न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
८. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२७
८. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२७
न; गत्यभावात् ॥ ८ ॥
प्राप्तानोन्द्रियाण्यन्तःकरणेनेति प्राप्त्यर्थस्य गमनस्याभावः तत्र क्रमवृत्ति-
त्वाभावादयुगपद् ग्रहणानुपपत्तिरिति । गत्यभावाच्च प्रतिषिद्धं विभुनोऽन्तः-
करणस्यायुगपद्ग्रहणं न लिङ्गान्तरेणानुमीयते इति । यथा चक्षुषो गतिः प्रति-
षिद्धा सन्निकृष्टविप्रकृष्टयोस्तुल्यकालग्रहणात् पाणिचन्द्रमसोर्व्यवधानेन प्रतीघाते
सानुमीयत इति ।
सोऽयं नान्तःकरणे विवादः, न तस्य नित्यत्वे । सिद्धं हि मनोऽन्तःकरणं
नित्यं चेति । क्व तर्हि विवादः ? तस्य विभुत्वे । तच्च प्रमाणतोऽनुपलब्धेः प्रति-
षिद्धमिति ।
एकं चान्तःकरणम्, नाना चैता ज्ञानात्मिका वृत्तयः—चक्षुर्विज्ञानं घ्राण-
विज्ञानं रूपविज्ञानं गन्धविज्ञानम् । एतच्च वृत्तिवृत्तिमतोरेकत्वेऽनुपपन्नमिति ।
पुरुषो जानीते नान्तःकरणमिति-एतेन विषयान्तरव्यासङ्गः प्रत्युक्तः १। विषया-
न्तरग्रहणलक्षणो विषयान्तरव्यासङ्गः पुरुषस्य, नान्तःकरणस्येति । क्वचिदिन्द्रि-
गति न होने से नहीं (बनेगा) ॥ ८ ॥
‘इन्द्रिय अन्तःकरण से सम्बद्ध होती हैं’—यह सम्बन्धानुकूलव्यापारार्थक गमन मन
को विभु मानने पर उसमें नहीं बनेगा । तथा उसे विभु मानने पर, उसके क्रमवृत्ति न
होने से युगपज्ज्ञान होने लगेगा । यों, गत्यभाव से प्रतिसिद्ध मनःसाधक युगपज्ज्ञानानुत्पाद
हेतु का लिङ्गान्तर से अनुमान नहीं हो सकता । एक ही समय में दूर एवं समीप में
वर्तमान वस्तु का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, पर मध्य में हाथ का व्यवधान होने पर प्रती-
घात हो जाने से चन्द्रपर्यन्त से चक्षु की गति अवरुद्ध होने का अनुमान होता है ।
यह विवाद अन्तःकरण की सत्ता पर, या उसके नित्यत्व पर नहीं है, मन का अन्तः
करणत्व तथा नित्यत्व तो सिद्ध ही है । फिर विवाद किस बात पर है ? उसके विभुत्व
मानने पर । उस (विभुत्व) के बारे में कोई प्रमाण न मिलने से वह निरस्त होता है ।
साङ्ख्यसम्मत वृत्ति-वृत्तिमान् का एकत्वसिद्धान्त यों भी अनुपपन्न है—अन्तःकरण
एक है और चक्षुर्विज्ञान, घ्राणविज्ञान, रूपविज्ञान तथा गन्धविज्ञान आदि वृत्तियाँ अनेक
हैं; तब यह भेद वृत्ति तथा वृत्तिमान् के अभेद में कैसे होगा ! यह तो ठीक है कि पुरुष
ज्ञाता है न कि अन्तःकरण, अतः विषयान्तर-व्यासङ्ग वाला हमारा उत्तर खण्डित हो सकता
है; क्योंकि ‘विषयान्तरव्यासङ्ग’ से तात्पर्य है—विषयान्तरज्ञान, वह पुरुष को ही बन सकता
१. पुरुषो जानीते नान्तःकरणमिति हेतुना । अन्तःकरणस्येति शेषः । व्यासक्तो ऽ
स भवति यो जानीते, नान्तःकरणं जानीतेऽतो न व्यासक्तम् ।
२२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
येण सन्निधिः, क्वचिदसन्निधिः—इत्ययं तु व्यासङ्गोऽनुज्ञायते मनस इति ॥ ८ ॥
एकमन्तःकरणं नाना वृत्तय इति सत्यभेदे वृत्तेरिदमुच्यते—
स्फटिकान्यत्वाभिमानवत् तदन्यत्वाभिमानः ॥ ९ ॥
तस्यां वृत्तौ नानात्वाभिमानो यथा द्रव्यान्तरोपहिते स्फटिकद्रव्ये अन्यत्वा-
भिमानः—नीलो लोहित इति, एवं विषयान्तरोपधानादिति ?
न; हेत्वभावात् । स्फटिकान्यत्वाभिमानवदयं ज्ञानेषु नानात्वाभिमानो गौणो
न पुनर्गन्धाद्यन्यत्वाभिमानवदिति-हेतुर्नास्ति, हेत्वभावादनुपपन्न इति । समानो
हेत्वभाव इति चेत् ? न; ज्ञानानां क्रमेणोपजनापायदर्शनात् । क्रमेण हीन्द्रियार्थेषु
ज्ञानान्युपजायन्ते चापयन्ति चेति दृश्यते । तस्माद् गन्धाद्यन्यत्वाभिमानवदयं
ज्ञानेषु नानात्वाभिमान इति ॥ ९ ॥
क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् [ १०-१७ ]
'स्फटिकान्यत्वाभिमानवद्' इत्येतदमृष्यमाणः क्षणिकवाद्याह—
है, अन्तःकरण को नहीं; परन्तु कहीं इन्द्रिय के साथ सन्निधि तथा कहीं असन्निधि—
इस तरह का विषयान्तर-व्यासङ्ग तो मन में भी अनुज्ञात है ही ॥ ८ ॥
शंका—वस्तुतः अभेद होने पर भी 'अन्तःकरण एक है, वृत्तियाँ नाना हैं'—यह
इसलिए कह दिया जाता है कि—
स्फटिकान्यत्व के आरोप की तरह उस वृत्ति में अन्यत्व का आरोप है ? ॥ ९ ॥
उस वृत्ति में नानात्व का आरोप कर लिया जाता है। जैसे नील-रक्तादि पुष्पों के
पास रखे हुए एक ही स्फटिक द्रव्य में नानात्व का आरोप ( भ्रम ) होता है कि यह
नील स्फटिक है, यह रक्त स्फटिक है; उसी तरह विषयान्तर के उपधान ( अनुग्रह ) से
वृत्ति में नानात्व का आरोप है ?
उत्तर—उक्त दृष्टान्त में कोई हेतु न होने से ऐसा मानना उचित नहीं। 'स्फटि-
कान्यत्वाभिमान की तरह यह ज्ञानों में नानात्वाभिमान गौण ( आहार्यारोप ) है,
गन्धाद्यन्यत्वाभिमान की तरह वास्तविक नहीं'—इस अनुमान में हेतु नहीं है। अतः
हेतु न दिखाया जाने से यह अनुमान बनेगा ही नहीं।
हेत्वभाव तो आपके पक्ष में भी है ? नहीं; क्योंकि अस्मदभिमत में ज्ञानों का क्रमशः
उत्पत्तिविनाश लोक में प्रत्यक्ष है। इन्द्रियार्थ के सन्निकर्ष में क्रमशः ज्ञान उत्पन्न तथा
विनष्ट होते रहते हैं—यह लोक में वारंवार देखते हैं। अतः यह स्पष्ट है कि वृत्ति
में नानात्वारोप गन्धाद्यन्यत्वाभिमान की तरह मुख्य ही है, आहार्यारोप नहीं ॥ ९ ॥
[ अब सूत्रकार बौद्धमत से सांख्यमत में दूषण दिखाते हुए बौद्धों के प्रसिद्ध क्षणिक-
वाद के खण्डन का उपक्रम कर रहे हैं— ] सूत्रोक्त 'स्फटिकान्यत्वाभिमानवत्' इस हेतु
को असह्य करते हुए क्षणिकविज्ञानवादी ( बौद्ध ) कहते हैं—