न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११
६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११
कामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, इहैव समवलीयन्ते । ब्रह्मौव सन्
ब्रह्माप्येति' इति ।
तत्र यदुक्तम्—'ऋणानुबन्धादपवर्गाभावः' इत्येतदयुक्तमिति । 'ये चत्वारः
पथयो देवयानाः' इति च चातुराश्रम्यश्रुतेरेकाश्रम्यानुपपत्तिः ॥ ६० ॥
फलार्थिनश्चेदं ब्राह्मणम्—'जरामर्य्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ
च' इति । कथम् ?
समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ॥ ६१ ॥
'प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य तस्यां सार्ववेदसं हुत्वा आत्मन्यग्नीन् समारोप्य
ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' इति श्रूयते, तेन विजानीमः—प्रजावित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्थि-
तस्य निवृत्ते फलार्थित्वे समारोपणं विधीयते इति ।
एवं च ब्राह्मणानि—"सोऽन्यद् व्रतमुपाकरिष्यमाणो याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमिति
होवाच—प्रव्रजिष्यन् वा अरे अहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्या
सहान्तं करवाणीति । अथाप्युक्तानुशासनासि मैत्रेयि एतावदरे खल्वमृतत्वमिति
होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति" ॥ ६१ ॥
वासनारहित हो आत्मज्ञान चाहता हुआ पूर्णसङ्कल्प हो जाता है, उसके प्राण फिर इधर-
उधर नहीं भटकते । वह शाश्वत हो जाता है, ब्रह्मरूप हो ब्रह्म में लीन हो जाता है ।'
इतनी ऋचाओं तथा ब्राह्मणों का प्रमाण मिलने के बाद भी आपका 'ऋणानुबन्ध
से अपवर्ग नहीं होता'— यह कहना अयुक्तियुक्त ही है ।
अपि च—तैत्तिरीयसंहिता (५. ७. २. ३) में तो 'ये चार आश्रम देवलोक में जाने
के मार्ग हैं'—यह कह कर स्पष्ट ही चार आश्रम स्वीकार कर लिए गये हैं ॥ ६० ॥
उक्त 'वार्धक्यपर्यन्त यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास यज्ञ हैं'—यह शतपथब्राह्मण-
वाक्य फलार्थी को लेकर कहा गया है, न कि यह प्रव्रज्या की मर्यादा का बोधक है । कैसे ?
(आगे चल कर) अग्नियों का आत्मा में समारोपण बताने से प्रव्रज्या का प्रतिषेध नहीं
बनता ॥ ६१ ॥
'प्राजापत्य इष्टि का निरूपण करके उसमें अपना सर्वस्व दानकर उन अग्नियों को
आत्मा में रखकर ब्राह्मण प्रव्रज्या ग्रहण कर लें'—ऐसा श्रुतिवाक्य हैं। इससे हम अनु-
मान करते हैं कि यह वाक्य पुत्रैषणा, धनैषणा, तथा लोकैषणाओं को त्यागकर गार्हस्थ्य
से व्युत्थितचित्त पुरुष की फल-कामनायें निवृत्त हो जाने पर उनमें अग्नि का समारोपण
विहित करता है ।
गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त की प्रव्रज्या विहित है, तभी यह (बृहदारण्यक का)
ब्राह्मणवाक्य भी उपपन्न हो पाता है—"वे याज्ञवल्क्य दूसरा व्रत करना चाहते हुए
मैत्रेयी से बोले—'या प्रव्रज्या लेकर मैं इस स्थान (जन्ममरणरूपी संसार) से कात्यायनी
के साथ अपना छुटकारा कर लूंगा । मैत्रेयि ! तुम यह अच्छी तरह समझ चुकी हो कि
वही पद (अपवर्ग) अमृतत्वयुक्त है'—ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य प्रव्रजित हो गये" ॥६१॥
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. अ०
पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभावः ॥ ६२ ॥
जरामर्यं च कर्मण्यविशेषेण कल्प्यमाने सर्वस्य पात्रचयान्तानि कर्माणीति
प्रसज्यते, तत्रैषणाव्युत्थानं न श्रूयेत—'एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे ब्राह्मणा अनूचाना
विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति !
ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं
चरन्तीति' । एषणाभ्यश्च व्युत्थितस्य पात्रचयान्तानि कर्माणि नोपपद्यन्ते इति ।
नाविशेषेण कर्तुः प्रयोजकं फलं भवतीति ।
चातुराश्रम्यविधानाच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्रेष्वैकाश्रम्यानुपपत्तिः । तद-
प्रमाणमिति चेद् ? न; प्रमाणेन प्रामाण्याभ्यनुज्ञानात् । प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेति-
हासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते—'ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एतदिति-
हासपुराणमभ्यवदन्नितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद इति' । तस्मादयुक्तमेत-
दप्रामाण्यमिति । अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाल्लोको-
'उक्त वाक्य फलार्थी के लिए ही विहित है तथा चतुर्थ आश्रम भी है'—इसमें एक
और युक्ति देते हैं—
पात्रचयान्तानुपपत्ति से भी फलाभाव सिद्ध होता है ॥ ६२ ॥
यदि पुरुष प्रव्रज्या न लेकर गृहस्थाचरण करता हुआ ही मर जाता है तो उसके
अग्निहोत्र के पात्र भी उसी के साथ जला दिये जाते हैं—यह विधि यदि साधारणतः सब
पुरुषों में कल्पित की जायेगी तो सभी में उक्त पात्रचयदाह कल्पित करना पड़ेगा । तब
पीछे कही एषणात्रय से व्युत्थानवाली बात कैसे बनेगी ! जैसे कि बृहदारण्यक में कहा
है—"पहले के विद्वान् बुद्धिमान् ब्राह्मण पुत्र की कामना नहीं करते थे, उनका कहना था
कि इन पुत्रपौत्रादिकों का हम क्या करेंगे जिनसे न यह लोक सुधरता है न परलोक !
वे ब्राह्मण तीनों ही एषणाओं से अपने चित्त को हटाकर प्रव्रज्या ले भिक्षाचरण करते
थे ।" यों इन प्रमाणों से जब ऐषणाओं से व्युत्थान होने पर परिव्राट् को पात्रचयनान्त
कर्म उपपन्न ही नहीं होते तो उनका परिव्राट् के साथ दाह कैसे बनेगा ! कर्त्ता को
सामान्यतया लेने के लिए प्रयोजक फल नहीं हो सकता ।
इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र में भी चार आश्रमों का ही विधान होने से एकाश्रम
की बात कहीं उपपन्न नहीं होती । वे तो सब अप्रमाण हैं ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि
प्रमाण ( श्रुति ) से उन ( इतिहासादि ) का प्रामाण्य सिद्ध होता है । ब्राह्मण-प्रमाण से
इतिहास-प्रामाण्य यों सिद्ध होता है—'उन अथर्वा, आङ्गिरस आदि ऋषियों ने इस इति-
हास-पुराण का आख्यान किया है अतः यों मानना चाहिए कि इतिहास पुराण भी वेदों
में एक ( पञ्चम ) वेद है ।' अतः इतिहास पुराणादि को अप्रामाणिक कहना अयुक्त
है । धर्मशास्त्र को अप्रामाणिक मानने पर प्राणियों के व्यवहार का कोई आधार न होने
से समग्र लोकों का उच्छेद-प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । दूसरे, जो ऋषि उन श्रुतियों के
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri