न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३१. सू० ] अनुपलब्धिसमप्रकरणम् ३६१
३१. सू० ] अनुपलब्धिसमप्रकरणम् ३६१
आवरणाद्यनुपलब्धिर्नास्ति; अनुपलब्भादित्यहेतुः । कस्मात् ? अनुप-
लम्भात्मकत्वाद्वनुपलब्धेः । उपलम्भाभावमात्रत्वाद्वनुपलब्धेः । यदस्ति तदुप-
लब्धेर्विषयः, 'उपलब्ध्या तदस्ति' इति प्रतिज्ञायते । यन्नास्ति तदनुपलब्धेर्विषयः,
'अनुपलभ्यमानं नास्ति' इति प्रतिज्ञायते । सोऽयमावरणाद्यनुपलब्धेरनुपलम्भ
उपलब्ध्व्यभावेऽनुपलब्धौ स्वविषये प्रवर्त्तमानो न स्वं विषयं प्रतिषेधयति ।
अप्रतिषिद्धा चावरणाद्यनुपलब्धिर्हेतुत्वाय कल्पते । आवरणादीनि तु विद्यमान-
त्वादुपलब्धेर्विषयाः, तेषामुपलब्ध्या भवितव्यम् । यत्तानि नोपलभ्यन्ते तदुपलब्धेः
स्वविषयप्रतिपादिकाया अभावादनुपलम्भादनुपलब्धेर्विषयो गम्यते--न सन्त्या-
वरणादीनि शब्दस्याग्रहणकारणीति । अनुपलब्भादनुपलब्धिः सिद्धयति¹,
विषयः स तस्येति² ॥ ३० ॥
ज्ञानविकल्पानां च भावाभावसंवेदनादध्यात्मम् ॥ ३१ ॥
अहेतुरिति वर्त्तते । शरीरे शरीरिणां ज्ञानविकल्पानां भावाभावौ
'आवरणाद्यनुपलब्धि अनुपलब्भ होने से नहीं है'—यह अहेतु है; क्योंकि अनुपलब्धि
अनुपलब्भस्वरूप है । अर्थात् अनुपलब्धि उपलम्भाभावमात्र है । हम इतनी प्रतिज्ञा करते
हैं कि यहाँ जो उपलब्धि का विषय है 'उपलब्धि से वह हैं'; जो नहीं है वह अनुपलब्धि
का विषय है । 'अनुपलभ्यमान वह नहीं हैं' । अतः यह आवरणादि का अनुपलब्भ
उपलब्ध्ध्र्यभावरूप स्वविषय अनुपलब्धि में प्रवृत्त होता हुआ अपने विषय (अनुपलब्धि)
का प्रतिषेध नहीं कर । । यों आवरणाद्यनुपलब्धि अप्रतिषिद्ध होती हुई हेतु बन सकती
है । आवरणादि तो विद्यमान होने के कारण उपलब्धि के विषय हैं, न कि अनुपलब्धि
के । अतः उनकी उपलब्धि ही होनी चाहिए । जब वे उपलब्ध नहीं होते तब उनकी
अनुपलब्धि अभावव्यवस्थापिका बन जाती है, यों अनुपलब्धि नहीं; अपितु स्वविषय की
प्रतिपादक उपलब्धि का अभाव अर्थात् योग्यानुपलब्धि ही अभाव को बोधित करती है ।
तात्पर्य यह है कि स्वविषयप्रतिपादक उपलब्धि के अभाव से आवरणादि की उपलब्धि
नहीं होती अतः उनका अभाव कैसे हो पायेगा ? इस पर कहते हैं—अनुपलम्भ से अनुप-
लब्धि का विषय गृहीत होता है : अतः ज्ञात होता है कि अनुपलब्धि में आवरणादि शब्द
के अग्रहणकारण हो सकते हैं । उपलब्धिनिषेधक अनुपलब्भ प्रमाण से आवरण की
अनुपलब्धि होती हुई अपने अनुपलब्भ का विषय सिद्ध होती है ॥ ३० ॥
ज्ञानविकल्पों के भाव (सत्ता) तथा अभाव के आत्मा में अनुभव से भी ॥ ३१ ॥
यह हेतु नहीं हो सकता । प्राणियों के मन द्वारा आत्मा में ज्ञानविकल्पों के भावाभाव
१. अनुपलब्भात्तूपलब्धिनिषेधकात् 'प्रमाणात्तूपलब्धिरावरणस्य सिध्यति' इति
तात्पर्यकृतः ।
२. 'विषयः स तस्य । उपलब्धिनिषेधकस्य प्रमाणस्यानुपलब्धिः, ततश्च आवरणाद्य-
भाव इति द्रष्टव्यम्' इति तात्पर्यकृतः ।
३६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ०
संवेदनीयौ—'अस्ति मे संशयज्ञानम्, नास्ति मे संशयज्ञानम्' इति। एवं प्रत्यक्षानु-
मानागमस्मृतिज्ञानेषु। सेयमावरणाद्यनुपलब्धिरुपलब्ध्यभावः स्वसंवेद्यः--'नास्ति
मे शब्दस्याऽऽवरणाद्युपलब्धिः' इति, नोपलभ्यन्ते शब्दस्याग्रहणकारणान्या-
वरणादीनीति। तत्र यदुक्तम्-'तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धिः' इति, एतन्नो-
पपद्यते ॥ ३१ ॥
अनित्यसमप्रकरणम् [ ३२-३४ ]
साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः ॥ ३२ ॥
अनित्येन घटेन साधर्म्यात्—'अनित्यः शब्दः' इति ब्रुवतोऽस्ति घटेनानित्येन
सर्वभावानां साधर्म्यमिति सर्वस्यानित्यमनिष्टं सम्पद्यते। सोऽयमनित्यत्वेन
प्रत्यवस्थानात्--अनित्यसम इति ॥ ३२ ॥
अस्योत्तरम्—
साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसाधर्म्याच्च ॥ ३३ ॥
प्रतिज्ञाद्यवयवयुक्तं वाक्यं पक्षनिर्वर्तकम्, प्रतिपक्षलक्षणं प्रतिषेधः, तस्य
पक्षेण प्रतिषेध्येन साधर्म्यं प्रतिज्ञादियोगः। तद्यद्यनित्यसाधर्म्यादनित्यत्वस्या-
अनुभूत होते रहते हैं, जैसे—'यहाँ मुझे संशयज्ञान है' 'यहाँ नहीं है'। इसी तरह प्रत्यक्ष,
अनुमान, आगम तथा स्मृति में भी ज्ञानविकल्प समझ लेने चाहिये। आवरणद्यनुपलब्धि
के रूप में उपलब्ध्धयभावस्वरूप से स्वसंवेद्य किया जाता है, जैसे—'मुझे शब्द की आवर-
णाद्युपलब्धि नहीं हो रही है।' शब्द के रूप में अग्रहणकारण आवरणादि उपलब्ध नहीं
होते! अतः आपका यह कहना कि उसकी अनुपलब्धि के अनुपलम्भ से उसका अभाव सिद्ध
होता है—उचित नहीं ॥ ३१ ॥
अब 'अनित्यसम' का लक्षण कर रहे हैं—
सादृश्य से तुल्यधर्म की उपपत्ति द्वारा सब में अनित्यत्व के प्रसंग से 'अनित्यसम'
प्रतिषेध बनता है ॥ ३२ ॥
जैसे—'अनित्य घट के साधर्म्य से शब्द अनित्य है'—ऐसा कहने पर प्रतिवादी यह
कहें कि 'घट भी एक पदार्थ है, उसके साथ पदार्थत्वेन साधर्म्य होने से सब पदार्थ अनित्य
होंगे। उसका यह अनित्यत्व से प्रतिषेध 'अनित्यसम' कहलाता है ॥ ३२ ॥
इसका उत्तर—
साधर्म्य से असिद्धि मानने पर प्रतिषेध्यसाधर्म्य से प्रतिषेध की भी असिद्धि होने
लगेगी ॥ ३३ ॥
प्रतिज्ञाद्यवयवयुक्त वाक्य पक्ष स्थापित करता है। प्रतिषेधवाक्य प्रतिषेधस्थापक है,
उसका प्रतिषेध्य पक्ष के साथ प्रतिज्ञाद्यवयव से साधर्म्य है, यद्यपि यदि अनित्यसाधर्म्य