न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ५
बुद्धके ३०० वर्ष पश्चात् बना था । इसका दूसरा ग्रन्थ अभिधर्म महाविभाषा शास्त्र
अथवा केवल विभाषा है, जो सन् ७८ ईस्वीके लगभग कनिष्ककी सभामें बनाया गया
था । इस सम्प्रदायका नाम वैभाषिक इसी विभाषासे आया है। क्योंकि विभाषाका अर्थ
टीका है । ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्धकी शिक्षाओंपर निर्भर करनेकी अपेक्षा
टीकाओंपर ही निर्भर करनेके कारण यह सम्प्रदाय वैभाषिक कहलाता है । संघभद्रका
न्यायानुसार शास्त्र अथवा कोशकारक शास्त्र, ( जो ४८९ ईस्वीके लगभग बना था )
इस सम्प्रदायका बड़ा विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ है ।
सौत्रान्तिक ज्ञान और बाह्य विषयोंकी सत्ताको अनुमानके द्वारा स्वीकार करता है ।
सौत्रान्तिक शब्द सूत्रान्तसे निकाला गया है, जिसका अर्थ सूत्रका अन्त है। सम्भवतः
टीकाओंकी अपेक्षा बुद्धकी शिक्षाओं पर ही निर्भर करने के कारण यह सम्प्रदाय
सौत्रान्तिक कहलाता है। वह मूल जिसके आधार पर सौत्रान्तिक दर्शन बना है आर्य-
स्थविर ( अथवा पालीके अनुसार थेराओं ) और महासांघिकों के सम्प्रदायसे सम्बन्ध
रखता है । यह कहा जाता है कि इस सम्प्रदायके दार्शनिक सिद्धान्तोंको एक धर्मोत्तर
या उत्तरधर्म नामके आचार्यने कनिष्कके समयमें सन् ७८ ई० के लगभग काश्मीरमें
बनाया था । परन्तु चीनी यात्री हुएन्त्सांग ( जो भारतमें ७ वीं शताब्दीके प्रारम्भमें
आया था ) के अनुसार इस सम्प्रदायका संस्थापक तक्षशिलाका प्रसिद्ध अध्यापक
कुमारलब्ध था, जिसने इस विषय पर बहुतसे अमूल्य ग्रन्थ लिखे थे । कुमारलब्ध,
नागार्जुन, आर्यदेव और अश्वघोषके समकालीन थे, अतएव उनके सन् ३०० ई० के
लगभग होनेका अनुमान किया जाता है । दूसरे अत्यन्त प्रसिद्ध अध्यापक श्रीलब्ध थे,
जिन्होंने सौत्रान्तिक सम्प्रदायके विभाषाशास्त्र को लिखा था । हुएन्त्सांगने अयोध्यामें
संघारामके वह खंडहर देखे थे जिनमें श्रीलब्ध रहते थे ।
योगाचारका सिद्धान्त है कि बाह्य पदार्थ तो वास्तविक नहीं हैं किन्तु हमारे
ज्ञानकी वास्तविकताका निषेध नहीं किया जा सकता । योगाचार शब्द योग और
आचार दो शब्दों से बना है। योग करने को योगाचार कहते हैं । भूमियों ( बौद्ध
पूर्णताकी १७ श्रेणियों ) की प्राप्तिका असाधारण कारण केवल योगको ही कहनेके
कारणसे यह योगाचार कहलाता है । योगाचारमें प्रतिपादित किया हुआ मुख्य
सिद्धान्त आलय विज्ञान है । यह चेतनात्मक ( Conscious ) अवस्थाओं का मूल
है और हमारे 'आत्मा' के समान है। इस सम्प्रदायके संस्थापकका कुछ भी पता नहीं
चलता । परन्तु तिब्बत और चीनकी पुस्तकोंमें लंकावतार सूत्र, महासमय सूत्र,
बोधिसत्त्वचर्यानिर्देश और सप्तदश भूमिशास्त्र को इस संप्रदायके प्राचीन तथा प्रामाणिक
ग्रन्थ मानते हैं । मैत्रेयनाथ और आर्य असङ्ग इसके आरंभिक अध्यापक थे ।
ऐसा प्रतीत होता है कि योगाचार की स्थापना लगभग सन् ३०० ई० में हुई थी, जब
कि लंकावतार सूत्र आदि बनाये गये थे ।
माध्यमिकोंका सिद्धान्त है कि हमारा विज्ञान और उनके विषयीभूत बाह्यपदार्थ
२ न्या० भू०