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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

४४. सू० ] फलपरीक्षाप्रकरणम् २९७

४४. सू० ] फलपरीक्षाप्रकरणम् २९७
न; कारणावयवभावात् ? ॥ ४२ ॥
न संख्येकान्तानामसिद्धिः; कस्मात् ? कारणस्यावयवभावात् । अवयवः
कश्चित् साधनभूत इत्यन्वयतिरेकः । एवं द्वैतादीनामपीति ॥ ४२ ॥
निरवयवत्वादहेतुः ॥ ४३ ॥
कारणस्यावयवभावादित्यहेतुः । कस्मात् ? सर्वमेकमित्यनपवर्गेण प्रतिज्ञाय
कस्यचिदेकत्वमुच्यते, तत्र व्यपवृक्तोऽवयवः साधनभूतो नोपपद्यते । एवं द्वैता-
द्विष्वपीति ।
ते खल्विमे संख्येकान्ताः यदि विशेषकारितस्यार्थभेदविस्तारस्य प्रत्याख्यानेन
वर्त्तन्ते ? प्रत्यक्षानुमानागमविरोधान्मिथ्यावादा भवन्ति । अथाभ्यनुज्ञानेन वर्त्तन्ते ?
समानधर्मकारितोऽर्थसङ्ग्रहो विशेषकारितश्चार्थभेद इति एवमेकान्तत्वं जहतोति ।
ते खल्वेते तत्त्वज्ञानप्रविवेकार्थमेकान्ताः परीक्षिता इति ॥ ४३ ॥
फलपरीक्षाप्रकरणम् [ ४४-५४ ]
प्रेत्यभावान्तरं फलम् । तस्मिन्—
कारण के अवयवभाव से संख्येकान्तसिद्धि बन जायेगी ? ॥ ४२ ॥
संख्येकान्तों की असिद्धि नहीं है; क्योंकि वहाँ कारण का अवयवभाव अर्थात्
कार्यावयवरूपत्व है। साध्य का अवयव किसी का साधन होगा ही, अतः साध्यसाधन
का अभेद बन जायेगा । इसी रीति से द्वैतादि संख्येकान्तों में भी समाधान कर लेना
चाहिये ? ॥ ४२ ॥
निरवयव होने से उक्त हेतु नहीं बनेगा ॥ ४३ ॥
‘कारण के अवयवभाव से’—यह हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि ‘सब कुछ एक हैं’
यों सभी की अव्यावृत्तरूप प्रतिज्ञा कर के किसी का एकत्व कहा जा रहा है। इस प्रतिज्ञा-
वाक्य में अव्यावृत्त अवयव प्रमाणरूप में उपस्थित नहीं हो सकता; क्योंकि आपने ‘सब
कुछ एक हैं’ कह कर किसी को छोड़ा ही नहीं, जो पृथक् रह कर उक्त प्रतिज्ञा-साधन-
वाक्य में प्रमाण रूप से उपस्थित हो सके । इसी तरह द्वैतादि के विषय में भी प्रतिषेध
समझ लें ।
ये संख्येकान्तवाद यदि विशेष धर्म द्वारा कराये गये अर्थविस्तार को न स्वीकार कर
स्थापित किये जाते हैं तो प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम प्रमाणों का विरोध होने से ‘मिथ्या
वाद’ ही कहलायेंगे । यदि स्वीकार करके स्थापित किये जाते हैं तो प्रतिज्ञाहानि होगी;
क्योंकि अर्थसंग्रह समानधर्म द्वारा कराया जाता है, तथा अर्थभेद विशेषधर्म द्वारा; यों
भेद के अनन्त होने से वे धर्म-एकान्त को छोड़ बैठते हैं।
इन एकान्तवादों की परीक्षा तत्त्वज्ञान में प्रविवेक के लिये की गयी है । ( यह
परीक्षा अनुपद परीक्षित ‘प्रेत्यभाव’ में भी सहायक होगी ॥ ४३ ॥
उद्देशसूत्र ( १.१.९ ) में कथित क्रमानुसार अब प्रेत्यभाव के बाद फल पर विचार
किया जा रहा है । उसमें

२९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०
सद्यः कालान्तरे च फलनिष्पत्तेः संशयः ॥ ४४ ॥
पचति, दोग्धीति सद्यः फलमोदनपयसी । कर्षति, वपतीति कालान्तरे फलं
शस्याधिगम इति । अस्ति चेयं क्रिया 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति, एतस्याः
फले संशयः१ ॥ ४४ ॥
न सद्यः; कालान्तरोपभोग्यत्वात्२ ॥ ४५ ॥
स्वर्गः फलं श्रूयते, तच्च भिन्नेऽस्मिन्देहे भेदादुत्पद्यते इति न सद्यः ग्रामादि-
कामानामारम्भफलमिति ॥ ४५ ॥
कालान्तरेणानिष्पत्तिर्हेतुविनाशात् ? ॥ ४६ ॥
ध्वस्तायां प्रवृत्तौ प्रवृत्तेः फलं न कारणमन्तरेणोत्पत्तुमर्हति, न खलु वै
विनष्टात् कारणात्किञ्चिदुत्पद्यते इति ॥ ४६ ॥
प्राङ् निष्पत्तेर्वृक्षफलवत् तत्स्यात् ॥ ४७ ॥
यथा फलार्थिना वृक्षमूले सेकादि परिकर्म क्रियते, तस्मिंश्च प्रध्वस्ते पृथिवी-
तत्काल तथा कालान्तर में फलनिष्पत्ति से संशय होता है ॥ ४४ ॥
'पकाता है' 'दुहता है' इन क्रियाओं के भोजन तथा दूध सद्यः फल हैं । 'जोतता है'
'बोता है' इन क्रियाओं का धान्यप्राप्तिरूप फल कालान्तर में मिलता है । एक यह भी
क्रिया है—'स्वर्गेच्छु पुरुष अग्निहोत्र करे', इस क्रिया में संशय होता है कि यह सद्यःफल-
प्रद है या कालान्तर में फलप्रद है ॥ ४४ ॥
स्वर्ग के कालान्तरोपभोग्य होने से उक्त क्रिया सद्यःफलप्रद नहीं है ॥ ४५ ॥
उस अग्निहोत्र क्रिया का आप्त पुरुषों द्वारा स्वर्गफल सुना जाता है । वह फल
इस शरीर के नष्ट होने पर दूसरे शरीर में बन सकता है, अतः यह क्रिया सद्यःफलप्रद
नहीं है, जैसे—ग्रामाद्युपार्जनरूप फल राजा की सेवा के तत्काल बाद इस शरीर में ही
मिल जाता है ॥ ४५ ॥
हेतु के विनष्ट हो जाने से कालान्तर में भी उक्त फलनिष्पत्ति नहीं होगी ? ॥४६॥
कर्मसमाप्ति के बाद कर्म के विनष्ट हो जाने पर तत्कार्यभूत फल कारण के विना
उत्पन्न नहीं हो सकता; क्योंकि कारण के विना कुछ भी नहीं हुआ करता ? ॥ ४६ ॥
वृक्षफल की तरह स्वर्गादिनिष्पत्ति से पूर्व वह क्रिया फल का साधन तो होगी
ही ॥ ४७ ॥
जैसे फल चाहनेवाला पुरुष वृक्ष की जड़ में जलसिञ्चन-आदि क्रिया करता
१. अत्रोद्यनाचार्येण भाष्याक्तावस्वरसः प्रदर्शित इति परिशुद्धौ द्रष्टव्यः ।
२. न्यायसूचीनिबन्धेष्वेतत्सूत्रमपीदं सूत्रं वार्त्तिकस्वारस्येन स्वीकृतम् ।