न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
४०. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०१
४०. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०१
व्यभिचरति, नाभौतिकं प्रतिघातधर्मकं दृष्टमिति । अप्रतिघातस्तु व्यभिचारी;
भौतिकाभौतिकयोः समानत्वादिति ।
यदपि मन्यते—प्रतिघाताद् भौतिकानीन्द्रियाणि, अप्रतिघातादभौतिकानीति
प्राप्तम् ? दृष्टश्चाप्रतिघातः काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ? तन्न युक्तम्;
कस्मात् ? यस्माद्भौतिकमपि न प्रतिहन्यते, काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितप्रका-
शात् प्रदीपरश्मीनाम्, स्थाल्यादिषु पाचकस्य तेजसोऽप्रतिघातः ॥ ३९ ॥
उपपद्यते चानुपलब्धिः, कारणभेदात् ।
मध्यन्दिनोल्काप्रकाशानुपलब्धिवत् तदनुपलब्धिः ॥ ४० ॥
यथा 'अनेकद्रव्येण समवायाद्रूपविशेषाच्चोपलब्धिः' (३.१.३८) इति सत्यु-
पलब्धिकारणे मध्यन्दिनोल्काप्रकाशो नोपलभ्यते आदित्यप्रकाशेनाभिभूतः, एवं
महदनेकद्रव्यवत्ताद् रूपविशेषाच्चोपलब्धिरिति सत्युपलब्धिकारणे चाक्षुषो
रश्मिर्नोपलभ्यते निमित्तान्तरतः। तच्च व्याख्यातम्—अनुद्भूतरूपस्पर्शस्य
द्रव्यस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिरिति अत्यन्तानुपलब्धिश्चाभावकारणम् ॥ ४० ॥
भौतिक धर्म है, तथा वह भूतों से व्यभिचरित नहीं होता । अर्थात् ऐसा संयोग कहीं भी
अभौतिक नहीं देखा गया । हाँ, अप्रतिघात ( अतादृश संयोग ) अवश्य व्यभिचारी हो
सकता हैं; क्योंकि वह भौतिक, अभौतिक—दोनों में ही समानतया घट सकता है ।
जो यह मानता है—'प्रतिघात से इन्द्रियाँ भौतिक सिद्ध होती हैं, अप्रतिघात से
भी हो सकती है; क्योंकि काचाभ्रपटलस्फटिकादि में अप्रतिघात देखा जाने से इन्द्रियों में
भी अप्रतिघात बन सकता है, तब तो इन्द्रियों को अभौतिक भी मानना पड़ेगा ?' यह
अयुक्तियुक्त है; क्योंकि कभी-कभी भौतिक में प्रतिघात नहीं भी होता, जैसे काचाभ्र-
पटलस्फटिकादि के मध्य से भी प्रदीपरश्मियों का प्रकाश निकल ही जाता है । स्थाली
आदि में भी विक्लेित्तिजनक तेज ( अग्नि ) का अप्रतिघात देखा जाता है ॥ ३९ ॥
हां, कारणभेद से वह अनुपलब्धि भी उपपन्न होती है ।
मध्याह्न में ताराप्रकाश की अनुपलब्धि की तरह उसकी अनुपलब्धि बन सकती
है ॥ ४० ॥
जैसे "अनेक द्रव्यों से समवायसमवेतत्व सम्बन्ध और 'उद्भूत' नामक रूपविशेष
से द्रव्योपलब्धि होती है" ( ३.१.३८ )—इस नियम से उपलब्धिकारण होने पर भी
मध्य दिन में ताराओं का प्रकाश नहीं दिखायी पड़ता; क्योंकि वह आदित्यप्रकाश से
अभिभूत रहता है, उसी प्रकार 'महत्त्ववान्, अनेकद्रव्यवान् होने से रूपविशेष से उप-
लब्धि होती है' (वै० सू० ४.१.६) इस नियम से उपलब्धिकारण होने पर भी चाक्षुष-
की उपलब्धि रश्मि निमित्तान्तर से नहीं हो पाती । यह हम पीछे कह ही चुके हैं कि
अनुद्भूतरूपस्पर्शवान् द्रव्य की प्रत्यक्षतः उपलब्धि नहीं होती। अत्यन्तानुपलब्धि ('यदि
स्यात् तर्हि उपलभ्येत' ऐसी योग्यानुपलब्धि) तदभाव का कारण बन सकती है ॥ ४० ॥
२०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
यो हि ब्रवीति—'लोष्टप्रकाशो मध्यन्दिने आदित्यप्रकाशाभिभावान्नोलभ्यते'
इति, तस्यैतत् स्यात्—
न; रात्रावप्यनुपलब्धेः ॥ ४१ ॥
अप्यनुमानतोऽनुपलब्धेरिति । एवमत्यन्तानुपलब्धेर्लोष्टप्रकाशो नास्ति, न
त्वेवं चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ४१ ॥
उपपन्नरूपा चेयम्—
बाह्यप्रकाशानुग्रहाद् विषयोपलब्धेरनभिव्यक्तितोऽनुपलब्धिः ॥ ४२ ॥
बाह्ये न प्रकाशेनानुगृहीतं चक्षुर्विषयग्राहकं तद्भावेऽनुपलब्धिः । सति च
प्रकाशानुग्रहे शीतस्पर्शोपलब्धौ च सत्यां तदाश्रयस्य द्रव्यस्य चक्षुषाऽग्रहणम्,
रूपस्यानुद्भूतत्वात् । सेयं रूपानभिव्यक्तितो रूपाश्रयस्य द्रव्यस्यानुपलब्धिर्दृष्टा ।
तत्र यदुक्तम्—'तदनुपलब्धेरहेतुः' (३.१.३५) इत्येतदयुक्तम् ॥ ४२ ॥
कस्मात् पुनरभिभवोऽनुपलब्धिकारणं चाक्षुषस्य रश्मेर्नोच्यत इति ?
अभिव्यक्तौ चाभिभवात् ॥ ४३ ॥
बाह्यप्रकाशानुग्रहनिरपेक्षतायां चेति चार्थः । यद्रूपमभिव्यक्तमुद्भूतं बाह्य-
जो यह कहें—'ढेले का प्रकाश भी मध्याह्न में आदित्य के प्रकाश से अभिभूत होने
के कारण उपलब्ध नहीं होता', उनको यह उत्तर देना चाहिये—
रात्रि में भी उसकी उपलब्धि न होने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ४१ ॥
उस ढेले के प्रकाश की अनुमान से भी उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार उसकी
अत्यन्तानुपलब्धि से 'ढेले में प्रभा नहीं होती'—यही सिद्ध होता है । ऐसी अत्यन्तानुपलब्धि
अनुमान से चक्षूरश्मि में सिद्ध नहीं की जा सकती ॥ ४१
यह चक्षूरश्मि में अनुपलब्धि उपपन्नरूपवाली भी है—
बाह्य प्रकाश के सहारे रूपोपलब्धि होने से उस रूप की अनभिव्यक्ति से भी
अनुपलब्धि हो सकती है ॥ ४२ ॥
चक्षु बाह्य प्रकाश का सहारा लेकर ही विषय को गृहीत करता है उस के रहते भी
रूप की उपलब्धि नहीं हो पाती । अर्थात् प्रकाश का सहारा मिलने पर, तथा शीतस्पर्श
की उपलब्धि होने पर भी रूपानभिव्यक्ति से रूपाश्रित द्रव्य ( तारागण आदि ) की
अनुपलब्धि देखी जाती है; क्योंकि वह रूप उद्भूत नहीं है । उसके लिये आपका 'उसके
न मिलने से वह नहीं है' ऐसा कहना अयुक्तियुक्त है ॥ ४२ ॥
तो यही क्यों नहीं कहते कि चाक्षुषरश्मि की अनुपलब्धि में उसका अभिभव ही
कारण है ? नहीं; क्योंकि
अभिव्यक्ति में भी अभिभव देखा जाता है ॥ ४३ ॥
'बाह्यप्रकाश के सहारे की अपेक्षा न रखने की अवस्था में' सूत्रस्थ 'च' शब्द का अर्थ
है । जिसका रूप अभिव्यक्त तथा उद्भूत होकर बाह्य प्रकाश के सहारे की जरूरत नहीं