न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ भूमिका ।
रखा है ।) क. और ख. दोनों पुस्तकोंमें धर्मोत्तराचार्य की न्यायबिन्दु टीका थी, किन्तु
धर्मकीर्ति का मूल ग्रन्थ केवल ख. में ही था ।
हमने पाठोंके परिवर्तन क. और ख. से चिह्नित किये हैं । छपी पुस्तकको हमने
अपनी टिप्पणीमें मुद्रित पुस्तक ही लिखा है और हमारी सम्मतिमें जहाँ मुद्रित
पुस्तकका पाठ बदलने योग्य था उसको भी हमने टिप्पणीमें दिखला दिया है । यद्यपि
हमने पीटर्सन साहिबकी सभी अशुद्धियोंको बतलाया है तथापि हमारे ग्रन्थमें भी प्रूफ़
सम्बन्धी बहुतसी अशुद्धियां अनुभव हीनताके कारण रह गई होंगी । आशा है
विद्वज्जन मुझको इसके लिए क्षमा करते हुए उनको सुधार कर पढ़ेंगे ।
( २ ) बौद्धन्यायके इतिहास पर एक दृष्टि ।
यद्यपि दर्शनशास्त्रके आरंभिक कालमें भी बहुतसे शास्त्रार्थ हुआ करते थे तथापि
उस समय न्यायकी ओर किसीका विशेष लक्ष्य न था । बुद्धके निर्वाणके समयकी
पुस्तकोंमें भी इसका कुछ विवरण नहीं है। गौतमका न्यायसूत्र उस समय तक बन
चुका था । किन्तु बौद्ध और जैन दार्शनिकोंका ध्यान अभी तक उधर आकर्षित नहीं
हुआ था । यद्यपि सुत्तपिटकके दिग्घनिकायके भाग ब्रह्मजाल सुत्त, मज्झिमनिकायके
भाग अनुमान सुत्त और खुद्दकनिकायके भाग उद्दान तथा विनयपिटकके परिवार
और पातिमोक्ख तथा अभिधम्मपिटकके कथावत्थुप्रकरण आदि ग्रन्थोंमें न्यायके कुछ
शब्द तथा निर्णय करनेके कुछ नियम मिलते हैं किन्तु हमारी सम्मतिमें उनपर भी
गौतमके न्यायसूत्रोंकी छाप पूर्ण रूपसे लगी हुई है । क्योंकि उनमें 'उपनय' तथा
'निग्रह' का भी कुछ वर्णन किया गया है । नीति ( अथवा न्याय ) शब्दका उल्लेख
पालीके केवल एक ग्रन्थ मलिन्दपन्होमें ( जो कि भिक्षुसूत्र भी कहलाता है ) मिलता
है । इससे भलीप्रकार पता चल सकता है कि उस समयके बौद्ध आचार्योंने इस विषय
पर कितना प्रकाश डाला है ।
ईस्वी सन्के आरम्भमें भारत पर कुशान, तुरुष्क अथवा सीथियन लोगोंके
आक्रमण हुए । उनके एक सरदारका नाम कनिष्क था । उसने काश्मीर, पल्हव और
देहलीको विजय किया । उसके विषयमें कहा जाता है कि उसीने ईस्वी सन् ७८ में
एक संवत् की नींव डाली । उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और बौद्धोंका एक
नया सम्प्रदाय महायानको स्थापित किया । तबसे पाली त्रिपिटकमें वर्णित प्राचीन
सम्प्रदाय हीनयान कहा जाने लगा । महायान क्रमशः नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया, चीन,
जापान और कोरिया आदिमें फैल गया और हीनयान सिंहल और वहांसे बर्मा और
श्याम आदिमें फैल गया । भारतमें दोनों ही सम्प्रदाय चलते रहे ।
कनिष्कके संरक्षण तथा पार्श्व ( या पूर्णक ) और वसुमित्रके निरीक्षणमें ५०० बौद्ध
भिक्षुओंकी एक वृहत्सभा जालन्धरमें हुई । इसमें पालीके सुत्त, विजय तथा अभिधम्म
इन त्रिपिटकोंकी टीका स्वरूप क्रमशः सूत्र उपदेश, विनय विभाषा और अभिधर्म
विभाषा बनाये गये । महायान सम्प्रदायके साहित्यमें सबसे प्राचीन यही ग्रन्थ है ।