सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 176 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

४ भूमिका ।
कुछ समय के पश्चात् उपरोक्त १९ सम्प्रदायोंमें से कुछ लोप हो गये तथा कुछ
नये उत्पन्न हो गये । इसके परिणामस्वरूप कनिष्कके समयमें चार समुदायोंमें
निम्नलिखित १८ सम्प्रदाय थे—
१. आर्यसर्वास्तिवाद
(१) मूल सर्वास्तिवाद
(२) काश्यपीय
(३) महीशासक
(४) धर्मगुप्तिय
(५) बहुश्रुतीय } ये सब वैभाषिक दर्शनके
(६) ताम्रथारीय } सिद्धान्त वाले हैं ।
(७) विभज्यवादिन्
२. आर्यसम्मतीय
(८) कुरुकुल्लक
(९) आवन्तिक
(१०) वात्सीपुत्रीय
३. आर्यमहासांघिक
(११) पूर्व शैल
(१२) अपर शैल
(१३) हैमवत
(१४) लोकोत्तरवादिन् } ये दार्शनिक विचारोंमें सौत्रान्तिक
(१५) प्रज्ञप्तवादिन् } सम्प्रदायके हैं ।
४. आर्यस्थविर
(१६) महाविहार
(१७) जेतवनीय, और
(१८) अभयगिरिवासिन्
उपरोक्त सब सम्प्रदाय हीनयानके हैं, यद्यपि पीछेसे ये महायानमें भी मिल
गये थे । इनके दार्शनिक विचार क्रमसे वैभाषिक और सौत्रान्तिक मत के हैं ।
कनिष्कके स्थापित किए हुए महायानने माध्यमिक और योगाचार नामके दो और
दार्शनिक सम्प्रदायोंकी नींव रखी । अब बौद्धोंमें चार दार्शनिक सम्प्रदाय हो गये—
(१) वैभाषिक, (२) सौत्रान्तिक, (३) माध्यमिक और (४) योगाचार ।
वैभाषिक सर्वास्तिवाद सम्प्रदायका ही पीछे का नाम है, जो अपने नामके अनुसार
संसारकी आन्तरिक और बाह्य वास्तविकताको स्वीकार करता है । वैभाषिक कहता है
कि हमारा ज्ञान और ज्ञेय ( उस ज्ञानके विषय ) दोनों ही वास्तविक हैं । इस सम्प्रदाय
का मुख्य ग्रन्थ अभिधर्मज्ञान प्रस्थान शास्त्र अथवा केवल ज्ञान प्रस्थान शास्त्र है, जो