न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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तीन ही हैं। गौतमीय न्याय, जैन न्याय और बौद्धन्याय । किन्तु इससे यह न समझ
लेना चाहिये कि अन्य दर्शनकारोंने न्यायपर कुछ लिखा ही नहीं। क्योंकि उनके
ग्रन्थोंमें भी न्यायके बहुतसे अङ्गोंपर बहुत कुछ प्रकाश मिलता है ।
आचार्य धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुको तीन परिच्छेदोंमें विभक्त किया है। जिनमेंसे
प्रथम परिच्छेदमें प्रत्यक्ष, द्वितीयमें स्वार्थानुमान और तृतीयमें परार्थानुमानका वर्णन
है। आचार्य धर्मोत्तरने इसी क्रमका अनुसरण करते हुए इसके ऊपर एक विस्तृत टीका
बनाई है जो कि पाठकोंके हाथमें है ।
यद्यपि यह टीका बहुत अच्छी है और इसमें प्रत्येक बातको भलीप्रकार समझाया
गया है तथापि यह टीका अपने असली रूपमें केवल उन्हींके कामकी रह गई है जो
बौद्ध दर्शनके विद्वान् हैं। क्योंकि यदि गौतमीय और जैन न्यायके कोई विद्वान् बिना
बौद्ध दर्शनका अभ्यास किये इसको स्वयं पढना चाहें तो उनके लिये भी इसका पढ़ना
बहुत कष्ट साध्य है। क्योंकि इसमें कुछ ऐसे बौद्ध पारिभाषिक शब्द आगये हैं जिनका
अर्थ लाख प्रयत्न करनेपर भी बिना बतलाये हुए समझमें नहीं आ सकता । हमने
इस त्रुटिको यथाशक्ति अपनी संस्कृत टिप्पणी और भाषाटीकामें दूर करनेका प्रयत्न
किया है। किन्तु यह कहना कठिन है कि हम इस प्रयत्नमें कहाँ तक सफल हुए हैं ।
अब हमको यह देखना है कि न्यायबिन्दुके पृथक् २ परिच्छेदोंमें क्या कहा
गया है—
प्रथम परिच्छेद ।
हम पीछे कह आये हैं कि प्रमाण सामान्य एक दार्शनिक विषय है। अतएव
प्रथम यहाँ उसीके लक्षणपर विचार किया जाता है—
सांख्यदर्शनमें कहा है—
'द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं
प्रमाणम् ।' अध्याय १ सूत्र ८७ ।
अर्थात् असन्निकृष्ट ( प्रमातामें अप्राप्त ) अर्थका निश्चय करना प्रमा है। वह प्रमा
चाहे बुद्धि और पुरुष दोनों का धर्म हो, अथवा बुद्धिका ही धर्म हो, अथवा पुरुषका
ही धर्म हो। जो उस प्रमाका साधकतम ( फलका एकमात्र और अभिन्न कारण ) हो
वह प्रमाण होता है। वह तीन प्रकारका है।
यहां यदि प्रमाणरूप फलको पुरुषमें रहनेवाला माना जावे तो बुद्धिवृत्ति प्रमाण
होगा। क्योंकि पुरुषजन्य प्रमा बुद्धिवृत्तिसे ही हो सकती है अन्यसे नहीं हो सकती ।
अथवा यदि प्रमाणरूप फलको बुद्धिमें ही रहने वाला माना जावे (क्योंकि पुरुष तो
ज्ञानसे बिलकुल पृथक् है) तो इन्द्रियवृत्ति सन्निकर्ष आदि ही प्रमाण होंगे । क्योंकि
पुरुष तो प्रमाका साक्षी है उसको प्रमाता कहनेमें उसमें कर्तृत्वका आरोप करना
पड़ेगा अथवा यदि पौरुषेय बोध और बुद्धिवृत्ति दोनोंको ही प्रमा कहा जावेगा तो
उक्त दोनोंको ही प्रमाण मानना पड़ेगा ।