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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

२. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३७

२. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३७
अर्थादापत्तिरर्थापत्तिः । आपत्तिः = प्राप्तिः, प्रसङ्गः । यत्राभिधीयमानेऽर्थे
योज्योऽर्थः प्रसज्यते सोऽर्थापत्तिः, यथा–मेघेष्वसत्सु वृष्टिर्न भवतीति । किमत्र
प्रसज्यते ? सत्सु भवतीति ।
सम्भवो नामाविनाभाविनोऽर्थस्य सत्ताग्रहणदन्यस्य सत्ताग्रहणम्, यथा–
द्रोणस्य सत्ताग्रहणादाढकस्य सत्ताग्रहणम्, आढकस्य सत्ताग्रहणात् प्रस्थस्येति ।
अभावः = विरोधी, अभूतं भूतस्य, अविद्यमानं वर्षकर्म विद्यमानस्य वाय्वभ्र-
संयोगस्य प्रतिपादकम्, विधारके हि वाय्वभ्रसंयोगे गुरुत्वादपां पतनकर्म न
भवतीति ? ॥ १ ॥
सत्यम् एतानि प्रमाणानि, न तु प्रमाणान्तराणि । प्रमाणान्तरं च मन्य-
मानेन प्रतिषेध उच्यते । सोऽयम्—
शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावा-
नर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः ॥ २ ॥
अनुपपन्नः प्रतिषेधः । कथम् ? 'आप्तोपदेशः शब्दः' इति, न च शब्दलक्षण-
मैतिह्याद्व्यावर्तते । सोऽयं भेदः सामान्यात् सङ्गृहीत इति । प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षस्य
फल से आपादन (प्रत्ययविशेषप्रसक्ति) को 'अर्थापत्ति' कहते हैं । आपत्ति =
प्राप्ति, अर्थात् प्रसङ्ग । जहाँ अभिधीयमान अर्थ में अन्य अर्थ प्रसक्त हो उसे 'अर्थापत्ति'
कहते हैं । जैसे—'मेघों के न होने पर वृष्टि नहीं होती' । यहाँ अन्य अर्थ प्रसक्त
हुआ—'मेघों के होने पर वृष्टि होती हैं' ।
सम्भव से तात्पर्य हैं; 'अविनाभावी अर्थ की सत्ता के ग्रहण से अन्य की सत्ता का भी
ग्रहण' । जैसे—द्रोण (परिमाणविशेष) की सत्ता के ग्रहण से आढक की सत्ता का ग्रहण,
आढक की सत्ता के ग्रहण से प्रस्थ की सत्ता का ग्रहण ।
अभाव कहते हैं विरोधी को, यथा-भूत का विरोधी अभूत । जैसे—वर्षा का
अविद्यमान होना विद्यमान वायु-मेघ के संयोग का प्रतिपादक है अर्थात् मेघ होने पर
वृष्टि का अभाव बतलाता है कि धारणाविरोधी वायु-मेघ संयोग के गुरु होने से जल का
पतन नहीं होगा ? ॥ १ ॥
समाधान—अवश्य ये प्रमाण हैं; परन्तु प्रमाणान्तर नहीं हैं । प्रमाणान्तर मानकर
हमारे पूर्वोक्त परिगणन का निषेध किया जा रहा है, यह उचित नहीं; क्योंकि—
शब्द में ऐतिह्य का तथा अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव हो जाने से, और
सम्भव या अभाव के प्रमाणान्तर न होने से (प्रमाणचतुष्ट्व का निषेध कैसे होगा !) ॥२॥
यह परिगणन का निषेध नहीं बनता; क्योंकि हमने पीछे कहा है—'आप्तोपदेश शब्द
प्रमाण होता है' (१. १. ७) । यह शब्द प्रमाण ऐतिह्य से व्यावृत्त नहीं होता । अतः
यह ऐतिह्यरूप शब्द का भेद समानतया शब्द में ही अन्तर्भूत (संगृहीत) हो सकता
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
सम्बद्धस्य प्रतिपत्तिरनुमानम् । तथा चार्थपत्तिसम्भवाभावाः । वाक्यार्थसम्प्रत्य-
येनानभिहितस्यार्थस्य प्रत्यनीकभावाद् ग्रहणमर्थापत्तिरनुमानमेव ।
अविनाभाववृत्त्या च सम्बद्धयोः समुदायसमुदायिनोः समुदायेनेतरस्य ग्रहणं
सम्भवः, तदप्यनुमानमेव ।
'अस्मिन् सतीदं नोपपद्यते' इति विरोधित्वे प्रसिद्धे कार्यानुत्पत्त्या कारणस्य
प्रतिबन्धकमनुमीयते । सोऽयं यथार्थ एव प्रमाणोद्देश इति ॥ २ ॥
अर्थापत्तिप्रामाण्यपरीक्षा
'सत्यमेतानि प्रमाणानि, न तु प्रमाणान्तराणि' इत्युक्तम्, अत्रार्थापत्तेः प्रमाण-
भावाभ्यनुज्ञा नोपपद्यते । तथा हीयम्—
अर्थापत्तिरप्रमाणमनैकान्तिकत्वात् ? ॥ ३ ॥
असत्सु मेघेषु वृष्टिनं भवतीति सत्सु भवतीत्येतदर्थादापद्यते, सत्स्वपि चैकदा
न भवति—सेयमर्थापत्तिरप्रमाणमिति ? ॥ ३ ॥
नानैकान्तिकत्वमर्थापत्तेः,
अनर्थापत्तावर्थापत्त्यभिमानात् ॥ ४ ॥
है । प्रत्यक्ष द्वारा सम्बद्ध व्याप्यव्यापकभावापन्न अप्रत्यक्ष अर्थ का प्रतिपादन करना
अनुमान का कार्य है । आपके अर्थापत्ति, संभव, और अभाव भी यही कार्य करते हैं ।
वाक्यार्थज्ञान से अनभिहित अर्थ का विरोधी भाव से ज्ञान अर्थापत्ति कहलाता है, यह
अनुमान ही तो है । अविनाभाववृत्ति से सम्बद्ध समुदाय-समुदायी के समुदाय से दूसरे
अर्थ का ग्रहण होना 'सम्भव' कहलाता है, यह भी अनुमान ही है । 'इसके होने पर यह
नहीं होता'—ऐसे विरोधी प्रतिबन्धक के प्रसिद्ध होने पर कार्य की अनुपपत्ति से प्रति-
बन्धक कारण का अनुमान होता है, अतः 'अभाव' भी अनुमान ही है । इसलिए हमारा
प्रमाणपरिगणन यथार्थ ही है ॥ २ !
शङ्का—आपने कहा-'सचमुच ये प्रमाण हैं, परन्तु प्रमाणान्तर नहीं हैं'; यहाँ
अर्थापत्ति में प्रमाणत्वस्वीकृति हमें जची नहीं; क्योंकि यह—
अर्थापत्ति अप्रमाण है, अनेकान्तिक (व्यभिचार) होने से ? ॥ ३ ॥
'मेघों के न होने पर वृष्टि नहीं होती' इस वाक्य से अर्थापत्ति द्वारा आप यह गृहीत
करते हैं कि 'मेघ होने पर वृष्टि होती है'; परन्तु सच्चाई यह है कि कभी-कभी मेघ होने
पर वृष्टि नहीं भी होती । अतः यह अर्थापत्ति प्रमाण नहीं बनता ? ॥ ३ ॥
उत्तर—अर्थापत्ति में व्यभिचार नहीं है; क्योंकि—
अनर्थापत्तिरूप उक्त उदाहरण में अर्थापत्त्यभिमान किया जाने से ॥ ४ ॥