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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

१० भूमिका ।
धर्मोत्तराचार्य ( लगभग ८४७ ई० )
धर्मोत्तर, जिसका वर्णन 'तारानाथ की गेस्चिच्टे देव बुद्धिज्मस वॉन शीफनर'
के पृ० २२५ और 'ड्पाग-व्साम-व्जान' के पृ० १४४ में किया गया है—जिनको
आचार्य धर्मोत्तर या धर्मोत्तराचार्य भी कहते हैं—तिब्बी भाषामें 'चांस-म्च्वांग' के
नामसे प्रसिद्ध है । ये कल्याणरक्षित और काश्मीरके धर्माकरदत्तके शिष्य थे । यह
प्रतीत होता है कि राजा वाणपालके बंगालमें राज्य करनेके समयमें ही ये कश्मीरमें
हुए थे । ब्राह्मण नैयायिक श्रीधर ( लगभग ९९१ ई० ) ने अपने ग्रन्थ न्यायकन्दली
( पृ० ७६ विजयानगरम् सीरीज ) में, धर्मोत्तरटिप्पणकके कर्ता जैन दार्शनिक मल्लि-
वादिन्ने लगभग ९६२ ई० के धर्मोत्तरकी न्यायविन्दुटीकाकी टीका धर्मोत्तर टिप्पणकमें
और प्रसिद्ध स्याद्वादरत्नाकरावतारिका के कर्ता रत्नप्रभसूरिने ११८१ ई० में इनके
नामका उल्लेख किया है ।
( मल्लिवादिन्‌के ग्रन्थमें उसका संवत् ८८४ पड़ा हुआ है । यदि इसे विक्रम
माना जावे तो यह ८२७ अथवा यदि इसे शक माना जावे तो यह ९६२ ई० होता है ।
एक प्रकारके विद्वानोंका मत है कि मल्लिवादिन् धर्मोत्तरके समकालीन थे किन्तु दूसरे
प्रकार के विद्वान् उनका समय एक शताब्दी पीछे निर्धारित करते हैं । )
धर्मोत्तराचार्यके बनाये हुए निम्नलिखित ग्रन्थोंका पता चलता है—
१. न्यायविन्दुटीका-धर्मकीर्तिके न्यायविन्दु पर विस्तृत टीका । यह अपनी मूल
अवस्थामें छप कर पाठकोंके हाथ में है । इसका तिब्बी अनुवाद भी मिलता है ।
धर्मोत्तराचार्यके निम्नलिखित ५ ग्रन्थोंकाऔर पता चला है। किन्तु उनका संस्कृत
लुप्त है । केवल तिब्बी अनुवाद मिलता है । वे ग्रन्थ ये हैं—
२. प्रमाणपरीक्षा, ३. अपोह नाम प्रकरण, ४. परलोकसिद्धि, ५. क्षणभङ्गसिद्धि
और ६. प्रमाणनिश्चय टीका-यह धर्मकीर्तिके प्रमाणविनिश्चयकी टीका है ।
धर्मोत्तराचार्यके पश्चात् बौद्ध न्यायके अन्य भी अनेक विद्वान् हुए हैं । किन्तु
उन्होंने न्यायविन्दुके ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं लिखा । अतएव अपना प्रयोजन निकल
जानेसे हम इस विषयको यहीं समाप्त करके अब न्यायविन्दुकार धर्मकीर्तिके ऊपर
विचार करते हैं ।
( ३ ) धर्मकीर्ति ।
( धर्मकीर्तिके विषयमें अनेक ग्रन्थोंमें खोजने पर भी हमको डाक्टर सतीशचन्द्र
विद्याभूषणके इतिहाससे विशेष कहीं भी नहीं मिला । अतएव यहां उन्हीं का अविकल
अनुवाद दिया जाता है—)
जीवन चरित्र ।
धर्मकीर्ति दक्षिणके चूडामणि ( सम्भवतः यह चोल देशका नाम है ) राज्यमें
उत्पन्न हुए थे । यद्यपि इस नामका कोई भी देश नहीं है तथापि सभी प्रकारके विद्वान्
त्रिमलयको धर्मकीर्तिकी जन्मभूमि कहते हैं । सम्भव है कि त्रिमलयका ही प्राचीन