न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
( १ ) प्राथमिक निवेदन ।
हर्षका विषय है कि आजकलके विद्वानोंका हृदय क्रमशः धार्मिक विषयोंमें उदार
विचारों का होता जा रहा है। भिन्न २ मत वाले विद्वानोंके द्वारा भिन्न २ मतकी
पुस्तकों का सम्पादन उसीका शुभ परिणाम है। यद्यपि प्राचीन कालके भारतीय
विद्वान् भी भिन्न २ मतोंके ग्रन्थोंका अध्ययन करते थे तथापि उनका अध्ययन प्रायः
उन ग्रन्थोंका खण्डनमण्डन करनेके उद्देश्यसे ही होता था, जैसा कि स्वामी शङ्कराचार्य,
जैन न्यायके उद्धारक श्री अकलङ्कदेव आदिके ग्रन्थोंको देखनेसे पता चलता है। हर्षकी
बात है कि आजकलके बहुतसे विद्वानोंका यह मत हो गया है कि प्रत्येक धर्ममें अधिक
परिमाणमें सत्य विद्यमान है। पश्चिमीय विद्वानोंके विचार इस विषयमें बहुत ही
प्रशंसनीय हैं। हमारे बहुतसे ग्रन्थोंको और बौद्ध साहित्यके अधिकांश ग्रन्थोंको
संसारके प्रकाशमें लानेका श्रेय उन्हींको प्राप्त है। प्रस्तुत ग्रन्थ और उसके कर्त्ता
आचार्य धर्मकीर्ति और धर्मोत्तरके विषयमें भी हमको सर्व प्रथम उन्हींसे विदित
हुआ था। यद्यपि आचार्य धर्मकीर्ति और न्यायबिन्दु का नाम सर्वदर्शनसंग्रह इत्यादि
हिन्दूग्रन्थों और प्रमेयकमलमार्त्तण्ड आदि जैन ग्रन्थों में विद्यमान होनेके कारण
भारतीय विद्वानोंको पहिलेसे ही विदित था, किन्तु अनुसन्धानप्रियताके अभावके
कारण उनका जानना न जानना एक सा ही था। हमको पहिले पहल 'आचार्य धर्मो-
त्तर' का नाम बतलानेवाला पश्चिमीय विद्वान् ( W. Wassiljew ) डब्ल्यू वैसिल्ज्यू
नामका एक रूसी विद्वान् था। यह विद्वान् सन् १८४० से १८५० तक ( दस वर्ष
तक ) पेकिनमें रहा। यह चीनी और तिब्बी दोनों भाषाओंका अच्छा पण्डित था। इसने
इन भाषाओंके ज्ञानसे बहुतसे बौद्ध ग्रन्थोंका पता लगाया।
इन्होंने अपने सबसे पहिले ग्रन्थ 'बुधिज्म, इटस् डाग्मस, हिस्ट्री ऐण्ड लिटेरेचर'
( Buddhism, its Dogmas, History & Literature ) में धर्मोत्तरके
विषयमें बहुत कुछ बतला दिया है।
न्यायबिन्दुको सर्व प्रथम प्रो. पीटर्सन साहिबने १८८९ में निकाला था।
यह संस्करण उन्होंने उक्त ग्रन्थकी दो हस्तलिखित प्रतियों ( Manuscripts )
की सहायतासे सम्पादन किया था, जिनमें से एक उनको काम्बेके शान्तिनाथके जैन
मन्दिरमें ताड़पत्र पर लिखी हुई मिली थी। (पीटर्सन साहबने इस प्रतिका नाम (A)
और हमने (क) रखा है।) और दूसरी रायल एशियाटिक सोसायटी की बम्बई
शाखाके भाऊ दाजीके हस्तलिखित ग्रन्थोंके संग्रहमें भगवान् दास केवलदास की
सूचनाओंमेंसे मिली थी। (पीटर्सन साहबने इसका नाम (B) और हमने (ख)