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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

६८. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६९

६८. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६९
भूतानि न शरीरमुत्पादयन्तीत्युपपन्नः शरीरवियोगः' इति, एवं चेन्मन्यसे ?
पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे। पुनः शरीरोत्पत्तिः प्रसज्यते इति। या चानुत्पन्ने शरीरे
दर्शनानुत्पत्तिरदर्शनाभिमता, या चापवर्गे शरीरनिवृत्तौ दर्शनानुत्पत्तिरदर्शन-
भूता--नैतयोर्दर्शनयोः क्वचिद्विशेष इत्यदर्शनस्यानिवृत्तेरपवर्गे पुनः शरीरो-
त्पत्तिप्रसङ्ग इति ।
चरितार्थता विशेष इति चेत् ?
न; करणाकरणयोरारम्भदर्शनात् १। चरितार्थानि भूतानि दर्शनावसानान्न
शरीरान्तरमारभन्ते इत्ययं विशेषः-एवं चेदुच्यते ? न; करणाकरणयोरारम्भ-
दर्शनात्। चरितार्थानां भूतानां विषयोपलब्धिकरणान् पुनः पुनः शरीरारम्भो
दृश्यते, प्रकृतिपुरुषयोर्नानात्वदर्शनस्याकरणान्निरर्थकः शरीरारम्भः पुनर्दृश्यते।
तस्मादकर्मनिमित्तायां भूतसृष्टौ न दर्शनार्था शरीरोत्पत्तिर्युक्ता, युक्ता तु कर्म-
निमित्ते सर्गे दर्शनार्था शरीरोत्पत्तिः।
नानात्व, उसके लिये यह शरीरोत्पत्ति होती है। इस उत्पत्ति के हो जाने पर भूत अपना
कार्य कर चुके-अतः पुनः शरीरोत्पत्ति न करेंगे, यों शरीरवियोग हमारे मत में भी
उपपन्न है ?
उत्तर-यदि ऐसा मानते हो तो अपवर्ग के बाद भी उस दृश्य के लिए शरीरोत्पाद
होना कौन रोकेगा ! अतः पुनः शरीरोत्पत्ति होने लगेगी; क्योंकि आपकी दोनों बातों में
शरीरोत्पत्ति के पूर्व दर्शनाभावात्मक अदर्शन और शरीरध्वंस (अपवर्ग) में होनेवाला
दर्शनाभावात्मक अदर्शन-दोनों में अन्तर क्या हुआ ! अतः उक्त अदर्शन की निवृत्ति
न होने से अपवर्गानन्तर भी शरीरोत्पादप्रसङ्ग हो सकता है।
शङ्का-उक्त प्रथम अदर्शन में प्रकृतिपुरुष का नानात्वादृश्यत्व करना ही प्रयोजन है,
वह निवृत्त कर देने से शरीरोत्पत्ति का प्रयोजन समाप्त हो गया, अब अपवर्ग के
बाद उसके निष्प्रयोजन होने से वह शरीरोत्पत्ति नहीं करेगा ?
आप करण तथा अकरण का आरम्भ देखा जाने से ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि
उक्त कार्य कर देने से चरितार्थ होने पर भी भूतों द्वारा पुनः पुनः विषयोपलब्धिनिमित्त-
वशात् शरीरारम्भ देखा जाता है; दूसरे, प्रथम प्रकार का अदर्शन तो प्रथम शरीरोत्पत्ति
से ही निवृत्त हो गया, अब द्वितीय प्रकार के दर्शनहेतु में पुनः पुनः शरीरोत्पत्ति होगी,
तब भी उक्त नानात्व के दर्शन के न होने पर भी पुनः पुनः शरीरारम्भ होता है। तो
'अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति' सिद्धान्त में दर्शन के लिये भूतसृष्टि का मानना अनुपपन्न
ही है। 'कर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति' सिद्धान्त में दर्शनमात्र के लिए हुई भूतसृष्टि उपपन्न
हो सकती है। अतः यही सिद्धान्त उचित है।
१. न्यायसूचीनिबन्धे न परिगणितम्, वृत्तिकृता च न व्याख्यातमतो नैतत्सूत्रमपि तु
भाष्यमेव ।

२७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
कर्मविपाकसंवेदनं दर्शनमिति । तददृष्टकारितमिति कस्यचिद्दर्शनम्-अदृष्टं
नाम परमाणूनां गुणविशेषः क्रियाहेतुः, तेन प्रेरिताः परमाणवः सम्मूर्च्छिताः
शरीरमुत्पादयन्तीति ? तत्र मनः समाविशति स्वगुणेनादृष्टेन प्रेरितम् । समनस्के
शरीरे द्रष्टुरुपलब्धिर्भवतीति ?
एतस्मिन् वै दर्शने गुणानुच्छेदात् पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे । अपवर्गे शरीरो-
त्पत्तिः परमाणुगुणस्यादृष्टस्यानुच्छेदत्वादिति ॥ ६८ ॥
मनःकर्मनिमित्तत्वाच्च संयोगानुच्छेदः ॥ ६९ ॥
मनोगुणेनादृष्टेन समावेशिते मनसि संयोगव्युच्छेदो न स्यात्, तत्र
किंकृतं शरीरादपसर्पणं मनस इति ! कर्माशयक्षये तु कर्माशयान्तराद्विपच्य-
मानादपसर्पणोपपत्तिरिति । अदृष्टादेवापसर्पणमिति चेत्-योऽदृष्टः शरीरोप-
सर्पणहेतुः, स एवापसर्पणहेतुरपीति ? न; एकस्य जीवनप्रायणहेतुत्वानुपपत्तेः ।
एवं च सति एकमदृष्टं जीवनप्रायणयोर्हेतुरिति प्राप्तम्, नैतदुपपद्यते ॥ ६९ ॥
नित्यत्वप्रसङ्गश्च प्रायणानुपपत्तेः ॥ ७० ॥
विपाकसंवेदनात् कर्माशयक्षये शरीरपातः प्रायणम्, कर्माशयान्तराच्च
जैनमतखण्डन—
१. कुछ वादी कर्मविपाक संवेदन ( कर्मफलभोग ) को ( अदृष्टजन्य ) मानते हैं ।
वे उस 'अदृष्टकारित' का यो प्रतिपादन करते हैं—परमाणुओं का गुणविशेष 'अदृष्ट'
है, वह क्रियाकारण है । उस कारण से इकट्ठे हुए पार्थिवादि परमाणु शरीर को उत्पन्न
करते हैं, अदृष्ट स्वगुण से प्रेरित होकर मन उस शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । उक्त
सांख्याभिमत द्रष्टा के इस मनःसहित शरीर से दृश्योपलब्धि होती है ?
इस मत में भी उक्त अदृष्ट गुणविशेष का उच्छेद न होने से, अपवर्गानन्तर भी
शरीरोत्पाद हो ही सकता है, अतः यह मत भी सदोष है ॥ ६८ ॥
२. इसी मत में दूषणान्तर दिखाते हैं—
मनःकर्मनिमित्त मानने पर उसका संयोगोच्छेद नहीं बनेगा ॥ ६९ ॥
अदृष्ट स्वगुण से प्रेरित मन जब एक बार शरीर में प्रविष्ट हो गया तो फिर वह
उस शरीर से वियुक्त क्यों होगा, जबकि वैसा कोई कारण न हो ! 'कर्मनिमित्तक उत्पत्ति'
सिद्धान्त में कर्म के क्षीण होने से वह मन उस शरीर से वियुक्त हो सकता है । यदि
यह कहें कि उसी स्वगुण अदृष्ट से, जो संयोग कराता हैं, वियोग भी हो जायेगा ? तो
यह नहीं कह सकते; क्योंकि एक ही कारण जीवन तथा मृत्यु का कारक नहीं बना
करता, जबकि आप उस एक ही कारण को जीवन तथा मृत्यु का कारक बता रहे हैं !
अतः यह मत भी समीचीन नहीं ॥ ६९ ॥
विनाश ( मृत्यु ) न होने से शरीर में नित्यत्व-प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ ७० ॥
विपाक ( कर्मफल ) के भोग से उस कर्माशय के क्षीण होने पर शरीरनाश (मृत्यु)
हो जाता है, तथा अन्य कर्माशय होने पर 'जन्म' होता है । यदि कर्मनिरपेक्ष भूतमात्र