न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 13, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ७
इन्होंने नैयायिकों के १६ पदार्थ माने हैं । कार्यहेतु, स्वभावहेतु और अनुपलब्धि हेतुका
वर्णन भी इन्होंने किया है ।
आर्यदेव ( लगभग ३२० ई० ), मैत्रेय ( लगभग ४०० ई० ), आर्य असंग
( लगभग ४०५-४७० ई० तक ) और वसुबन्धु ( लगभग ४१० से ४९० तक ) ने
भी बौद्धन्यायपर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे हैं । किन्तु इनके ग्रन्थों पर भी प्राचीन न्यायका
पूरा प्रभाव देखनेमें आता है । ये ग्रन्थकार बौद्धन्यायकी आदिम अवस्थाके थे ।
सारांश यह है कि ईसासे पूर्व छठीं शताब्दीमें बौद्ध धर्मकी स्थापनासे लेकर
ईसाकी चौथी शताब्दीमें इसका चार दार्शनिक संप्रदायोंमें विकास होने तक बौद्धन्यायके
ऊपर कोई भी क्रमबद्ध ग्रन्थ नहीं था । केवल दार्शनिक और धार्मिक ग्रन्थोंमें न्यायका
यतस्ततः आभास देखनेमें आता था । नागार्जुनने लगभग ३०० ई० में न्यायपर
एक स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखा । किन्तु वह केवल प्राचीन न्यायके सिद्धान्तोंकी आलोचना
मात्र थी । ई० ४०० से ५०० तक मैत्रेय, असंग और वसुबन्धुने भी न्यायको चलाया,
किन्तु उनका लेख केवल आकस्मिक था । क्योंकि वह योगाचार और वैभाषिकके
सिद्धान्तोंसे मिला हुआ था । हुएन्त्सांगके बतलाये हुए वसुबन्धुकृत तीनों ग्रन्थ अनु-
पलब्ध हैं । अतएव उनके विषयमें कुछ भी नहीं कहा जा सकता । ४५० ई० से वह
समय आया जब न्याय साधारण दर्शनसे बिलकुल पृथक् हो गया और बहुतसे
बौद्ध लेखकोंका ध्यान इधर पूर्णरूपसे आकर्षित हुआ । इनमें दिङ्नागका नम्बर
सबसे पहिला है ।
दिङ्नागको आधुनिक बौद्धन्यायका पिता कहना अनुचित न होगा । क्योंकि
अधिकांश बौद्धन्यायके सिद्धान्तोंकी नींव उसीने डाली है । उसने नालन्द, उड़ीसा,
महाराष्ट्र और दक्षिण ( मद्रास ) की यात्रा की थी । ये जहाँ गये वहाँ इनको अपने
विरोधियोंसे शास्त्रार्थ ही करना पड़ा । उनका सम्पूर्ण जीवन चोटें करने और सहनेमें
ही व्यतीत हुआ । उनके मरने पर भी कालीदास, उद्योतकर, वाचस्पतिमिश्र, मल्लिनाथ,
कुमारिल भट्ट और पार्थसारथिमिश्रने उनके ऊपर कम आक्रमण नहीं किये । वेदान्ती
और जैनी भी उनपर आक्रमण करनेसे न चूके । यहाँ तक कि बौद्धसाधु धर्मकीर्तिने
भी उनका विरोध करनेका प्रयत्न कर ही डाला । दिङ्नागके ग्रन्थोंसे उनकी सार्वतोमुखी
प्रतिभाका खूब परिचय मिलता है । प्रमाणसमुच्चय, न्यायप्रवेश, हेतुचक्रडमरु,
प्रमाणसमुच्चयवृत्ति, प्रमाणशास्त्र न्यायप्रवेश, आलम्बन परीक्षा, आलम्बन परीक्षावृत्ति
और त्रिजालपरीक्षा इनके न्यायपर स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं । इनमें से इनका प्रमाणसमुच्चय
सबसे प्रधान है और यही बौद्धन्यायका पथप्रदर्शक है । इसमें छः अध्याय हैं—
( १ ) प्रत्यक्ष, ( २ ) स्वार्थानुमान, ( ३ ) परार्थानुमान, ( ४ ) हेतु दृष्टान्त, ( ५ )
अपोह और ( ६ ) जाति ।
दिङ्नागके पश्चात् परमार्थ ( ४९८ ई० से ५६९ ई० तक ) हुए । इन्होंने कुछ
बौद्धग्रन्थोंका चीनी भाषामें अनुवाद किया । इन्होंने एक न्यायभाष्य भी लिखा था ।