न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 176 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ भूमिका ।
मृत्यु नहीं चाहता था, आग्रह किया कि पराजित व्यक्ति विजेताके धर्मको स्वीकार कर
ले । इस प्रकार धर्मको पारितोषिकके रूपमें रखकर दोनों शास्त्रार्थमें भिड़ गये ।
किन्तु विजयश्री अन्तमें धर्मकीर्तिके ही हाथ रही । कुमारिल और इसके ५०० अनुगामी
बौद्ध हो गये ।
उसकी दिग्विजय ।
धर्मकीर्तिने इसके पश्चात् निर्ग्रन्थ (दिगम्बर जैनी) रघुव्रतिन् और दूसरोंपर
जो विन्ध्याचलमें रहते थे विजय पायी । उसने द्रवली ( द्राविड ) को लौटते हुए घोषणा
करादी कि जो तैयार हो आकर शास्त्रार्थ करे । तीर्थ लोगोंकी अधिकांश संख्या भाग
गयी और कुछने बिलकुल स्वीकार कर लिया कि उस युद्धमें उनके समान नहीं थे ।
उसने उस देशकी उन सब धार्मिक संस्थाओंका जो अवनत दशामें पड़ी हुई थीं,
उद्धार किया और फिर वह गहन वनमें जाकर एकान्त सेवन और ध्यान
करने लगा ।
धर्मकीर्तिने अपने जीवनकी समाप्तिके दिनोंमें कलिङ्ग देशमें एक विहार बनवाया
और बहुतसे लोगोंको अपने धर्ममें दीक्षित कर परलोकवासी हुआ । उसके वह शिष्य
जिनकी आत्मा ब्रह्मके समान हो गयी थी उसको दाहसंस्कारके लिये श्मशानभूमिमें ले
गये । वहाँ एक पुष्पोंकी भारी वृष्टि हुई और सात दिन तक सारा देश सुगन्ध और
रागोंसे भरा रहा ।
ये आचार्य ( धर्मकीर्ति ) और तिब्बतका राजा स्रोत्सँगम्पो समकालीन कहे जाते
हैं, जो कि प्रमाण रूपमें माना जा सकता है ।
धर्मकीर्त्तिका समय ।
इस कथनमें यह स्पष्ट है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था । धर्मपाल ६३५ ई०
में जीवित था (जैसा कि हुएन्त्सांगके लेखोंसे स्पष्ट है ) अतएव धर्मकीर्ति भी उस
समयके लगभग अवश्य रहा होगा । यह समय धर्मकीर्तिके राजा स्रोत्सँगम्पो का
समकालीन होनेके भी अविरुद्ध है, जो ६२७-६९८ तक जीवित रहा । ऐसा प्रतीत
होता है कि ६३५ ई० में धर्मकीर्ति बहुत छोटा था, क्योंकि हुएन्त्सांगने उसका नाम
नहीं लिया है । इसके विरुद्ध इत्सिंग, जिसने भारतमें ६७१-६९५ ई० तक यात्राकी
दिङ्नागके पश्चात् 'धर्मकीर्तिने न्यायमें आगे कैसे उन्नति की' का वर्णन प्रभावपूर्ण
शब्दोंमें करता है। धर्मकीर्तिने ब्राह्मण नैयायिक उद्योतकर पर आक्षेप किया है। इसके
विरुद्ध बृहदारण्यकवार्तिकके रचयिता मीमांसक सुरेश्वराचार्य और अष्टसहस्रीके रचयिता
दिगम्बर जैन विद्यानन्दिने धर्मकीर्तिकृत प्रत्यक्षके लक्षणकी समालोचना की है ।
धर्मकीर्ति अन्य ग्रन्थोंमें केवल कीर्ति भी कहा गया है। वाचस्पति मिश्रने भी धर्मकीर्तिकी
समालोचना करनेके लिये उनका नाम लिया है ।