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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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८ भूमिका।
शंकरस्वामिन् ( लगभग ५५० ई० ) आचार्य दिङ्नागके शिष्य थे। कहा जाता
है कि शंकरस्वामिन् और अन्य दश आचार्योंके द्वारा न्यायशास्त्र दिङ्नागसे शालिभद्र
तक पहुँचा था। इन्होंने एक ग्रन्थ न्यायप्रवेशशास्त्र या न्यायप्रवेशतर्कशास्त्र नामका
लिखा था।
धर्मपाल ( लगभग ६०० से ६३५ ई० तक ) कांचीपुर ( वर्तमान कंजीवरम् )
के राजमन्त्रीके ज्येष्ठ पुत्र थे। यह धर्मकीर्तिके गुरु थे। इन्होंने बाल्यावस्थामें ही वैराग्य
ले लिया था। आरम्भमें ये नालन्द विश्वविद्यालयमें पढ़ने गये, किन्तु पीछेसे ये
उस विद्यालयके प्रधान बना दिये गये। ये योगाचार मतावलम्बी थे। इन्होंने
आलम्बन प्रत्यय ध्यान शास्त्रव्याख्या, विद्यामात्र सिद्धिशास्त्र व्याख्या और शत-शास्त्र
वैपुल्य व्याख्या आदि ग्रन्थ लिखे थे।
शालिभद्र ( ६३५ ई० ) बंगालके राजा समतटके कुटुम्बके थे। ये ब्राह्मण थे।
नालन्द विश्वविद्यालयमें ये धर्मपालके शिष्य थे, जिसके ये उनके पीछे प्रधान हो गये
थे। चीनी यात्री हुएन्टसांग ( सन् ६३५ ई० ) इनका शिष्य था। शालिभद्र बड़े भारी
विद्वान् और नैयायिक थे।
आचार्य धर्मकीर्ति ( लगभग ६३५ से ६५० ई० तक ) के विषयमें आगे विस्तारसे
विचार किया जावेगा।
देवेन्द्रबोधि ( लगभग ६५० ई० ) धर्मकीर्तिके समकालीन थे। इन्होंने प्रमाण-
वार्तिकपंजिका बनाई थी। कहा जाता है कि धर्मकीर्तिने अपने प्रमाणवार्तिकके ऊपर
टीका लिखनेके योग्य देवेन्द्रबोधिको ही चुना। तदनुसार देवेन्द्रबोधिने टीका बनाकर
धर्मकीर्तिको दिखलाई किन्तु उसने उसको धो डाली। देवेन्द्रबोधिने फिर बनाकर
दिखलाई इस बार धर्मकीर्तिने उसको जला दी। किन्तु तीसरी बार देखने पर धर्मकीर्तिने
उसको रहने दी।
शाक्यबोधि ( लगभग ६७५ ई० ) ने जो कि देवेन्द्रबोधिका शिष्य था एक टीका
प्रमाणवार्तिक पंजिका पर बनाई। जिसका नाम उन्होंने प्रमाणवार्तिक ( पंजिका )
टीका रक्खा।
न्यायविन्दुटीका ( धर्मकीर्तिकी न्यायबिन्दु ), हेतुबिन्दु ( धर्मकीर्तिका ) टीका,
वादन्याय ( धर्मकीर्तिकृत ) व्याख्या, सम्बन्धपरीक्षा ( धर्मकीर्तिकृत ) टीका, आल-
म्बनपरीक्षा ( दिङ्नागकृत ) टीका और सन्तानान्तरसिद्धि ( धर्मकीर्तिकृत ) टीकाके
कर्त्ता विनीतदेव ( लगभग ७०० ई० ) राजा गोविन्दचन्द्रके पुत्र राजा ललितचन्द्रके
समयमें नालन्दमें रहते थे। धर्मकीर्तिकी मृत्यु भी गोविन्दचन्द्रके समयमें हुई थी।
गोविन्दचन्द्रके पिता विमलचन्द्रका विवाह भर्तृहरि ( जो मालवेके प्राचीन राजवंशके
थे।) की बहिनसे हुआ था। यदि हम भर्तृहरि और इस नामके वैयाकरणीको जो
६५१ या ६५० ई० में परलोक गये एक ही व्यक्ति मान लें तो हम उनके समकालीन
गोविन्दचन्द्रको ७ वीं शताब्दीके मध्यमें रख सकते हैं। धर्मकीर्तिकी मृत्युका भी