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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

भूमिका । १६
योगदर्शनके पातञ्जल भाष्यमें प्रथम मतको ही स्वीकार किया गया है। किन्तु
सांख्यका प्राचीन मत उपरोक्त मतोंमेंसे दूसरा प्रतीत होता है। इस प्रकार सांख्य तथा
योगदर्शनका प्रमाण अस्वसंवित् और अचेतन है।
प्रमाणका लक्षण न्यायदर्शन या वात्स्यायनभाष्य किसीमें भी नहीं मिलता। न्याय-
भाष्यकी टीका न्यायवार्तिकमें निम्नलिखित वाक्य मिलते हैं—
इन्द्रियं खलु अर्थप्रकाशकत्वात् प्रमाणं····················उपलब्धिहेतुः प्रमाणम्।···
प्रमाणोत्पत्ताविन्द्रियार्थसन्निकर्षमपेक्षमाणाभ्यां प्रमातृप्रमेयाभ्यां प्रमाणं जन्यते।
अर्थात् अर्थके प्रकाशक होने से इन्द्रिय ही प्रमाण है। क्योंकि उपलब्धिका
हेतु प्रमाण होता है। और प्रमाणकी उत्पत्तिमें इन्द्रिय और अर्थके सन्निकर्षकी अपेक्षा
करनेवाले प्रमाता और प्रमेय ज्ञानके जनक होते हैं।
किन्तु अन्य ग्रन्थोंको परिशीलन करनेसे पता चलता है नैयायिक मतमें भी
सन्निकर्षको ही प्रमाण माना है।
वैशेषिक दर्शनके प्रशस्तपाद भाष्यमें लिखा है—
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः।··········तस्या सत्यप्यनेकविधत्वे समा-
सतो द्वे विधे विद्या चाविद्या चेति।·········विद्यापि चतुर्विधा। प्रत्यक्षलैङ्गिक-
स्मृत्यार्षलक्षणा।
अर्थात् बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय ये सब ही एकार्थवाची हैं। उसके
(बुद्धिके) अनेक भेद होने पर भी संक्षेपसे दो भेद हैं। विद्या और अविद्या। विद्याके
भी चार भेद हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति और आर्ष।
इससे प्रतीत होता है कि वैशेषिकोंके विद्या और प्रमाण भिन्न २ नहीं हैं। अतएव
वैशेषिक दर्शनके अनुसार प्रमाण ज्ञान है।
मीमांसामें मुख्य रूपसे दो आचार्योंके मत लिये जाते हैं। कुमारिलभट्ट और
प्रभाकरके—
कुमारिलने प्रमाणका यह लक्षण किया है—
‘अनधिगततथाभूतार्थनिश्चायकं प्रमाणम्’ अर्थात् जो न जाने हुए और तथाभूत
(वास्तविक) अर्थका निश्चय करावे वह प्रमाण है। यह एक प्रकारका ‘प्रमाकरणं
प्रमाणम्’ ही हुआ।
प्रभाकरका प्रमाणका लक्षण यह है—
‘अर्थतथात्वप्रकाशको ज्ञातृव्यापारोऽज्ञानरूपोऽपि प्रमाणम्’ अथवा ‘अनुभूतिः प्रमाणम्’।
अर्थात् अर्थके वास्तविक रूपको प्रकाशित करने वाला ज्ञाताका अज्ञानरूप अनुभव
व्यापार प्रमाण है अथवा अनुभूति या अनुभव ही प्रमाण है। यहाँ भी प्रमाण
ज्ञान रूप है—
जैनियोंके न्यायके प्रसिद्ध ग्रन्थ परीक्षा मुखमें प्रमाणका यह लक्षण किया गया
है—‘स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्’।