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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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भूमिका । ३
यद्यपि कनिष्कसे पहिले भी संस्कृतमें कुछ बौद्ध ग्रन्थोंकी रचना हो चुकी थी
(उदाहरणके लिये अभिधर्म विभाषा अथवा अभिधर्म महाविभाषा शास्त्र जिसकी
रचना कनिष्ककी सभामें की गई थी, कात्यायनी पुत्रके अभिधर्मज्ञान प्रस्थानशास्त्र
(यह पाली अभिधम्म पिटककी टीका है और बुद्धके निर्वाणके ३०० वर्ष पश्चात् तथा
कनिष्कसे १०० वर्ष पहिले बनाया गया था) के ऊपर टीका है) तथापि संस्कृतको
बौद्धसाहित्यकी भाषा बनानेका श्रेय उसीको प्राप्त है । उसके समयसे लगाकर असंख्य
संस्कृत बौद्धग्रन्थोंकी रचना हुई है, जिनमेंसे नवधर्म संज्ञक नौ ग्रन्थ महायान सम्प्रदायके
विशेष रूपसे पूज्य हैं ।
नव धर्म ये हैं—
(१) अष्ट साहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता, (२) गंडव्यूह, (३) दशभूमीश्वर, (४) समा-
धिराज, (५) लंकावतार, (६) सद्धर्मपुण्डरीक, (७) तथागतगुह्यक, (८) ललितविस्तर
और (९) सुवर्णप्रभास । इनमें अनेक स्थलों पर न्यायका भी उल्लेख किया गया है ।
बुद्धने अपना उपदेश पाली अथवा मागधी भाषामें दिया था । उसके पश्चात्
उसकी शिक्षायें बौद्ध भिक्षुओं की तीन सभाओंमें एकत्रित की गईं । ये सभायें राजगृह,
वैशाली और पाटलिपुत्रमें क्रमसे राजा अजातशत्रु, कालाशोक और अशोकके संरक्षणमें
हुई थीं । पहिली सभा ईसासे ४९० वर्ष, दूसरी ३९० वर्ष तथा तीसरी २५५ वर्ष पूर्व हुई
थी । (पहिली सभा बुद्धके निर्वाणके संवत्‌में, दूसरी उसके १०० वर्ष पश्चात् और तीसरी
अशोकके शासनकालके १७वें वर्षमें हुई थी । अशोक ईसासे २७२ वर्ष पूर्व सिंहासन-
पर बैठा था) । जो भिक्षु प्रथम सभामें एकत्रित हुए थे वह (१) थेरा कहे जाने लगे ।
वैशालीकी द्वितीय सभाके निर्णयसे दस सहस्र भिक्षु थेरावादके कुछ नियमों का उल्लंघन
करनेके कारण थेरा संघसे पृथक् कर दिये गये । ये निकाले हुए धर्मगुरु (२) महा-
सांघिका कहलाये । मूल बौद्ध धर्ममें से पृथक् होने वाला पहिला सम्प्रदाय यही था ।
उन्होंने थेरावादमें कुछ नियम घटाये तथा कुछ बढ़ा दिये । इसके पश्चात् बुद्धके
निर्वाणके २०० वर्षोंके भीतर मूलधर्मसे पृथक् (Heretical) सोलह और सम्प्रदाय
चले, उनके नाम ये हैं—(३) गोकुलिका, (४) एकव्वोहारिक, (५) पण्णति, (६) बाहु-
लिक (७) चेतिय, (८) सब्बत्थि, (९) धर्म्मगुत्तिक, (१०) कस्सपीय, (११) संकतिक,
(१२) सुत्त, (१३) हिमवत, (१४) राजगिरीय, (१५) सिद्धत्थिक, (१६) पुब्बसेलिय,
(१७) अपरसेलिय, (१८) वजिरिय ।
तीसरी सभाके पश्चात् लगभग ईसाके २५५ वर्ष पूर्व अशोकके पुत्र महिन्दने
त्रिपिटकों की शिक्षाका सिंहलमें प्रचार किया । जहाँ के पुरोहितोंने इसको कण्ठ
रख २ कर चलाये रखा । महावंश अध्याय ३३ के अनुसार प्रथम ये राजा वत्तगा-
मणिके समयमें लिखे गये, जिसने ईसासे १०४ वर्ष से ७६ वर्ष पूर्व तक सिंहलका
राज्य किया था । त्रिपिटकके अतिरिक्त अन्य भी बहुतसे ग्रन्थ पाली में लिखे गये थे
जिससे पाली साहित्य बहुत विस्तीर्ण हो गया ।