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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 176 में से

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पृष्ठ 26

२० भूमिका ।
अर्थात् अपने और अपूर्व अर्थको निश्चय करानेवाले ज्ञानको प्रमाण कहते हैं।
इसमें भी ज्ञानको ही प्रमाण कहा है।
अब अन्तमें देखना चाहिये कि बौद्ध दर्शनमें इस विषयमें क्या कहा है। न्याय-
बिन्दु मूलमें प्रमाणके स्थानपर प्रायः सम्यग्ज्ञान शब्दका प्रयोग मिलता है। सम्यग्ज्ञानके
विषयमें टीकामें लिखा है—
'अविसंवादकं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानम्' । न्याय वि० पृ० ४ पं० ६
जो पहिले से जाने हुए पदार्थमें प्रवृत्ति करता है उसे लोकमें संवादक कहते हैं।
ज्ञानके विषयमें भी यही बात घटती है क्योंकि ज्ञान भी उसी प्रकार स्वयं दिखलाये
हुए अर्थमें प्रवृत्ति करता हुआ संवादक कहा जाता है। अतएव अविदित अर्थको बतलाने
वाला ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाता है। जैसा कि कहा है—
'अनधिगतविषयं प्रमाणम् ।' न्याय वि० पृ० ४ पं० १३
अर्थात् प्रमाण अविदित विषय वाला है।
बौद्धोंने प्रमाण और ज्ञानको दो पदार्थ न मानकर एक ही माना है। जैसा कि
जैनियोंने भी किया है। ज्ञानमें 'सम्यक्' विशेषणसे संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय
ज्ञानोंको स्पष्टतया प्रमाणपनेका निषेध किया है। 'अविसंवादक' अथवा 'अनधिगत-
विषय' से भट्टद्वारा स्वीकार किये हुए धारावाहिक ज्ञानमें प्रामाण्यका निषेध किया है।
बौद्धोंकी प्रमाणसंख्या यद्यपि और सबोंसे तो भिन्न है किन्तु वैशेषिकोंके समान
ही है। उन्होंने प्रत्यक्ष और परोक्ष दो ही प्रमाण माने हैं। (न्यायबिन्दु पृ० ७
भाषाटीका पृ० १) अन्तर दोनोंमें केवल इतना ही है कि वैशेषिक तो उपमान और
अर्थापत्ति आदिका अनुमान में अन्तर्भाव कर लेता है किन्तु बौद्ध कार्य, स्वभाव और
अनुपलब्धि हेतु जनित ज्ञानको ही अनुमान मानता है। अतएव बौद्ध अनुमानमें उनका
पूर्ण अन्तर्भाव नहीं है।
बौद्धोंका प्रत्यक्ष जितना विचित्र है उतना ही उसको समझना भी कठिन है।
वैदिक दर्शनकारोंने इन्द्रियों और पदार्थके सन्निकर्षसे उत्पन्न हुए ज्ञानको प्रत्यक्ष माना
है। जैनियोंका प्रत्यक्ष भी यद्यपि विचित्र ही है किन्तु उसका समझना उतना कठिन
नहीं है। जैनियोंने प्रत्यक्षके दो भेद किये हैं—एक इन्द्रियप्रत्यक्ष (अथवा सांव्यव-
हारिक प्रत्यक्ष) दूसरा अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष (अथवा पारमार्थिक या मुख्य प्रत्यक्ष)।
जैनियोंका इन्द्रिय प्रत्यक्ष लगभग वैदिक दर्शनकारोंके ही जैसा है किन्तु अतीन्द्रिय
प्रत्यक्ष एक प्रकार का योगिज्ञान है, जो केवल आत्मिक शक्तिसे आत्मामें ही होता
है। बौद्ध लोग कल्पना रहित और निर्भ्रान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। (न्या० पृ० ८
भा० पृ० १) कल्पना रहितको प्रत्यक्ष कहनेका कारण यह है कि कल्पना अर्थकी
उपस्थितिकी अपेक्षा नहीं रखती किन्तु बौद्ध प्रत्यक्ष अर्थके सान्निध्यमें ही हो सकता है।
अन्य अवस्थाओंमें नहीं हो सकता (न्या० पृ० १०, ११)