न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयही समय है। इससे परिणाम निकाला जा सकता है कि गोविन्दचन्द्रके पुत्र
ललितचन्द्र ७वीं शताब्दीके अन्तमें हुए होंगे। अतएव ललितचन्द्रके समकालीन
विनीतदेव भी उसी समय हुए होंगे। क्योंकि यह विचार धर्मकीर्तिके समयसे भी मिलता
है (जिसकी उसने टीका की थी।)
रविगुप्त (लगभग ७२५ ई०) काश्मीरमें उत्पन्न हुए थे। ये वारेन्द्रके राजा
हर्षके समकालीन थे और न्यायमंजरीकार जयन्तसे पूर्व उत्पन्न हुए थे। ये अवश्य
ही सातवीं शताब्दीके पूर्वार्धमें रहे होंगे। क्योंकि उनका शिष्य प्रसिद्ध तांत्रिक साधु
सर्वज्ञ मित्र उस शताब्दीके मध्यमें था। गुप्त सम्वत् ४३५ (७५४ ई०) में वसन्तसेनके
लेखोंमें उनको सर्वदण्डनायक और महाप्रतिहार कहा गया है। उन्होंने धर्मकीर्तिके
प्रमाणवार्तिकपर प्रमाणवार्तिकवृत्ति बनाई थी।
विशालामलवती नाम प्रमाण समुच्चयटीकाके लेखक जिनेन्द्रबोधि (लगभग ७२५ ई०)
थे। सम्भवतः ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने ८वीं शताब्दीमें पाणिनिव्याकरणके ऊपर
प्रसिद्ध न्यास लिखा था।
शान्तरक्षित (७४९ ई०) जहूर (बंगालमें या लाहौरके पास) के राजवंशमें
उत्पन्न हुए थे। यद्यपि इनका समय अनिश्चित ही है तथापि यह कहा जाता है कि
वह गोपाल (जिसने ७०५ ई० तक राज्य किया) के समयमें जन्मे और धर्मपाल
(जो ७६५ में राजा हुआ) के समयमें मरे थे। वे स्वतन्त्र माध्यमिक मतके अनु-
यायी और नालन्दके अध्यापक थे। ये राजा खीस्रानडीत्सान Khrisron-dea-
tsan (जो ७२८ ई० में उत्पन्न और ८६४ ई० में मरा) के निमन्त्रणपर तिब्बत
गये थे। राजाने शान्तरक्षितकी सहायतासे ७४९ ई० में समयेके बिहार (Monas-
tery of sam-ye) को बनवाया था जो मगधके उदन्तपुर विहारके जैसा बनाया
गया था। तिब्बतमें समये सबसे पहिला नियमित विहार था और शान्तरक्षित उसके
पहिले महन्त थे। उन्होंने तिब्बतमें १३ वर्ष तक अर्थात् ७६२ ई० तक कार्य किया।
वे वहां आचार्य बोधिसत्त्वके नामसे प्रसिद्ध थे। वे निम्नलिखित ग्रन्थोंके कर्ता थे
वादन्यायवृत्ति विपंचितार्थ, धर्मकीर्तिके वादन्याय की टीका और तत्त्वसंग्रहकारिका-
यह ३१ अध्यायोंका अमूल्य दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें सांख्य जैन आदिका खण्डन भी है।
न्यायबिन्दु पूर्वपक्षे संक्षिप्त (धर्मकीर्तिके न्यायबिन्दु की समालोचनाओं का संक्षेप)
और तत्त्वसंग्रह पंजिका (शान्तरक्षितके तत्त्वसंग्रहकी टीका) के कर्ता कमलशील
(लगभग ७५० ई०) शान्तरक्षितके अनुगामी थे। इन्होंने तिब्बतमें महायान होशंग
नामक चीनी साधुको पराजित करके बड़ा नाम कमाया था।
सर्वज्ञसिद्धि कारिका, बाह्यार्थसिद्धिकारिका, श्रुतिपरीक्षा, अन्यापोहविचार कारिका
और ईश्वरभंग कारिकाके कर्ता कल्याणरक्षित धर्मोत्तराचार्यके गुरु थे। ये राजा धर्मपाल
के समकालीन थे, जिनका देहान्त ८२९ ई० में हुआ था।