्थात् यह न तो सर्वास्तित्ववादी ही है, और न
सबके अस्तित्वका निषेध ही करता है । किन्तु इसने एक बीचका मार्ग चुनकर निश्चय
किया जो कि संसारकी एक वैकल्पिक सत्ता ( Conditional existence ) थी ।
यह कहा जाता है इसके संस्थापक नागार्जुन २५०-३२० ईस्वी तक हुए हैं । किन्तु
वास्तवमें इसके सिद्धान्त उससे प्राचीन ग्रन्थ प्रज्ञापारमितामें मिलते हैं । नागार्जुनकी
माध्यमिक कारिका, बुद्धपालितकी मूल माध्यमवृत्ति, आर्यदेवका हस्तवल, भव्यकी
मध्यमहृदयकारिका, कृष्णका मध्यम प्रतीत्यसमुत्पाद, चन्द्रकीर्तिकी माध्यमिक वृत्ति
और जयानन्दकी माध्यमिकावतार टीका माध्यमिक सम्प्रदायके मुख्य ग्रन्थ हैं ।
नागार्जुनकी एक मूल माध्यमिक वृत्ति अकुतोभयका तिब्बी भाषामें अनुवाद मिलता है,
जिसके अन्तमें माध्यमिक दर्शनके इन आठ प्रचारकों ( Expounders ) के नाम
दिये हुए हैं—१आर्य नागार्जुन, २स्थविर बुद्धपालित, ३चन्द्रकीर्ति, ४देवशर्मा, ५गुणश्री,
६गुणमति, ७स्थिरमति और ८भव्य ( या भावविवेक ) ।
उपर्युक्त चारों दार्शनिक सम्प्रदायोंके साथ ही बौद्ध जनता में न्यायके अध्ययनका
भी विकाश होने लगा । अब चारों ही सम्प्रदायोंके नेता अपने सिद्धान्तके मण्डन और
दूसरोंके सिद्धान्तके खण्डन के लिये न्यायको उपयोगी समझने लगे । जैसा कि माध्यमिक
सम्प्रदायके नागार्जुन और आर्यदेव तथा योगाचार सम्प्रदायके मैत्रेय, असंग और
वसुबन्धुके लेखोंसे स्पष्ट है । अपने पक्षके मण्डन और परपक्षका खण्डन करनेके
लिये उपयोगकी हुई युक्तियोंने अक्षपादके प्राचीन न्यायका प्रचार और बौद्धोंमें बहुतसे
नैयायिकोंको उत्पन्न कर दिया ।
बौद्धोंमें न्यायके ऊपर विस्तारसे प्रथम विचार करने वाला माध्यमिक सम्प्रदायका
प्रवर्त्तक आर्य नागार्जुन था । यह महाकौशल देशके विदर्भ नगरमें आन्ध्र राजा सद्वाह
अथवा सातवाहनके समयमें उत्पन्न हुआ था । इसने कृष्णा नदीके तटपर श्रीपर्वतकी
गुफामें बहुत-सा समय ध्यान करनेमें व्यतीत किया था । ये 'शरह' के शिष्य थे ।
कहा जाता है कि इन्होंने एक बड़े शक्तिशाली राजा भोजदेवको बौद्ध बनाया था ।
बौद्धग्रन्थोंके अनुसार ये बुद्धके निर्वाणके ४०० वर्ष पश्चात् अथवा ईसासे ३३ वर्ष
पूर्व हुए थे । किन्तु म. म. डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणकी सम्मतिमें इनका समय
कुछ पीछे है । इन्होंने अपनी माध्यमिक कारिकामें प्राचीनन्यायके परिभाषिक शब्द
पुनरुक्त, सिद्धसाधन, साध्यसम और परिहारका प्रयोग और अक्षपादके सिद्धान्त
प्रमाणके दीपकके समान स्वपरप्रकाशकत्वका निराकरण किया है । इन्होंने अपने ग्रन्थ
विग्रहव्यावर्त्तनी कारिकामें भी अक्षपादके सिद्धान्तकी समालोचना की थी । प्रमाण
विटेटन या प्रमाणविध्वंसन और उपाय कौशल्यहृदयशास्त्र इनके न्याय पर स्वतन्त्र
ग्रन्थ हैं । किन्तु इनपर प्राचीन न्यायका पूरा प्रभाव पड़ा हुआ है । क्योंकि इनमें

भूमिका । ७
इन्होंने नैयायिकों के १६ पदार्थ माने हैं । कार्यहेतु, स्वभावहेतु और अनुपलब्धि हेतुका
वर्णन भी इन्होंने किया है ।
आर्यदेव ( लगभग ३२० ई० ), मैत्रेय ( लगभग ४०० ई० ), आर्य असंग
( लगभग ४०५-४७० ई० तक ) और वसुबन्धु ( लगभग ४१० से ४९० तक ) ने
भी बौद्धन्यायपर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे हैं । किन्तु इनके ग्रन्थों पर भी प्राचीन न्यायका
पूरा प्रभाव देखनेमें आता है । ये ग्रन्थकार बौद्धन्यायकी आदिम अवस्थाके थे ।
सारांश यह है कि ईसासे पूर्व छठीं शताब्दीमें बौद्ध धर्मकी स्थापनासे लेकर
ईसाकी चौथी शताब्दीमें इसका चार दार्शनिक संप्रदायोंमें विकास होने तक बौद्धन्यायके
ऊपर कोई भी क्रमबद्ध ग्रन्थ नहीं था । केवल दार्शनिक और धार्मिक ग्रन्थोंमें न्यायका
यतस्ततः आभास देखनेमें आता था । नागार्जुनने लगभग ३०० ई० में न्यायपर
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखा । किन्तु वह केवल प्राचीन न्यायके सिद्धान्तोंकी आलोचना
मात्र थी । ई० ४०० से ५०० तक मैत्रेय, असंग और वसुबन्धुने भी न्यायको चलाया,
किन्तु उनका लेख केवल आकस्मिक था । क्योंकि वह योगाचार और वैभाषिकके
सिद्धान्तोंसे मिला हुआ था । हुएन्त्सांगके बतलाये हुए वसुबन्धुकृत तीनों ग्रन्थ अनु-
पलब्ध हैं । अतएव उनके विषयमें कुछ भी नहीं कहा जा सकता । ४५० ई० से वह
समय आया जब न्याय साधारण दर्शनसे बिलकुल पृथक् हो गया और बहुतसे
बौद्ध लेखकोंका ध्यान इधर पूर्णरूपसे आकर्षित हुआ । इनमें दिङ्नागका नम्बर
सबसे पहिला है ।
दिङ्नागको आधुनिक बौद्धन्यायका पिता कहना अनुचित न होगा । क्योंकि
अधिकांश बौद्धन्यायके सिद्धान्तोंकी नींव उसीने डाली है । उसने नालन्द, उड़ीसा,
महाराष्ट्र और दक्षिण ( मद्रास ) की यात्रा की थी । ये जहाँ गये वहाँ इनको अपने
विरोधियोंसे शास्त्रार्थ ही करना पड़ा । उनका सम्पूर्ण जीवन चोटें करने और सहनेमें
ही व्यतीत हुआ । उनके मरने पर भी कालीदास, उद्योतकर, वाचस्पतिमिश्र, मल्लिनाथ,
कुमारिल भट्ट और पार्थसारथिमिश्रने उनके ऊपर कम आक्रमण नहीं किये । वेदान्ती
और जैनी भी उनपर आक्रमण करनेसे न चूके । यहाँ तक कि बौद्धसाधु धर्मकीर्तिने
भी उनका विरोध करनेका प्रयत्न कर ही डाला । दिङ्नागके ग्रन्थोंसे उनकी सार्वतोमुखी
प्रतिभाका खूब परिचय मिलता है । प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश, हेतुचक्रडमरु,
प्रमाणसमुच्चयवृत्ति, प्रमाणशास्त्र न्यायप्रवेश, आलम्बन परीक्षा, आलम्बन परीक्षावृत्ति
और त्रिजालपरीक्षा इनके न्यायपर स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं । इनमें से इनका प्रमाणसमुच्चय
सबसे प्रधान है और यही बौद्धन्यायका पथप्रदर्शक है । इसमें छः अध्याय हैं—
( १ ) प्रत्यक्ष, ( २ ) स्वार्थानुमान, ( ३ ) परार्थानुमान, ( ४ ) हेतु दृष्टान्त, ( ५ )
अपोह और ( ६ ) जाति ।
दिङ्नागके पश्चात् परमार्थ ( ४९८ ई० से ५६९ ई० तक ) हुए । इन्होंने कुछ
बौद्धग्रन्थोंका चीनी भाषामें अनुवाद किया । इन्होंने एक न्यायभाष्य भी लिखा था ।

८ भूमिका।
शंकरस्वामिन् ( लगभग ५५० ई० ) आचार्य दिङ्नागके शिष्य थे। कहा जाता
है कि शंकरस्वामिन् और अन्य दश आचार्योंके द्वारा न्यायशास्त्र दिङ्नागसे शालिभद्र
तक पहुँचा था। इन्होंने एक ग्रन्थ न्यायप्रवेशशास्त्र या न्यायप्रवेशतर्कशास्त्र नामका
लिखा था।
धर्मपाल ( लगभग ६०० से ६३५ ई० तक ) कांचीपुर ( वर्तमान कंजीवरम् )
के राजमन्त्रीके ज्येष्ठ पुत्र थे। यह धर्मकीर्तिके गुरु थे। इन्होंने बाल्यावस्थामें ही वैराग्य
ले लिया था। आरम्भमें ये नालन्द विश्वविद्यालयमें पढ़ने गये, किन्तु पीछेसे ये
उस विद्यालयके प्रधान बना दिये गये। ये योगाचार मतावलम्बी थे। इन्होंने
आलम्बन प्रत्यय ध्यान शास्त्रव्याख्या, विद्यामात्र सिद्धिशास्त्र व्याख्या और शत-शास्त्र
वैपुल्य व्याख्या आदि ग्रन्थ लिखे थे।
शालिभद्र ( ६३५ ई० ) बंगालके राजा समतटके कुटुम्बके थे। ये ब्राह्मण थे।
नालन्द विश्वविद्यालयमें ये धर्मपालके शिष्य थे, जिसके ये उनके पीछे प्रधान हो गये
थे। चीनी यात्री हुएन्टसांग ( सन् ६३५ ई० ) इनका शिष्य था। शालिभद्र बड़े भारी
विद्वान् और नैयायिक थे।
आचार्य धर्मकीर्ति ( लगभग ६३५ से ६५० ई० तक ) के विषयमें आगे विस्तारसे
विचार किया जावेगा।
देवेन्द्रबोधि ( लगभग ६५० ई० ) धर्मकीर्तिके समकालीन थे। इन्होंने प्रमाण-
वार्तिकपंजिका बनाई थी। कहा जाता है कि धर्मकीर्तिने अपने प्रमाणवार्तिकके ऊपर
टीका लिखनेके योग्य देवेन्द्रबोधिको ही चुना। तदनुसार देवेन्द्रबोधिने टीका बनाकर
धर्मकीर्तिको दिखलाई किन्तु उसने उसको धो डाली। देवेन्द्रबोधिने फिर बनाकर
दिखलाई इस बार धर्मकीर्तिने उसको जला दी। किन्तु तीसरी बार देखने पर धर्मकीर्तिने
उसको रहने दी।
शाक्यबोधि ( लगभग ६७५ ई० ) ने जो कि देवेन्द्रबोधिका शिष्य था एक टीका
प्रमाणवार्तिक पंजिका पर बनाई। जिसका नाम उन्होंने प्रमाणवार्तिक ( पंजिका )
टीका रक्खा।
न्यायविन्दुटीका ( धर्मकीर्तिकी न्यायबिन्दु ), हेतुबिन्दु ( धर्मकीर्तिका ) टीका,
वादन्याय ( धर्मकीर्तिकृत ) व्याख्या, सम्बन्धपरीक्षा ( धर्मकीर्तिकृत ) टीका, आल-
म्बनपरीक्षा ( दिङ्नागकृत ) टीका और सन्तानान्तरसिद्धि ( धर्मकीर्तिकृत ) टीकाके
कर्त्ता विनीतदेव ( लगभग ७०० ई० ) राजा गोविन्दचन्द्रके पुत्र राजा ललितचन्द्रके
समयमें नालन्दमें रहते थे। धर्मकीर्तिकी मृत्यु भी गोविन्दचन्द्रके समयमें हुई थी।
गोविन्दचन्द्रके पिता विमलचन्द्रका विवाह भर्तृहरि ( जो मालवेके प्राचीन राजवंशके
थे।) की बहिनसे हुआ था। यदि हम भर्तृहरि और इस नामके वैयाकरणीको जो
६५१ या ६५० ई० में परलोक गये एक ही व्यक्ति मान लें तो हम उनके समकालीन
गोविन्दचन्द्रको ७ वीं शताब्दीके मध्यमें रख सकते हैं। धर्मकीर्तिकी मृत्युका भी

यही समय है। इससे परिणाम निकाला जा सकता है कि गोविन्दचन्द्रके पुत्र
ललितचन्द्र ७वीं शताब्दीके अन्तमें हुए होंगे। अतएव ललितचन्द्रके समकालीन
विनीतदेव भी उसी समय हुए होंगे। क्योंकि यह विचार धर्मकीर्तिके समयसे भी मिलता
है (जिसकी उसने टीका की थी।)
रविगुप्त (लगभग ७२५ ई०) काश्मीरमें उत्पन्न हुए थे। ये वारेन्द्रके राजा
हर्षके समकालीन थे और न्यायमंजरीकार जयन्तसे पूर्व उत्पन्न हुए थे। ये अवश्य
ही सातवीं शताब्दीके पूर्वार्धमें रहे होंगे। क्योंकि उनका शिष्य प्रसिद्ध तांत्रिक साधु
सर्वज्ञ मित्र उस शताब्दीके मध्यमें था। गुप्त सम्वत् ४३५ (७५४ ई०) में वसन्तसेनके
लेखोंमें उनको सर्वदण्डनायक और महाप्रतिहार कहा गया है। उन्होंने धर्मकीर्तिके
प्रमाणवार्तिकपर प्रमाणवार्तिकवृत्ति बनाई थी।
विशालामलवती नाम प्रमाण समुच्चयटीकाके लेखक जिनेन्द्रबोधि (लगभग ७२५ ई०)
थे। सम्भवतः ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने ८वीं शताब्दीमें पाणिनिव्याकरणके ऊपर
प्रसिद्ध न्यास लिखा था।
शान्तरक्षित (७४९ ई०) जहूर (बंगालमें या लाहौरके पास) के राजवंशमें
उत्पन्न हुए थे। यद्यपि इनका समय अनिश्चित ही है तथापि यह कहा जाता है कि
वह गोपाल (जिसने ७०५ ई० तक राज्य किया) के समयमें जन्मे और धर्मपाल
(जो ७६५ में राजा हुआ) के समयमें मरे थे। वे स्वतन्त्र माध्यमिक मतके अनु-
यायी और नालन्दके अध्यापक थे। ये राजा खीस्रानडीत्सान Khrisron-dea-
tsan (जो ७२८ ई० में उत्पन्न और ८६४ ई० में मरा) के निमन्त्रणपर तिब्बत
गये थे। राजाने शान्तरक्षितकी सहायतासे ७४९ ई० में समयेके बिहार (Monas-
tery of sam-ye) को बनवाया था जो मगधके उदन्तपुर विहारके जैसा बनाया
गया था। तिब्बतमें समये सबसे पहिला नियमित विहार था और शान्तरक्षित उसके
पहिले महन्त थे। उन्होंने तिब्बतमें १३ वर्ष तक अर्थात् ७६२ ई० तक कार्य किया।
वे वहां आचार्य बोधिसत्त्वके नामसे प्रसिद्ध थे। वे निम्नलिखित ग्रन्थोंके कर्ता थे
वादन्यायवृत्ति विपंचितार्थ, धर्मकीर्तिके वादन्याय की टीका और तत्त्वसंग्रहकारिका-
यह ३१ अध्यायोंका अमूल्य दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें सांख्य जैन आदिका खण्डन भी है।
न्यायबिन्दु पूर्वपक्षे संक्षिप्त (धर्मकीर्तिके न्यायबिन्दु की समालोचनाओं का संक्षेप)
और तत्त्वसंग्रह पंजिका (शान्तरक्षितके तत्त्वसंग्रहकी टीका) के कर्ता कमलशील
(लगभग ७५० ई०) शान्तरक्षितके अनुगामी थे। इन्होंने तिब्बतमें महायान होशंग
नामक चीनी साधुको पराजित करके बड़ा नाम कमाया था।
सर्वज्ञसिद्धि कारिका, बाह्यार्थसिद्धिकारिका, श्रुतिपरीक्षा, अन्यापोहविचार कारिका
और ईश्वरभंग कारिकाके कर्ता कल्याणरक्षित धर्मोत्तराचार्यके गुरु थे। ये राजा धर्मपाल
के समकालीन थे, जिनका देहान्त ८२९ ई० में हुआ था।

१० भूमिका ।
धर्मोत्तराचार्य ( लगभग ८४७ ई० )
धर्मोत्तर, जिसका वर्णन 'तारानाथ की गेस्चिच्टे देव बुद्धिज्मस वॉन शीफनर'
के पृ० २२५ और 'ड्पाग-व्साम-व्जान' के पृ० १४४ में किया गया है—जिनको
आचार्य धर्मोत्तर या धर्मोत्तराचार्य भी कहते हैं—तिब्बी भाषामें 'चांस-म्च्वांग' के
नामसे प्रसिद्ध है । ये कल्याणरक्षित और काश्मीरके धर्माकरदत्तके शिष्य थे । यह
प्रतीत होता है कि राजा वाणपालके बंगालमें राज्य करनेके समयमें ही ये कश्मीरमें
हुए थे । ब्राह्मण नैयायिक श्रीधर ( लगभग ९९१ ई० ) ने अपने ग्रन्थ न्यायकन्दली
( पृ० ७६ विजयानगरम् सीरीज ) में, धर्मोत्तरटिप्पणकके कर्ता जैन दार्शनिक मल्लि-
वादिन्ने लगभग ९६२ ई० के धर्मोत्तरकी न्यायविन्दुटीकाकी टीका धर्मोत्तर टिप्पणकमें
और प्रसिद्ध स्याद्वादरत्नाकरावतारिका के कर्ता रत्नप्रभसूरिने ११८१ ई० में इनके
नामका उल्लेख किया है ।
( मल्लिवादिन्‌के ग्रन्थमें उसका संवत् ८८४ पड़ा हुआ है । यदि इसे विक्रम
माना जावे तो यह ८२७ अथवा यदि इसे शक माना जावे तो यह ९६२ ई० होता है ।
एक प्रकारके विद्वानोंका मत है कि मल्लिवादिन् धर्मोत्तरके समकालीन थे किन्तु दूसरे
प्रकार के विद्वान् उनका समय एक शताब्दी पीछे निर्धारित करते हैं । )
धर्मोत्तराचार्यके बनाये हुए निम्नलिखित ग्रन्थोंका पता चलता है—
१. न्यायविन्दुटीका-धर्मकीर्तिके न्यायविन्दु पर विस्तृत टीका । यह अपनी मूल
अवस्थामें छप कर पाठकोंके हाथ में है । इसका तिब्बी अनुवाद भी मिलता है ।
धर्मोत्तराचार्यके निम्नलिखित ५ ग्रन्थोंकाऔर पता चला है। किन्तु उनका संस्कृत
लुप्त है । केवल तिब्बी अनुवाद मिलता है । वे ग्रन्थ ये हैं—
२. प्रमाणपरीक्षा, ३. अपोह नाम प्रकरण, ४. परलोकसिद्धि, ५. क्षणभङ्गसिद्धि
और ६. प्रमाणनिश्चय टीका-यह धर्मकीर्तिके प्रमाणविनिश्चयकी टीका है ।
धर्मोत्तराचार्यके पश्चात् बौद्ध न्यायके अन्य भी अनेक विद्वान् हुए हैं । किन्तु
उन्होंने न्यायविन्दुके ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं लिखा । अतएव अपना प्रयोजन निकल
जानेसे हम इस विषयको यहीं समाप्त करके अब न्यायविन्दुकार धर्मकीर्तिके ऊपर
विचार करते हैं ।
( ३ ) धर्मकीर्ति ।
( धर्मकीर्तिके विषयमें अनेक ग्रन्थोंमें खोजने पर भी हमको डाक्टर सतीशचन्द्र
विद्याभूषणके इतिहाससे विशेष कहीं भी नहीं मिला । अतएव यहां उन्हीं का अविकल
अनुवाद दिया जाता है—)
जीवन चरित्र ।
धर्मकीर्ति दक्षिणके चूडामणि ( सम्भवतः यह चोल देशका नाम है ) राज्यमें
उत्पन्न हुए थे । यद्यपि इस नामका कोई भी देश नहीं है तथापि सभी प्रकारके विद्वान्
त्रिमलयको धर्मकीर्तिकी जन्मभूमि कहते हैं । सम्भव है कि त्रिमलयका ही प्राचीन

भूमिका। ११
नाम चूडामणि रहा हो । उनके पिता ब्राह्मण जातिके तीर्थ थे । ( बौद्धलोग अपने और
जैनधर्मके अतिरिक्त शेष भारतीय धर्मवालोंको तीर्थ कहते थे ।) उनका नाम परिव्राजक
कुरुनन्द था । धर्मकीर्ति बाल्यावस्थासे ही बड़े बुद्धिमान् और प्रतिभाशाली थे । अतएव
ये शीघ्र ही वेद, वेदाङ्ग, वैद्यक, व्याकरण आदि तीर्थों के सभी सिद्धान्तोंमें दक्ष हो
गये । १६ या १८ वर्षकी अवस्थामें ही ये तीर्थोंके दर्शनशास्त्रके अच्छे विद्वान् पण्डित
हो गये । ये प्रायः बौद्धधर्मके व्याख्यान भी सुना करते थे अन्तमें इनको विश्वास हो
गया कि बौद्ध सिद्धान्त बिलकुल निर्दोष है । अब ये पूर्णरूपसे बौद्ध धर्मकी ओर
झुकने लगे । इन्होंने अपना वेष बौद्ध उपासकों का सा बनाया । जब ब्राह्मणोंने इनसे
इसका कारण पूछा तो इन्होंने बौद्धधर्मकी प्रशंसा की । ये इसी बात पर जातिच्युत
कर दिये गये । इसके पश्चात् ये मध्यदेशमें आये । ( यद्यपि तिब्बतदेशीय साहित्यमें
मध्यदेश मगध को कहा है परन्तु मनुजी ने उत्तरमें हिमालय, दक्षिणमें विन्ध्याचल,
पूर्वमें प्रयाग और पश्चिममें सरस्वती ही के बीचके देशको मध्यदेश कहा है । जैसा कि
कहा है—'हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये यत् प्राग् विनशनादपि । प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः
प्रकीर्तितः ॥ मनु० ॥ २ ॥ २१ ॥' ) यहां इनको आचार्य धर्मपालने संघमें प्रविष्ट कर
लिया । इन्होंने यहाँ त्रिपिटकोंका अध्ययन किया । अब इनको ५०० सूत्रधारणी
कण्ठ याद हो गई ।
धर्मकीर्ति और कुमारिल ।
ये तीर्थमतके गुप्त सिद्धान्तोंके जानने की अभिलाषासे दासोंका सा वेष बनाकर
दक्षिण की ओर गये । यहाँ इनको पूछनेसे विदित हुआ कि ब्राह्मण कुमारिल उक्त
विषयके अद्वितीय विद्वान् थे । भारतीय ग्रन्थ कुमारिलके धर्मकीर्तिका चाचा होने की
किम्बदन्ती का समर्थन नहीं करते । कुमारिलके पास राजा की दी हुई बड़ी भारी
सम्पत्ति थी । इनके पास बहुतसे चावलोंके खेत, ५०० दास, ५०० दासियां और कई
सौ आदमी थे । जब धर्मकीर्तिने उनके यहां सेवाकार्यमें प्रवेश पाकर बाहर और भीतर
के ५० दासोंका काम संभाल लिया तो कुमारिल और उनकी स्त्री सन्तुष्ट हो गये ।
अब धर्मकीर्ति को गुप्त सिद्धान्तोंके सुननेकी आज्ञा मिल गई । धर्मकीर्तिने कुमारिलसे
गुप्तशिक्षाका ज्ञान प्राप्त करके उनका घर छोड़ दिया । कुमारिलसे उसको अपनी विशेष
सेवाके बदलेमें कुछ धन भी मिला था, जिससे उसने अपनी यात्राकी रात्रिमें ब्राह्मणों
को एक बड़ा भोज दिया ।
अब उसने कणादके मत वाले कणादगुप्त और तीर्थमतके अन्य अनुयायियों को
शास्त्रार्थके लिए आह्वान किया और उनसे शास्त्रार्थ करने लगा । शास्त्रार्थ बराबर तीन
मास तक होता रहा, जिसमें उसने अपने सभी विपक्षियों को पराजित कर दिया और
उनमेंसे बहुतोंको बौद्ध बना लिया । इसपर कुमारिलको बड़ा क्रोध आया । वह ५००
ब्राह्मणोंको लेकर शास्त्रार्थके लिये अग्रसर हुए । कुमारिलने प्रस्ताव किया कि
शास्त्रार्थमें जो पराजित हो वह मार डाला जावे । किन्तु धर्मकीर्तिने जो कुमारिलकी

१२ भूमिका ।
मृत्यु नहीं चाहता था, आग्रह किया कि पराजित व्यक्ति विजेताके धर्मको स्वीकार कर
ले । इस प्रकार धर्मको पारितोषिकके रूपमें रखकर दोनों शास्त्रार्थमें भिड़ गये ।
किन्तु विजयश्री अन्तमें धर्मकीर्तिके ही हाथ रही । कुमारिल और इसके ५०० अनुगामी
बौद्ध हो गये ।
उसकी दिग्विजय ।
धर्मकीर्तिने इसके पश्चात् निर्ग्रन्थ (दिगम्बर जैनी) रघुव्रतिन् और दूसरोंपर
जो विन्ध्याचलमें रहते थे विजय पायी । उसने द्रवली ( द्राविड ) को लौटते हुए घोषणा
करादी कि जो तैयार हो आकर शास्त्रार्थ करे । तीर्थ लोगोंकी अधिकांश संख्या भाग
गयी और कुछने बिलकुल स्वीकार कर लिया कि उस युद्धमें उनके समान नहीं थे ।
उसने उस देशकी उन सब धार्मिक संस्थाओंका जो अवनत दशामें पड़ी हुई थीं,
उद्धार किया और फिर वह गहन वनमें जाकर एकान्त सेवन और ध्यान
करने लगा ।
धर्मकीर्तिने अपने जीवनकी समाप्तिके दिनोंमें कलिङ्ग देशमें एक विहार बनवाया
और बहुतसे लोगोंको अपने धर्ममें दीक्षित कर परलोकवासी हुआ । उसके वह शिष्य
जिनकी आत्मा ब्रह्मके समान हो गयी थी उसको दाहसंस्कारके लिये श्मशानभूमिमें ले
गये । वहाँ एक पुष्पोंकी भारी वृष्टि हुई और सात दिन तक सारा देश सुगन्ध और
रागोंसे भरा रहा ।
ये आचार्य ( धर्मकीर्ति ) और तिब्बतका राजा स्रोत्सँगम्पो समकालीन कहे जाते
हैं, जो कि प्रमाण रूपमें माना जा सकता है ।
धर्मकीर्त्तिका समय ।
इस कथनमें यह स्पष्ट है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था । धर्मपाल ६३५ ई०
में जीवित था (जैसा कि हुएन्त्सांगके लेखोंसे स्पष्ट है ) अतएव धर्मकीर्ति भी उस
समयके लगभग अवश्य रहा होगा । यह समय धर्मकीर्तिके राजा स्रोत्सँगम्पो का
समकालीन होनेके भी अविरुद्ध है, जो ६२७-६९८ तक जीवित रहा । ऐसा प्रतीत
होता है कि ६३५ ई० में धर्मकीर्ति बहुत छोटा था, क्योंकि हुएन्त्सांगने उसका नाम
नहीं लिया है । इसके विरुद्ध इत्सिंग, जिसने भारतमें ६७१-६९५ ई० तक यात्राकी
दिङ्नागके पश्चात् 'धर्मकीर्तिने न्यायमें आगे कैसे उन्नति की' का वर्णन प्रभावपूर्ण
शब्दोंमें करता है। धर्मकीर्तिने ब्राह्मण नैयायिक उद्योतकर पर आक्षेप किया है। इसके
विरुद्ध बृहदारण्यकवार्तिकके रचयिता मीमांसक सुरेश्वराचार्य और अष्टसहस्रीके रचयिता
दिगम्बर जैन विद्यानन्दिने धर्मकीर्तिकृत प्रत्यक्षके लक्षणकी समालोचना की है ।
धर्मकीर्ति अन्य ग्रन्थोंमें केवल कीर्ति भी कहा गया है। वाचस्पति मिश्रने भी धर्मकीर्तिकी
समालोचना करनेके लिये उनका नाम लिया है ।

भूमिका । १३
धर्मकीर्तिकी रचनायें ।
धर्मकीर्तिने निम्नलिखित ग्रन्थ बनाये —
१. प्रमाणवार्त्तिककारिका—यह ग्रन्थ मूल संस्कृतमें तो लुप्त है । किन्तु इसका
तिब्बती भाषामें अनुवाद मिलता है । इस ग्रन्थके बनाये जानेकी कथा भी बड़ी रोचक
है । कहते हैं कि एक दिन धर्मकीर्ति दिङ्नागके शिष्य ईश्वरसेनके यहां गये । वहां
इन्होंने दिङ्नागका प्रमाणसमुच्चय सुना । धर्मकीर्ति उसको प्रथम वार सुननेसे ईश्वरसेनके
समान उस ग्रन्थके विद्वान् बन गये उन्होंने उसको दोबारा फिर सुना इस वार वह
दिङ्नागके समान बन गये । और तीसरी वार सुननेपर उन्होंने उसमेंकी कई
गलतियां निकालीं । उन्होंने वे अशुद्धियां ईश्वरसेनको बतलायीं । जिसने गुरुनिन्दापर
अप्रसन्न होनेके स्थानमें उनसे एक समालोचनात्मक टीका बनानेको कहा । उसी
परिश्रमका फल स्वरूप यह ग्रन्थ है । इसमें चार अध्याय हैं—जिनमेंसे प्रथममें
स्वार्थानुमान, द्वितीयमें प्रमाणसिद्धि, तृतीयमें प्रत्यक्ष और चतुर्थमें परार्थवाक्य का
वर्णन है ।
२. प्रमाणवार्त्तिकवृत्ति—यह प्रमाणवार्त्तिककारिकाकी टीका है । इसका भी मूल
लुप्त होकर तिब्बती अनुवाद ही शेष है ।
३. प्रमाणविनिश्चय—इसमें न्यायबिन्दुके ही समान प्रत्यक्ष, स्वार्थानुमान और
परार्थानुमान नामके तीन परिच्छेद हैं । इसका भी सम्भवतः मूल लुप्त और तिब्बती
अनुवाद ही शेष है ।
४. न्यायबिन्दु—यह ग्रन्थ पाठकोंके सामने है । इसका वर्णन आगे किया जावेगा ।
५. हेतुबिन्दुविवरण—इसमें तीन अध्याय हैं, जिनमें क्रमसे स्वभावहेतु, कार्यहेतु,
और अनुपलब्धिहेतु का वर्णन किया गया है ।
६. तर्कन्याय या वादन्याय—मूल इसका भी सम्भवतः लुप्त ही है ।
७. सन्तानान्तरसिद्धि—
८. सम्बन्धपरीक्षा—और
९. सम्बन्धपरीक्षा वृत्ति—यह सम्बन्धपरीक्षाकी टीका है।
( ४ ) धर्मकीर्तिका संप्रदाय ।
यद्यपि धर्मकीर्तिके विषयमें ऊपर (इस छोटी-सी भूमिकामें) कम नहीं लिखा गया
तथापि उसके सम्प्रदायको जाने बिना यह विषय अधूरा ही रह जाता है । इस विषयमें
सब एक मत हैं कि वह माध्यमिक नहीं था क्योंकि माध्यमिक दर्शन शून्यवाद है
और धर्मकीर्तिके ग्रन्थोंमें स्थान २ पर अनेक पदार्थ देखनेमें आते हैं । अतएव
माध्यमिक न होनेसे वह या तो बाह्यार्थास्तित्ववादी (सौत्रान्तिक और वैभाषिक) ही
हो सकता है या विज्ञानाद्वैतवादी (योगाचार) ही हो सकता है । अतएव अब हम
इसीपर विचार करेंगे कि वह इन दोनोंमेंसे किस मतका अनुयायी था ।
३ न्या० भू०

१४ भूमिका ।
यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था और यह भी
बतला दिया गया है कि धर्मपाल योगाचार ( विज्ञानाद्वैतवाद ) मतावलम्बी था ।
अतएव जो मत गुरुका हो वही शिष्यका भी होना चाहिये । किन्तु न्यायविन्दुमें स्थान
स्थान पर ऐसे वाक्य आये हैं जिनसे बाह्य अर्थका अस्तित्व स्पष्ट प्रतीत होता है ।
उदाहरणके लिये ऐसे कुछ वाक्य दिये जाते हैं—
‘इन्द्रियज्ञानम्’ पृ० १२
‘स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तरप्रत्ययेन जनितं तन्मनो-
विज्ञानम्’ पृ० १३
‘सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम्’ पृ० १४
‘भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति’ पृ० १४ इत्यादि २ ।
न्यायविन्दुके इस प्रकारके वाक्य ही इस प्रश्नको उपस्थित करते हैं कि वह
बाह्यार्थास्तित्ववादी था या विज्ञानाद्वैतवादी ? क्योंकि यद्यपि योगाचार बाह्य अर्थको
नहीं मानता तथापि उपचारसे उसको वह भी मानता ही है । यदि हम धर्मकीर्तिको
विज्ञानाद्वैतवादी मान लें तो न्यायविन्दुके बाह्यार्थास्तित्ववाचक शब्दोंको औपचारिक
मानना पड़ेगा । किन्तु उन वाक्योंके ढंगसे ऐसा प्रतीत नहीं होता । यदि उक्त वाक्य
औपचारिक होते तो उनमेंसे किसीमें तो उपचारवाचक शब्द अवश्य ही होता किन्तु
ऐसा कोई शब्द न्यायविन्दुमें उपलब्ध नहीं है । अतएव धर्मकीर्तिको विज्ञानाद्वैतवादी
मानना युक्तिसंगत नहीं है ।
इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि धर्मकीर्ति पहिले तीर्थमतका था । उसके
दिग्विजयसे प्रतीत होता है कि उसका मनन वैशेषिक आदि मतोंका विशेष था ।
वेदान्तियोंसे उसकी किसी भी भिज्ञताका पता नहीं चलता है । अतएव बौद्ध होनेसे
पूर्व वह बाह्य और आन्तर दोनों प्रकारके पदार्थके अस्तित्वको माननेवाले किसी
दर्शनका अनुगामी होगा । सो दोनोंके अस्तित्वको माननेवालेकी दूसरी सीढ़ी एकको ही
मानना या न मानना हो सकती है और वह सीढ़ी बाह्यार्थास्तित्ववाद है । अतएव
धर्मकीर्ति बाह्यार्थास्तित्ववादी था ।
तीसरी बात यह भी है कि नैयायिक प्रायः कमसे कम बाह्य अर्थको माननेवाले
होते हैं । जैन यद्यपि बाह्य और आन्तर दोनों अर्थको मानते हैं तथापि शास्त्रार्थकी
झंझटोंको दूर करने और विपक्षीको आक्षेपका मौका न देनेके लिये ही उनको मतिज्ञान-
रूप परोक्षज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहना पड़ा है । अतएव ऐसी दशामें यह आशा
नहीं की जा सकती कि बौद्ध न्यायका उद्धार कर्ता धर्मकीर्ति बाह्य अर्थतकका स्पष्ट
रूपसे अस्तित्व न मानता होगा ।
( ५ ) धर्मकीर्तिका बौद्ध न्यायमें स्थान ।
धर्मकीर्तिके बौद्धन्यायमें स्थानको लिखनेसे पूर्व यह प्रश्न उपस्थित होता है कि
धर्मकीर्तिका बौद्ध दर्शनमें क्या स्थान है ? किन्तु उसके बनाये हुए किसी भी दार्शनिक

भूमिका । १५

ग्रन्थके सामने न होनेसे हम इस विषयपर लिखनेमें असमर्थ हैं। क्योंकि केवल न्यायके
ग्रन्थके आधारपर दार्शनिक विषयकी समालोचना करना हम योग्य नहीं समझते ।
यह पीछे प्रगट किया जा चुका है कि आचार्य दिङ्नाग आधुनिक बौद्ध न्यायके
जन्मदाता थे । किन्तु गौतम न्यायसूत्रके वात्स्यायन भाष्यकी टीका न्यायवार्तिकके
रचयिता उद्योतकरने अपने ग्रन्थ में उनकी खूब समालोचना की है । उस समय इस
समालोचनासे ब्राह्मणोंका प्रभाव बहुत कुछ बढ़ गया और बौद्धोंका घट गया ।
दिङ्नागसे धर्मकीर्ति तकके बीचमें कोई भी ऐसा बौद्ध नैयायिक नहीं हुआ जो उस
उखड़ी हुई प्रतिष्ठाको जमाता । किन्तु धर्मकीर्तिने स्थान २ पर शास्त्रार्थ करके बौद्ध-
मतका इतना प्रचार किया कि उसके पीछेके प्रायः सभी दर्शनोंके न्यायवालोंने उसकी
समालोचना करनेमें ही अपना गौरव समझा । इन्होंने न्यायवार्तिककी भी समालोचना
खूब की थी । इनके पश्चात् बौद्ध नैयायिकोंमें ऐसा दमदार कोई नैयायिक नहीं हुआ ।
इसलिये जबकि हम दिङ्नागको आधुनिक न्यायका जन्मदाता कहते हैं तो धर्मकीर्तिको
बौद्धन्यायका उद्धारक कहना बहुत योग्य होगा ।
( ६ ) धर्मकीर्तिकृत दिङ्नागका खण्डन ।
प्रमाणवार्तिककारिकाके बननेके वर्णनमें कहा जा चुका है कि धर्मकीर्तिने दिङ्नागके
ग्रन्थमें उसकी गलतियां पकड़ीं । यद्यपि हमारे सामने प्रमाणवार्तिककारिका उपस्थित
नहीं है तथापि न्यायविन्दु टीकासे दिङ्नागसे धर्मकीर्तिका मतभेद स्पष्ट प्रगट हो
जाता है । यद्यपि डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणने इस विषयपर भी काफी लिखा है
किन्तु इस स्थलपर उस विषयमें न लिखना भी अनुचित होगा अतएव हम यहां पर
वही विषय डाक्टर साहिबसे अभिन्न सम्मति रखते हुए लिखते हैं—
इष्टविघातकृत् विरुद्ध ।
हेतुके साध्यके विरुद्ध होनेको दिङ्नाग और धर्मकीर्ति दोनोंने ही हेत्वाभास माना
है । किन्तु दिङ्नागने अपने न्यायप्रवेशमें हेतुके अभिलषित ( Implied ) साध्यके
( जिस समय साध्य अनिश्चित अथवा संदिग्ध हो ) विपरीत होनेको पृथक् हेत्वाभास
माना है, जिसको उन्होंने इष्टविघातकृत् विरुद्ध नाम दिया है । किन्तु धर्मकीर्तिने
अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इस सम्मतिको यह कह कर अग्राह्य माना है कि दूसरा
विरुद्ध हेत्वाभास प्रथममें ही गर्भित हो जाता है । ( तत्र च तृतीयोऽपि इष्टविघात-
कृत् विरुद्धः ?···स इह कस्मान्नोक्तः । अनयोरेव अन्तर्भावात् ।
अयं च विरुद्धः
आचार्यदिङ्नागेनोक्तः । स कस्मात् वार्तिककारेण सता त्वया नोक्तः । न्या० पृष्ठ
७९, ८०भाषा पृ० २२ ) इष्टविघातकृत् विरुद्धका एक उदाहरण दिया जाता है—
नेत्र आदि दूसरेके उपयोगके लिये हैं । क्योंकि वह संघातरूप हैं । जैसे-शयन,
आसन आदि ।
यहाँ साध्य दूसरेके लिये अनिश्चित या संदिग्ध है । क्योंकि वह संघात

१६ भूमिका।
(उदाहरणके लिये शरीर) और असंघात (उदाहरणके लिये जीव) दोनोंको
ही बतला सकता है। यदि वक्ता 'दूसरेके लिये' शब्दको असंघात अर्थमें प्रयोग
करे जिसको श्रोता संघात अर्थमें समझ जावे तो उस समय साध्य हेतुके विरुद्ध हो
जावेगा। उस समय वह हेतु इष्टविघातकृत् विरुद्ध कहलाता है।
धर्मकीर्तिने अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इसको पहिले विरुद्धका ही उदाहरण माना
है। क्योंकि अनुमान वाक्यमें प्रयोग किये हुए साध्यवाचक शब्दका एक ही अर्थ
हो सकता है। और यदि कहे हुए और समझे हुए अर्थोंमें सन्देह हो तो प्रकरणसे
पहिले वास्तविक अर्थ निश्चय कर लेना चाहिये। यदि प्रयोग किया हुआ अर्थ
वास्तविक होगा तो सा य और हेतुमें स्वाभाविक विरोध होगा।
विरुद्धव्यभिचारी।
दिङ्नागने एक और हेत्वाभास 'विरुद्धाव्यभिचारी' भी माना है, जिसको उसने
सन्देहका कारण कहा है। यह ऐसे स्थानपर होता है जब दो विरुद्ध परिणाम एक ही
हेतु (Valid truth reason) से पुष्ट किये जाते हैं।
उदाहरणके लिये-एक वैशेषिक दार्शनिक कहता है-
शब्द अनित्य है क्योंकि वह उत्पन्न होता है।
एक मीमांसक उत्तर देता है-
शब्द नित्य है क्योंकि वह श्रव्य (सुनने योग्य) है।
उपरोक्त मामलों में काममें लाये हुए दोनों हेतु क्रमसे वैशेषिक और मीमांसाके
सिद्धान्तके पुष्ट करनेके कारण उन २ दर्शनकारों द्वारा ठीक माने जाते हैं। किन्तु
दो विरुद्ध परिणामोंपर लेजानेसे वह अनिश्चित है। और इसीलिये वह हेत्वाभास है।
धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुमें विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभासका निषेध (न्या० पृ०
८६-८८ भाषा० पृ० २४-२५) किया है। इसका कारण उन्होंने यह दिया है
कि यह न तो अनुमानके विषयमें ही उठता है और न शास्त्र ही इसका आधार है।
हेतुका साध्यमें स्वभाव, कार्य या अनुपलब्धि रूपमें रहना आवश्यक है और उसके
द्वारा ठीक परिणाम निकलना चाहिये।
परस्परविरोधी दो परिणाम ऐसे हेतुओंसे पुष्ट नहीं हो सकते जो ठीक (Valid)
हैं। परस्पर विरुद्ध दो परिणामोंके सिद्ध करने में दो शास्त्र उसी प्रकार सहायता नहीं
कर सकते जिस प्रकार एक शास्त्र प्रत्यक्ष और अनुमानको पुष्ट नहीं कर सकता और
वह केवल बुद्धिके न पहुँचने योग्य विषयोंमें ही प्रमाण होता है। इसलिये विरुद्धव्य-
भिचारी असंभव है।
दृष्टान्तका कार्य।
दिङ्नागके विरोधमें धर्मकीर्ति (त्रिरूपो हेतुरुक्तः। तावतैव अर्थप्रतीतिरिति न
पृथग् दृष्टान्तो नाम साधनायवः कश्चित्। तेनास्य लक्षणं पृथग् [ न ] उच्यते गतार्थ-
त्वात्। (न्या० पृ० ९१ भाषा० पृ० २६) सम्भवतः 'न' भूलसे छूट गया है।

भूमिका । १७
तिब्बती अनुवादमें ‘न’ मिलता है ।) कहता है कि ‘दृष्टान्त’ नामका कोई साधनका
अवयव नहीं है । क्योंकि इसका हेतुमें अन्तर्भाव हो जाता है । जैसे—
पर्वतमें अग्नि है क्योंकि वहाँ धूम है । जैसे पाकशाला में ।
इस वाक्यमें दृष्टान्त पाकशाला और उसी प्रकारकी अन्य वस्तुएं हेतु में ही
आजाती हैं । अतएव ‘दृष्टान्त’ पाकशालाको पृथग् कहना व्यर्थ है । धर्मकीर्ति
कहता है कि इतना होने पर भी दृष्टान्त का यह मूल्य है ही (...................
उक्तम् अभेदेन···पुनर्विशेषेण दर्शनीयायुक्तौ ) कि यह हेतुके द्वारा साधारण रूपसे
कथन लिये हुए को विशेषरूपसे बतला देता है । इस प्रकार साधारण कथन ‘सब
धूम वाली वस्तु अग्नि वाली होती हैं’ को विशेष दृष्टान्त पाकशाला ने अधिक
जोरदार बना दिया जो कि धूम वाली भी है और अग्नि वाली भी है ।
( ७ ) न्यायबिन्दु तथा उसका न्याय ।
इस बातको प्रमाणित करने की अब कोई आवश्यकता नहीं रह गई है कि प्राचीन
कालमें सब दर्शनकारोंने अपनी २ प्रमाण व्यवस्था पृथक् ही खड़ी की थी । यद्यपि
यह आवश्यक नहीं था कि उन सबकी व्यवस्थाएं एक दूसरेसे भिन्न ही हों तथापि
अपनी मानी हुई वस्तुके स्वरूपको बतलाने तथा अपनी युक्तियोंको सिद्ध करनेके लिये
पृथक् ही प्रमाणकी आवश्यकता थी । जहां दर्शन पदार्थोंका वर्णन करता है वहां
न्याय उन पदार्थोंको सिद्ध करने वाली युक्तियोंका वर्णन करता है । इस प्रकार दर्शन
और न्याय दोनों सापेक्ष हैं । प्रमाण सामान्यका लक्षण तो एक प्रकारसे विशुद्ध
दार्शनिक विषय है अतएव इस पर हम पृथक् विचार करेंगे ।
यह पीछे प्रमाणित किया जा चुका है कि यद्यपि बौद्धन्याय गौतमके न्यायदर्शन-
के पीछे बना है तथापि भारतके दार्शनिकोंको विशुद्ध न्यायके ही ग्रन्थोंको लिखनेका
मार्ग बौद्ध नैयायिकोंने ही दिखलाया है । गौतमीय न्याय अथवा प्राचीन न्याय, दर्शन
और न्यायका मिला हुआ ग्रन्थ है । किन्तु बौद्धोंने अपने न्यायग्रन्थोंकी स्वतन्त्र रचना
करके उस समय भारतपर अपना सिक्का जमा लिया । ब्राह्मणोंके पास तो पहिलेसे
ही न्याय दर्शन था । अतएव उन्होंने उसकी ही टीका प्रटीकाओं तथा उसी ढंगके
अन्य ग्रन्थोंपर ही भरोसा रखा, किन्तु जैन नैयायिकोंसे यह सहन न हुआ । अस्तु,
उन्होंने भी बौद्धोंके समान न्यायके ऊपर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने आरम्भ किये । भारतका
मध्यकालीन दार्शनिक इतिहास जैन और बौद्ध धर्मोंके ही शास्त्रार्थोंसे भरा पड़ा है ।
धीरे २ कालयोगसे ब्राह्मणोंका फिर प्राबल्य हुआ । उस समय अपनी कुछ आन्तरिक
निर्बलताओं तथा कुछ जैन और ब्राह्मणोंके धक्केसे बौद्ध धर्मपर तो ऐसा आघात
पहुंचा कि वह भारतसे अदृश्य ही हो गया । किन्तु जैन धर्म किसी प्रकार सबकी
चोटें सहता हुआ अभी तक भारतवर्षमें फैल ही रहा है । मिथिला तथा नवद्वीपके
नैयायिकोंने अभी लगभग छः सौ वर्ष पूर्व प्राचीन न्यायका परिष्कार करके एक नव्य
न्याय खड़ा किया है किन्तु यह प्राचीन न्यायका ही रूपान्तर है । अतएव मुख्य न्याय

१८ भूमिका ।
तीन ही हैं। गौतमीय न्याय, जैन न्याय और बौद्धन्याय । किन्तु इससे यह न समझ
लेना चाहिये कि अन्य दर्शनकारोंने न्यायपर कुछ लिखा ही नहीं। क्योंकि उनके
ग्रन्थोंमें भी न्यायके बहुतसे अङ्गोंपर बहुत कुछ प्रकाश मिलता है ।
आचार्य धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुको तीन परिच्छेदोंमें विभक्त किया है। जिनमेंसे
प्रथम परिच्छेदमें प्रत्यक्ष, द्वितीयमें स्वार्थानुमान और तृतीयमें परार्थानुमानका वर्णन
है। आचार्य धर्मोत्तरने इसी क्रमका अनुसरण करते हुए इसके ऊपर एक विस्तृत टीका
बनाई है जो कि पाठकोंके हाथमें है ।
यद्यपि यह टीका बहुत अच्छी है और इसमें प्रत्येक बातको भलीप्रकार समझाया
गया है तथापि यह टीका अपने असली रूपमें केवल उन्हींके कामकी रह गई है जो
बौद्ध दर्शनके विद्वान् हैं। क्योंकि यदि गौतमीय और जैन न्यायके कोई विद्वान् बिना
बौद्ध दर्शनका अभ्यास किये इसको स्वयं पढना चाहें तो उनके लिये भी इसका पढ़ना
बहुत कष्ट साध्य है। क्योंकि इसमें कुछ ऐसे बौद्ध पारिभाषिक शब्द आगये हैं जिनका
अर्थ लाख प्रयत्न करनेपर भी बिना बतलाये हुए समझमें नहीं आ सकता । हमने
इस त्रुटिको यथाशक्ति अपनी संस्कृत टिप्पणी और भाषाटीकामें दूर करनेका प्रयत्न
किया है। किन्तु यह कहना कठिन है कि हम इस प्रयत्नमें कहाँ तक सफल हुए हैं ।
अब हमको यह देखना है कि न्यायबिन्दुके पृथक् २ परिच्छेदोंमें क्या कहा
गया है—
प्रथम परिच्छेद ।
हम पीछे कह आये हैं कि प्रमाण सामान्य एक दार्शनिक विषय है। अतएव
प्रथम यहाँ उसीके लक्षणपर विचार किया जाता है—
सांख्यदर्शनमें कहा है—
'द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं
प्रमाणम् ।' अध्याय १ सूत्र ८७ ।
अर्थात् असन्निकृष्ट ( प्रमातामें अप्राप्त ) अर्थका निश्चय करना प्रमा है। वह प्रमा
चाहे बुद्धि और पुरुष दोनों का धर्म हो, अथवा बुद्धिका ही धर्म हो, अथवा पुरुषका
ही धर्म हो। जो उस प्रमाका साधकतम ( फलका एकमात्र और अभिन्न कारण ) हो
वह प्रमाण होता है। वह तीन प्रकारका है।
यहां यदि प्रमाणरूप फलको पुरुषमें रहनेवाला माना जावे तो बुद्धिवृत्ति प्रमाण
होगा। क्योंकि पुरुषजन्य प्रमा बुद्धिवृत्तिसे ही हो सकती है अन्यसे नहीं हो सकती ।
अथवा यदि प्रमाणरूप फलको बुद्धिमें ही रहने वाला माना जावे (क्योंकि पुरुष तो
ज्ञानसे बिलकुल पृथक् है) तो इन्द्रियवृत्ति सन्निकर्ष आदि ही प्रमाण होंगे । क्योंकि
पुरुष तो प्रमाका साक्षी है उसको प्रमाता कहनेमें उसमें कर्तृत्वका आरोप करना
पड़ेगा अथवा यदि पौरुषेय बोध और बुद्धिवृत्ति दोनोंको ही प्रमा कहा जावेगा तो
उक्त दोनोंको ही प्रमाण मानना पड़ेगा ।

भूमिका । १६
योगदर्शनके पातञ्जल भाष्यमें प्रथम मतको ही स्वीकार किया गया है। किन्तु
सांख्यका प्राचीन मत उपरोक्त मतोंमेंसे दूसरा प्रतीत होता है। इस प्रकार सांख्य तथा
योगदर्शनका प्रमाण अस्वसंवित् और अचेतन है।
प्रमाणका लक्षण न्यायदर्शन या वात्स्यायनभाष्य किसीमें भी नहीं मिलता। न्याय-
भाष्यकी टीका न्यायवार्तिकमें निम्नलिखित वाक्य मिलते हैं—
इन्द्रियं खलु अर्थप्रकाशकत्वात् प्रमाणं····················उपलब्धिहेतुः प्रमाणम्।···
प्रमाणोत्पत्ताविन्द्रियार्थसन्निकर्षमपेक्षमाणाभ्यां प्रमातृप्रमेयाभ्यां प्रमाणं जन्यते।
अर्थात् अर्थके प्रकाशक होने से इन्द्रिय ही प्रमाण है। क्योंकि उपलब्धिका
हेतु प्रमाण होता है। और प्रमाणकी उत्पत्तिमें इन्द्रिय और अर्थके सन्निकर्षकी अपेक्षा
करनेवाले प्रमाता और प्रमेय ज्ञानके जनक होते हैं।
किन्तु अन्य ग्रन्थोंको परिशीलन करनेसे पता चलता है नैयायिक मतमें भी
सन्निकर्षको ही प्रमाण माना है।
वैशेषिक दर्शनके प्रशस्तपाद भाष्यमें लिखा है—
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः।··········तस्या सत्यप्यनेकविधत्वे समा-
सतो द्वे विधे विद्या चाविद्या चेति।·········विद्यापि चतुर्विधा। प्रत्यक्षलैङ्गिक-
स्मृत्यार्षलक्षणा।
अर्थात् बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय ये सब ही एकार्थवाची हैं। उसके
(बुद्धिके) अनेक भेद होने पर भी संक्षेपसे दो भेद हैं। विद्या और अविद्या। विद्याके
भी चार भेद हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति और आर्ष।
इससे प्रतीत होता है कि वैशेषिकोंके विद्या और प्रमाण भिन्न २ नहीं हैं। अतएव
वैशेषिक दर्शनके अनुसार प्रमाण ज्ञान है।
मीमांसामें मुख्य रूपसे दो आचार्योंके मत लिये जाते हैं। कुमारिलभट्ट और
प्रभाकरके—
कुमारिलने प्रमाणका यह लक्षण किया है—
‘अनधिगततथाभूतार्थनिश्चायकं प्रमाणम्’ अर्थात् जो न जाने हुए और तथाभूत
(वास्तविक) अर्थका निश्चय करावे वह प्रमाण है। यह एक प्रकारका ‘प्रमाकरणं
प्रमाणम्’ ही हुआ।
प्रभाकरका प्रमाणका लक्षण यह है—
‘अर्थतथात्वप्रकाशको ज्ञातृव्यापारोऽज्ञानरूपोऽपि प्रमाणम्’ अथवा ‘अनुभूतिः प्रमाणम्’।
अर्थात् अर्थके वास्तविक रूपको प्रकाशित करने वाला ज्ञाताका अज्ञानरूप अनुभव
व्यापार प्रमाण है अथवा अनुभूति या अनुभव ही प्रमाण है। यहाँ भी प्रमाण
ज्ञान रूप है—
जैनियोंके न्यायके प्रसिद्ध ग्रन्थ परीक्षा मुखमें प्रमाणका यह लक्षण किया गया
है—‘स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्’।

२० भूमिका ।
अर्थात् अपने और अपूर्व अर्थको निश्चय करानेवाले ज्ञानको प्रमाण कहते हैं।
इसमें भी ज्ञानको ही प्रमाण कहा है।
अब अन्तमें देखना चाहिये कि बौद्ध दर्शनमें इस विषयमें क्या कहा है। न्याय-
बिन्दु मूलमें प्रमाणके स्थानपर प्रायः सम्यग्ज्ञान शब्दका प्रयोग मिलता है। सम्यग्ज्ञानके
विषयमें टीकामें लिखा है—
'अविसंवादकं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानम्' । न्याय वि० पृ० ४ पं० ६
जो पहिले से जाने हुए पदार्थमें प्रवृत्ति करता है उसे लोकमें संवादक कहते हैं।
ज्ञानके विषयमें भी यही बात घटती है क्योंकि ज्ञान भी उसी प्रकार स्वयं दिखलाये
हुए अर्थमें प्रवृत्ति करता हुआ संवादक कहा जाता है। अतएव अविदित अर्थको बतलाने
वाला ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाता है। जैसा कि कहा है—
'अनधिगतविषयं प्रमाणम् ।' न्याय वि० पृ० ४ पं० १३
अर्थात् प्रमाण अविदित विषय वाला है।
बौद्धोंने प्रमाण और ज्ञानको दो पदार्थ न मानकर एक ही माना है। जैसा कि
जैनियोंने भी किया है। ज्ञानमें 'सम्यक्' विशेषणसे संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय
ज्ञानोंको स्पष्टतया प्रमाणपनेका निषेध किया है। 'अविसंवादक' अथवा 'अनधिगत-
विषय' से भट्टद्वारा स्वीकार किये हुए धारावाहिक ज्ञानमें प्रामाण्यका निषेध किया है।
बौद्धोंकी प्रमाणसंख्या यद्यपि और सबोंसे तो भिन्न है किन्तु वैशेषिकोंके समान
ही है। उन्होंने प्रत्यक्ष और परोक्ष दो ही प्रमाण माने हैं। (न्यायबिन्दु पृ० ७
भाषाटीका पृ० १) अन्तर दोनोंमें केवल इतना ही है कि वैशेषिक तो उपमान और
अर्थापत्ति आदिका अनुमान में अन्तर्भाव कर लेता है किन्तु बौद्ध कार्य, स्वभाव और
अनुपलब्धि हेतु जनित ज्ञानको ही अनुमान मानता है। अतएव बौद्ध अनुमानमें उनका
पूर्ण अन्तर्भाव नहीं है।
बौद्धोंका प्रत्यक्ष जितना विचित्र है उतना ही उसको समझना भी कठिन है।
वैदिक दर्शनकारोंने इन्द्रियों और पदार्थके सन्निकर्षसे उत्पन्न हुए ज्ञानको प्रत्यक्ष माना
है। जैनियोंका प्रत्यक्ष भी यद्यपि विचित्र ही है किन्तु उसका समझना उतना कठिन
नहीं है। जैनियोंने प्रत्यक्षके दो भेद किये हैं—एक इन्द्रियप्रत्यक्ष (अथवा सांव्यव-
हारिक प्रत्यक्ष) दूसरा अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष (अथवा पारमार्थिक या मुख्य प्रत्यक्ष)।
जैनियोंका इन्द्रिय प्रत्यक्ष लगभग वैदिक दर्शनकारोंके ही जैसा है किन्तु अतीन्द्रिय
प्रत्यक्ष एक प्रकार का योगिज्ञान है, जो केवल आत्मिक शक्तिसे आत्मामें ही होता
है। बौद्ध लोग कल्पना रहित और निर्भ्रान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। (न्या० पृ० ८
भा० पृ० १) कल्पना रहितको प्रत्यक्ष कहनेका कारण यह है कि कल्पना अर्थकी
उपस्थितिकी अपेक्षा नहीं रखती किन्तु बौद्ध प्रत्यक्ष अर्थके सान्निध्यमें ही हो सकता है।
अन्य अवस्थाओंमें नहीं हो सकता (न्या० पृ० १०, ११)