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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

भूमिका। ११
नाम चूडामणि रहा हो । उनके पिता ब्राह्मण जातिके तीर्थ थे । ( बौद्धलोग अपने और
जैनधर्मके अतिरिक्त शेष भारतीय धर्मवालोंको तीर्थ कहते थे ।) उनका नाम परिव्राजक
कुरुनन्द था । धर्मकीर्ति बाल्यावस्थासे ही बड़े बुद्धिमान् और प्रतिभाशाली थे । अतएव
ये शीघ्र ही वेद, वेदाङ्ग, वैद्यक, व्याकरण आदि तीर्थों के सभी सिद्धान्तोंमें दक्ष हो
गये । १६ या १८ वर्षकी अवस्थामें ही ये तीर्थोंके दर्शनशास्त्रके अच्छे विद्वान् पण्डित
हो गये । ये प्रायः बौद्धधर्मके व्याख्यान भी सुना करते थे अन्तमें इनको विश्वास हो
गया कि बौद्ध सिद्धान्त बिलकुल निर्दोष है । अब ये पूर्णरूपसे बौद्ध धर्मकी ओर
झुकने लगे । इन्होंने अपना वेष बौद्ध उपासकों का सा बनाया । जब ब्राह्मणोंने इनसे
इसका कारण पूछा तो इन्होंने बौद्धधर्मकी प्रशंसा की । ये इसी बात पर जातिच्युत
कर दिये गये । इसके पश्चात् ये मध्यदेशमें आये । ( यद्यपि तिब्बतदेशीय साहित्यमें
मध्यदेश मगध को कहा है परन्तु मनुजी ने उत्तरमें हिमालय, दक्षिणमें विन्ध्याचल,
पूर्वमें प्रयाग और पश्चिममें सरस्वती ही के बीचके देशको मध्यदेश कहा है । जैसा कि
कहा है—'हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्ये यत् प्राग् विनशनादपि । प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः
प्रकीर्तितः ॥ मनु० ॥ २ ॥ २१ ॥' ) यहां इनको आचार्य धर्मपालने संघमें प्रविष्ट कर
लिया । इन्होंने यहाँ त्रिपिटकोंका अध्ययन किया । अब इनको ५०० सूत्रधारणी
कण्ठ याद हो गई ।
धर्मकीर्ति और कुमारिल ।
ये तीर्थमतके गुप्त सिद्धान्तोंके जानने की अभिलाषासे दासोंका सा वेष बनाकर
दक्षिण की ओर गये । यहाँ इनको पूछनेसे विदित हुआ कि ब्राह्मण कुमारिल उक्त
विषयके अद्वितीय विद्वान् थे । भारतीय ग्रन्थ कुमारिलके धर्मकीर्तिका चाचा होने की
किम्बदन्ती का समर्थन नहीं करते । कुमारिलके पास राजा की दी हुई बड़ी भारी
सम्पत्ति थी । इनके पास बहुतसे चावलोंके खेत, ५०० दास, ५०० दासियां और कई
सौ आदमी थे । जब धर्मकीर्तिने उनके यहां सेवाकार्यमें प्रवेश पाकर बाहर और भीतर
के ५० दासोंका काम संभाल लिया तो कुमारिल और उनकी स्त्री सन्तुष्ट हो गये ।
अब धर्मकीर्ति को गुप्त सिद्धान्तोंके सुननेकी आज्ञा मिल गई । धर्मकीर्तिने कुमारिलसे
गुप्तशिक्षाका ज्ञान प्राप्त करके उनका घर छोड़ दिया । कुमारिलसे उसको अपनी विशेष
सेवाके बदलेमें कुछ धन भी मिला था, जिससे उसने अपनी यात्राकी रात्रिमें ब्राह्मणों
को एक बड़ा भोज दिया ।
अब उसने कणादके मत वाले कणादगुप्त और तीर्थमतके अन्य अनुयायियों को
शास्त्रार्थके लिए आह्वान किया और उनसे शास्त्रार्थ करने लगा । शास्त्रार्थ बराबर तीन
मास तक होता रहा, जिसमें उसने अपने सभी विपक्षियों को पराजित कर दिया और
उनमेंसे बहुतोंको बौद्ध बना लिया । इसपर कुमारिलको बड़ा क्रोध आया । वह ५००
ब्राह्मणोंको लेकर शास्त्रार्थके लिये अग्रसर हुए । कुमारिलने प्रस्ताव किया कि
शास्त्रार्थमें जो पराजित हो वह मार डाला जावे । किन्तु धर्मकीर्तिने जो कुमारिलकी