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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

१४ भूमिका ।
यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था और यह भी
बतला दिया गया है कि धर्मपाल योगाचार ( विज्ञानाद्वैतवाद ) मतावलम्बी था ।
अतएव जो मत गुरुका हो वही शिष्यका भी होना चाहिये । किन्तु न्यायविन्दुमें स्थान
स्थान पर ऐसे वाक्य आये हैं जिनसे बाह्य अर्थका अस्तित्व स्पष्ट प्रतीत होता है ।
उदाहरणके लिये ऐसे कुछ वाक्य दिये जाते हैं—
‘इन्द्रियज्ञानम्’ पृ० १२
‘स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तरप्रत्ययेन जनितं तन्मनो-
विज्ञानम्’ पृ० १३
‘सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम्’ पृ० १४
‘भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति’ पृ० १४ इत्यादि २ ।
न्यायविन्दुके इस प्रकारके वाक्य ही इस प्रश्नको उपस्थित करते हैं कि वह
बाह्यार्थास्तित्ववादी था या विज्ञानाद्वैतवादी ? क्योंकि यद्यपि योगाचार बाह्य अर्थको
नहीं मानता तथापि उपचारसे उसको वह भी मानता ही है । यदि हम धर्मकीर्तिको
विज्ञानाद्वैतवादी मान लें तो न्यायविन्दुके बाह्यार्थास्तित्ववाचक शब्दोंको औपचारिक
मानना पड़ेगा । किन्तु उन वाक्योंके ढंगसे ऐसा प्रतीत नहीं होता । यदि उक्त वाक्य
औपचारिक होते तो उनमेंसे किसीमें तो उपचारवाचक शब्द अवश्य ही होता किन्तु
ऐसा कोई शब्द न्यायविन्दुमें उपलब्ध नहीं है । अतएव धर्मकीर्तिको विज्ञानाद्वैतवादी
मानना युक्तिसंगत नहीं है ।
इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि धर्मकीर्ति पहिले तीर्थमतका था । उसके
दिग्विजयसे प्रतीत होता है कि उसका मनन वैशेषिक आदि मतोंका विशेष था ।
वेदान्तियोंसे उसकी किसी भी भिज्ञताका पता नहीं चलता है । अतएव बौद्ध होनेसे
पूर्व वह बाह्य और आन्तर दोनों प्रकारके पदार्थके अस्तित्वको माननेवाले किसी
दर्शनका अनुगामी होगा । सो दोनोंके अस्तित्वको माननेवालेकी दूसरी सीढ़ी एकको ही
मानना या न मानना हो सकती है और वह सीढ़ी बाह्यार्थास्तित्ववाद है । अतएव
धर्मकीर्ति बाह्यार्थास्तित्ववादी था ।
तीसरी बात यह भी है कि नैयायिक प्रायः कमसे कम बाह्य अर्थको माननेवाले
होते हैं । जैन यद्यपि बाह्य और आन्तर दोनों अर्थको मानते हैं तथापि शास्त्रार्थकी
झंझटोंको दूर करने और विपक्षीको आक्षेपका मौका न देनेके लिये ही उनको मतिज्ञान-
रूप परोक्षज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहना पड़ा है । अतएव ऐसी दशामें यह आशा
नहीं की जा सकती कि बौद्ध न्यायका उद्धार कर्ता धर्मकीर्ति बाह्य अर्थतकका स्पष्ट
रूपसे अस्तित्व न मानता होगा ।
( ५ ) धर्मकीर्तिका बौद्ध न्यायमें स्थान ।
धर्मकीर्तिके बौद्धन्यायमें स्थानको लिखनेसे पूर्व यह प्रश्न उपस्थित होता है कि
धर्मकीर्तिका बौद्ध दर्शनमें क्या स्थान है ? किन्तु उसके बनाये हुए किसी भी दार्शनिक