न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । १७
तिब्बती अनुवादमें ‘न’ मिलता है ।) कहता है कि ‘दृष्टान्त’ नामका कोई साधनका
अवयव नहीं है । क्योंकि इसका हेतुमें अन्तर्भाव हो जाता है । जैसे—
पर्वतमें अग्नि है क्योंकि वहाँ धूम है । जैसे पाकशाला में ।
इस वाक्यमें दृष्टान्त पाकशाला और उसी प्रकारकी अन्य वस्तुएं हेतु में ही
आजाती हैं । अतएव ‘दृष्टान्त’ पाकशालाको पृथग् कहना व्यर्थ है । धर्मकीर्ति
कहता है कि इतना होने पर भी दृष्टान्त का यह मूल्य है ही (...................
उक्तम् अभेदेन···पुनर्विशेषेण दर्शनीयायुक्तौ ) कि यह हेतुके द्वारा साधारण रूपसे
कथन लिये हुए को विशेषरूपसे बतला देता है । इस प्रकार साधारण कथन ‘सब
धूम वाली वस्तु अग्नि वाली होती हैं’ को विशेष दृष्टान्त पाकशाला ने अधिक
जोरदार बना दिया जो कि धूम वाली भी है और अग्नि वाली भी है ।
( ७ ) न्यायबिन्दु तथा उसका न्याय ।
इस बातको प्रमाणित करने की अब कोई आवश्यकता नहीं रह गई है कि प्राचीन
कालमें सब दर्शनकारोंने अपनी २ प्रमाण व्यवस्था पृथक् ही खड़ी की थी । यद्यपि
यह आवश्यक नहीं था कि उन सबकी व्यवस्थाएं एक दूसरेसे भिन्न ही हों तथापि
अपनी मानी हुई वस्तुके स्वरूपको बतलाने तथा अपनी युक्तियोंको सिद्ध करनेके लिये
पृथक् ही प्रमाणकी आवश्यकता थी । जहां दर्शन पदार्थोंका वर्णन करता है वहां
न्याय उन पदार्थोंको सिद्ध करने वाली युक्तियोंका वर्णन करता है । इस प्रकार दर्शन
और न्याय दोनों सापेक्ष हैं । प्रमाण सामान्यका लक्षण तो एक प्रकारसे विशुद्ध
दार्शनिक विषय है अतएव इस पर हम पृथक् विचार करेंगे ।
यह पीछे प्रमाणित किया जा चुका है कि यद्यपि बौद्धन्याय गौतमके न्यायदर्शन-
के पीछे बना है तथापि भारतके दार्शनिकोंको विशुद्ध न्यायके ही ग्रन्थोंको लिखनेका
मार्ग बौद्ध नैयायिकोंने ही दिखलाया है । गौतमीय न्याय अथवा प्राचीन न्याय, दर्शन
और न्यायका मिला हुआ ग्रन्थ है । किन्तु बौद्धोंने अपने न्यायग्रन्थोंकी स्वतन्त्र रचना
करके उस समय भारतपर अपना सिक्का जमा लिया । ब्राह्मणोंके पास तो पहिलेसे
ही न्याय दर्शन था । अतएव उन्होंने उसकी ही टीका प्रटीकाओं तथा उसी ढंगके
अन्य ग्रन्थोंपर ही भरोसा रखा, किन्तु जैन नैयायिकोंसे यह सहन न हुआ । अस्तु,
उन्होंने भी बौद्धोंके समान न्यायके ऊपर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने आरम्भ किये । भारतका
मध्यकालीन दार्शनिक इतिहास जैन और बौद्ध धर्मोंके ही शास्त्रार्थोंसे भरा पड़ा है ।
धीरे २ कालयोगसे ब्राह्मणोंका फिर प्राबल्य हुआ । उस समय अपनी कुछ आन्तरिक
निर्बलताओं तथा कुछ जैन और ब्राह्मणोंके धक्केसे बौद्ध धर्मपर तो ऐसा आघात
पहुंचा कि वह भारतसे अदृश्य ही हो गया । किन्तु जैन धर्म किसी प्रकार सबकी
चोटें सहता हुआ अभी तक भारतवर्षमें फैल ही रहा है । मिथिला तथा नवद्वीपके
नैयायिकोंने अभी लगभग छः सौ वर्ष पूर्व प्राचीन न्यायका परिष्कार करके एक नव्य
न्याय खड़ा किया है किन्तु यह प्राचीन न्यायका ही रूपान्तर है । अतएव मुख्य न्याय