न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ भूमिका।
(उदाहरणके लिये शरीर) और असंघात (उदाहरणके लिये जीव) दोनोंको
ही बतला सकता है। यदि वक्ता 'दूसरेके लिये' शब्दको असंघात अर्थमें प्रयोग
करे जिसको श्रोता संघात अर्थमें समझ जावे तो उस समय साध्य हेतुके विरुद्ध हो
जावेगा। उस समय वह हेतु इष्टविघातकृत् विरुद्ध कहलाता है।
धर्मकीर्तिने अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इसको पहिले विरुद्धका ही उदाहरण माना
है। क्योंकि अनुमान वाक्यमें प्रयोग किये हुए साध्यवाचक शब्दका एक ही अर्थ
हो सकता है। और यदि कहे हुए और समझे हुए अर्थोंमें सन्देह हो तो प्रकरणसे
पहिले वास्तविक अर्थ निश्चय कर लेना चाहिये। यदि प्रयोग किया हुआ अर्थ
वास्तविक होगा तो सा य और हेतुमें स्वाभाविक विरोध होगा।
विरुद्धव्यभिचारी।
दिङ्नागने एक और हेत्वाभास 'विरुद्धाव्यभिचारी' भी माना है, जिसको उसने
सन्देहका कारण कहा है। यह ऐसे स्थानपर होता है जब दो विरुद्ध परिणाम एक ही
हेतु (Valid truth reason) से पुष्ट किये जाते हैं।
उदाहरणके लिये-एक वैशेषिक दार्शनिक कहता है-
शब्द अनित्य है क्योंकि वह उत्पन्न होता है।
एक मीमांसक उत्तर देता है-
शब्द नित्य है क्योंकि वह श्रव्य (सुनने योग्य) है।
उपरोक्त मामलों में काममें लाये हुए दोनों हेतु क्रमसे वैशेषिक और मीमांसाके
सिद्धान्तके पुष्ट करनेके कारण उन २ दर्शनकारों द्वारा ठीक माने जाते हैं। किन्तु
दो विरुद्ध परिणामोंपर लेजानेसे वह अनिश्चित है। और इसीलिये वह हेत्वाभास है।
धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुमें विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभासका निषेध (न्या० पृ०
८६-८८ भाषा० पृ० २४-२५) किया है। इसका कारण उन्होंने यह दिया है
कि यह न तो अनुमानके विषयमें ही उठता है और न शास्त्र ही इसका आधार है।
हेतुका साध्यमें स्वभाव, कार्य या अनुपलब्धि रूपमें रहना आवश्यक है और उसके
द्वारा ठीक परिणाम निकलना चाहिये।
परस्परविरोधी दो परिणाम ऐसे हेतुओंसे पुष्ट नहीं हो सकते जो ठीक (Valid)
हैं। परस्पर विरुद्ध दो परिणामोंके सिद्ध करने में दो शास्त्र उसी प्रकार सहायता नहीं
कर सकते जिस प्रकार एक शास्त्र प्रत्यक्ष और अनुमानको पुष्ट नहीं कर सकता और
वह केवल बुद्धिके न पहुँचने योग्य विषयोंमें ही प्रमाण होता है। इसलिये विरुद्धव्य-
भिचारी असंभव है।
दृष्टान्तका कार्य।
दिङ्नागके विरोधमें धर्मकीर्ति (त्रिरूपो हेतुरुक्तः। तावतैव अर्थप्रतीतिरिति न
पृथग् दृष्टान्तो नाम साधनायवः कश्चित्। तेनास्य लक्षणं पृथग् [ न ] उच्यते गतार्थ-
त्वात्। (न्या० पृ० ९१ भाषा० पृ० २६) सम्भवतः 'न' भूलसे छूट गया है।