न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तो पूर्ण रूपसे वास्तविक और न पूर्ण रूपसे काल्पनिक ही हैं । माध्यमिक शब्द
मध्यमसे बनता है । मध्यम बीच को कहते हैं । दोनों अन्तके सिद्धान्तोंको छोड़नेके
कारणसे यह माध्यमिक कहलाता है । अर्थात् यह न तो सर्वास्तित्ववादी ही है, और न
सबके अस्तित्वका निषेध ही करता है । किन्तु इसने एक बीचका मार्ग चुनकर निश्चय
किया जो कि संसारकी एक वैकल्पिक सत्ता ( Conditional existence ) थी ।
यह कहा जाता है इसके संस्थापक नागार्जुन २५०-३२० ईस्वी तक हुए हैं । किन्तु
वास्तवमें इसके सिद्धान्त उससे प्राचीन ग्रन्थ प्रज्ञापारमितामें मिलते हैं । नागार्जुनकी
माध्यमिक कारिका, बुद्धपालितकी मूल माध्यमवृत्ति, आर्यदेवका हस्तवल, भव्यकी
मध्यमहृदयकारिका, कृष्णका मध्यम प्रतीत्यसमुत्पाद, चन्द्रकीर्तिकी माध्यमिक वृत्ति
और जयानन्दकी माध्यमिकावतार टीका माध्यमिक सम्प्रदायके मुख्य ग्रन्थ हैं ।
नागार्जुनकी एक मूल माध्यमिक वृत्ति अकुतोभयका तिब्बी भाषामें अनुवाद मिलता है,
जिसके अन्तमें माध्यमिक दर्शनके इन आठ प्रचारकों ( Expounders ) के नाम
दिये हुए हैं—१आर्य नागार्जुन, २स्थविर बुद्धपालित, ३चन्द्रकीर्ति, ४देवशर्मा, ५गुणश्री,
६गुणमति, ७स्थिरमति और ८भव्य ( या भावविवेक ) ।
उपर्युक्त चारों दार्शनिक सम्प्रदायोंके साथ ही बौद्ध जनता में न्यायके अध्ययनका
भी विकाश होने लगा । अब चारों ही सम्प्रदायोंके नेता अपने सिद्धान्तके मण्डन और
दूसरोंके सिद्धान्तके खण्डन के लिये न्यायको उपयोगी समझने लगे । जैसा कि माध्यमिक
सम्प्रदायके नागार्जुन और आर्यदेव तथा योगाचार सम्प्रदायके मैत्रेय, असंग और
वसुबन्धुके लेखोंसे स्पष्ट है । अपने पक्षके मण्डन और परपक्षका खण्डन करनेके
लिये उपयोगकी हुई युक्तियोंने अक्षपादके प्राचीन न्यायका प्रचार और बौद्धोंमें बहुतसे
नैयायिकोंको उत्पन्न कर दिया ।
बौद्धोंमें न्यायके ऊपर विस्तारसे प्रथम विचार करने वाला माध्यमिक सम्प्रदायका
प्रवर्त्तक आर्य नागार्जुन था । यह महाकौशल देशके विदर्भ नगरमें आन्ध्र राजा सद्वाह
अथवा सातवाहनके समयमें उत्पन्न हुआ था । इसने कृष्णा नदीके तटपर श्रीपर्वतकी
गुफामें बहुत-सा समय ध्यान करनेमें व्यतीत किया था । ये 'शरह' के शिष्य थे ।
कहा जाता है कि इन्होंने एक बड़े शक्तिशाली राजा भोजदेवको बौद्ध बनाया था ।
बौद्धग्रन्थोंके अनुसार ये बुद्धके निर्वाणके ४०० वर्ष पश्चात् अथवा ईसासे ३३ वर्ष
पूर्व हुए थे । किन्तु म. म. डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणकी सम्मतिमें इनका समय
कुछ पीछे है । इन्होंने अपनी माध्यमिक कारिकामें प्राचीनन्यायके परिभाषिक शब्द
पुनरुक्त, सिद्धसाधन, साध्यसम और परिहारका प्रयोग और अक्षपादके सिद्धान्त
प्रमाणके दीपकके समान स्वपरप्रकाशकत्वका निराकरण किया है । इन्होंने अपने ग्रन्थ
विग्रहव्यावर्त्तनी कारिकामें भी अक्षपादके सिद्धान्तकी समालोचना की थी । प्रमाण
विटेटन या प्रमाणविध्वंसन और उपाय कौशल्यहृदयशास्त्र इनके न्याय पर स्वतन्त्र
ग्रन्थ हैं । किन्तु इनपर प्राचीन न्यायका पूरा प्रभाव पड़ा हुआ है । क्योंकि इनमें