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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 21

भूमिका । १५

ग्रन्थके सामने न होनेसे हम इस विषयपर लिखनेमें असमर्थ हैं। क्योंकि केवल न्यायके
ग्रन्थके आधारपर दार्शनिक विषयकी समालोचना करना हम योग्य नहीं समझते ।
यह पीछे प्रगट किया जा चुका है कि आचार्य दिङ्नाग आधुनिक बौद्ध न्यायके
जन्मदाता थे । किन्तु गौतम न्यायसूत्रके वात्स्यायन भाष्यकी टीका न्यायवार्तिकके
रचयिता उद्योतकरने अपने ग्रन्थ में उनकी खूब समालोचना की है । उस समय इस
समालोचनासे ब्राह्मणोंका प्रभाव बहुत कुछ बढ़ गया और बौद्धोंका घट गया ।
दिङ्नागसे धर्मकीर्ति तकके बीचमें कोई भी ऐसा बौद्ध नैयायिक नहीं हुआ जो उस
उखड़ी हुई प्रतिष्ठाको जमाता । किन्तु धर्मकीर्तिने स्थान २ पर शास्त्रार्थ करके बौद्ध-
मतका इतना प्रचार किया कि उसके पीछेके प्रायः सभी दर्शनोंके न्यायवालोंने उसकी
समालोचना करनेमें ही अपना गौरव समझा । इन्होंने न्यायवार्तिककी भी समालोचना
खूब की थी । इनके पश्चात् बौद्ध नैयायिकोंमें ऐसा दमदार कोई नैयायिक नहीं हुआ ।
इसलिये जबकि हम दिङ्नागको आधुनिक न्यायका जन्मदाता कहते हैं तो धर्मकीर्तिको
बौद्धन्यायका उद्धारक कहना बहुत योग्य होगा ।
( ६ ) धर्मकीर्तिकृत दिङ्नागका खण्डन ।
प्रमाणवार्तिककारिकाके बननेके वर्णनमें कहा जा चुका है कि धर्मकीर्तिने दिङ्नागके
ग्रन्थमें उसकी गलतियां पकड़ीं । यद्यपि हमारे सामने प्रमाणवार्तिककारिका उपस्थित
नहीं है तथापि न्यायविन्दु टीकासे दिङ्नागसे धर्मकीर्तिका मतभेद स्पष्ट प्रगट हो
जाता है । यद्यपि डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणने इस विषयपर भी काफी लिखा है
किन्तु इस स्थलपर उस विषयमें न लिखना भी अनुचित होगा अतएव हम यहां पर
वही विषय डाक्टर साहिबसे अभिन्न सम्मति रखते हुए लिखते हैं—
इष्टविघातकृत् विरुद्ध ।
हेतुके साध्यके विरुद्ध होनेको दिङ्नाग और धर्मकीर्ति दोनोंने ही हेत्वाभास माना
है । किन्तु दिङ्नागने अपने न्यायप्रवेशमें हेतुके अभिलषित ( Implied ) साध्यके
( जिस समय साध्य अनिश्चित अथवा संदिग्ध हो ) विपरीत होनेको पृथक् हेत्वाभास
माना है, जिसको उन्होंने इष्टविघातकृत् विरुद्ध नाम दिया है । किन्तु धर्मकीर्तिने
अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इस सम्मतिको यह कह कर अग्राह्य माना है कि दूसरा
विरुद्ध हेत्वाभास प्रथममें ही गर्भित हो जाता है । ( तत्र च तृतीयोऽपि इष्टविघात-
कृत् विरुद्धः ?···स इह कस्मान्नोक्तः । अनयोरेव अन्तर्भावात् ।
अयं च विरुद्धः
आचार्यदिङ्नागेनोक्तः । स कस्मात् वार्तिककारेण सता त्वया नोक्तः । न्या० पृष्ठ
७९, ८०भाषा पृ० २२ ) इष्टविघातकृत् विरुद्धका एक उदाहरण दिया जाता है—
नेत्र आदि दूसरेके उपयोगके लिये हैं । क्योंकि वह संघातरूप हैं । जैसे-शयन,
आसन आदि ।
यहाँ साध्य दूसरेके लिये अनिश्चित या संदिग्ध है । क्योंकि वह संघात