न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
१८. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३३
१८. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३३
उत्पत्तिकारणभावाच्चोत्पत्तिः। एवं स्फटिकादिव्यक्तीनां विनाशोत्पत्तिकारण-
भावाद्धिनाशोत्पत्तिभाव इति।
निरधिष्ठानं च दृष्टान्तवचनम्। गृह्यमाणयोर्विनाशोत्पादयोः स्फटिकादिषु
स्यादयमाश्रयवान् दृष्टान्तः—क्षीरविनाशकारणानुपलब्धिवद्, दध्युत्पत्तिवच्चेति,
तौ तु न गृह्येते। तस्मान्निरधिष्ठानोऽयं दृष्टान्त इति।
अभ्यनुज्ञाय च स्फटिकस्योत्पादविनाशौ, योऽत्र साधकस्तस्याभ्यनुज्ञानाद-
प्रतिषेधः। कुम्भवन्न निष्कारणौ विनाशोत्पादौ स्फटिकादीनामित्यभ्यनुज्ञेयोऽयं
दृष्टान्तः; प्रतिषेद्धुमशक्यत्वात्। क्षीरदधिवत्तु निष्कारणौ विनाशोत्पादाविति
शक्योऽयं प्रतिषेद्धुम्ः कारणतो विनाशोत्पत्तिदर्शनात्। क्षीरदध्नोर्विनाशोत्पत्ती
पश्यता तत्कारणमनुमेयम्। कार्यलिङ्गं हि कारणम् इत्युपपन्नम्—'अनित्या
बुद्धिः' इति ॥ १७ ॥
बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १८-४१ ]
इदं तु चिन्त्यते—कस्येयं बुद्धिरात्मेन्द्रियमनोऽर्थानां गुण इति प्रसिद्धोऽपि
उपस्थित होने पर घट का विनाश हो जाता है, उत्पत्तिकारण होने पर उसकी उत्पत्ति
हो जाती है। इसी नियम से स्फटिक व्यक्ति में जब विनाश-उत्पाद के कारण उपस्थित
होंगे तो उसके विनाश-उत्पाद हो जाते हैं।
क्षीरदृष्टान्त निराश्रय ( निर्विषय ) भी है। स्फटिकादि में विनाश-उत्पाद यदि गृहीत
होते तो क्षीरविनाशकारणानुपलब्धि तथा दध्युत्पत्ति वाला दृष्टान्त सविषयक होता।
स्फटिक में वे गृहीत नहीं होते, अतः यह दृष्टान्त निराश्रय ही है।
स्फटिक का उत्पाद-विनाश ( कार्य ) स्वीकार करके प्रकृति के साधक ( कारण )
की स्वीकृति की जा सकती है तो उसका अपरापर व्यक्ति की उत्पत्ति का अप्रतिषेध
बनेगा ! घट की तरह उत्पाद-विनाश निष्कारण नहीं हैं, अतः यह ( घटवाला ) दृष्टान्त
स्वीकार करने में भी बाधा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि इसका आप प्रतिषेध नहीं कर
सकते। क्षीर-दधि की तरह निष्कारण विनाश-उत्पाद होते हैं, यह दृष्टान्त, कारण से
विनाश-उत्पाद देखा जाने से प्रतिषिद्ध किया जा सकता है। क्षीर-दधि का विनाश-उत्पाद
देखने वाला भी उसके कारण का अनुमान अवश्य कर लेगा, क्योंकि कारण कार्य का
अनुमापक है। इस सम्पूर्ण प्रसङ्ग से यह सिद्ध हो गया कि बुद्धि अनित्य है ॥ १७ ॥
अब इस पर विचार किया जा रहा है कि आत्मा, इन्द्रिय, मन तथा अर्थ—इनमें
से बुद्धि किसका गुण है। यद्यपि इस विषय पर पहले ( ३.१.१ ) भी विचार किया जा
२३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [३. अ० २. आ०
खल्वयमर्थः, परीक्षाशेषं प्रवर्त्तयामोति प्रक्रियते। सोऽयं बुद्धौ सन्निकर्षोत्पत्तेः
संशयः; विशेषास्याग्रहणादिति। तत्रायं विशेष :—
नेन्द्रियार्थयोः, तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात् ॥ १८ ॥
नेन्द्रियाणामर्थानां वा गुणो ज्ञानम्; तेषां विनाशे ज्ञानस्य भावात्। भवति
खल्विदमिन्द्रियेऽर्थे च विनष्टे—ज्ञानमद्राक्षमिति। न च ज्ञातरि विनष्टे ज्ञानं
भवितुमर्हति। अन्यत् खलु वै तदिन्द्रियार्थसन्निकर्षजं ज्ञानं यदिन्द्रियार्थविनाशे
न भवति। इदमन्यदात्ममनःसन्निकर्षजं तस्य युक्तो भाव इति। स्मृतिः खल्विव-
यम्—'अद्राक्षम्' इति पूर्वदृष्टविषया। न च विज्ञातार नष्टे पूर्वोपलब्धेः स्मरणं
युक्तम्, न चान्यदृष्टमन्यः स्मरति। न च मनसि ज्ञातर्यभ्युपगम्यमाने शक्य-
मिन्द्रियार्थयोर्ज्ञातृत्वं प्रतिपादयितुम् ॥ १८ ॥
अस्तु तर्हि मनोगुणो ज्ञानम् ?
युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च न मनसः ॥ १९ ॥
'युगपज्ज्ञेयानुपलब्धिरन्तःकरणस्य लिङ्गम्' ( १.१.१६ ), तत्र युगपज्ज्ञेया-
चुका है; परन्तु इसके विशेष परिज्ञान के लिए पुनः विचार प्रारम्भ कर रहे हैं। बुद्धि में
आत्मा, इन्द्रिय, तथा अर्थ के सन्निकर्ष की अपेक्षा होती है, अतः इन का यह गुण है—
यह तो निश्चित हो गया; परन्तु इनमें से यह किस एक का गुण है—ऐसा विशेष ज्ञान
नहीं होता—अतः संशय उपस्थित हो गया ।
यहाँ विशेष वक्तव्य यह है—
इन्द्रिय तथा अर्थ का गुण बुद्धि नहीं है; क्योंकि उनके विनष्ट होने पर भी वह
रहती है ॥ १८ ॥
बुद्धि इन्द्रियों या अर्थों का गुण नहीं है, क्योंकि उन इन्द्रियों तथा अर्थों के विनष्ट
होने पर भी ज्ञान यथास्थित रहता है। इन्द्रिय तथा अर्थ के विनष्ट होने पर भी ऐसा
होता है कि 'इसको मैंने देखा था', अन्यथा ज्ञाता के विनष्ट होने पर ज्ञान नहीं रहता !
वह इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान ( चाक्षुष-आदि ) दूसरा है, जो इन्द्रियार्थविनाश होने पर
नहीं होता। परन्तु 'मैंने देखा था' यह आत्ममनःसन्निकर्षज ज्ञान दूसरा है, यह तो रह
ही सकता है । 'मैंने इसे देखा था' यह पूर्वदृष्टविषयक स्मृति है। विज्ञाता के नष्ट होने
पर पहले देखी हुई वस्तु का स्मरण युक्त नहीं; क्योंकि अन्य दृष्ट को अन्य कैसे स्मरण
करेगा ? मन को ज्ञाता स्वीकार कर लिये जाने पर इन्द्रियार्थ को ज्ञाता बताना भी
उचित नहीं ॥ १८ ॥
तो फिर मन को ही बुद्धि का गुण मान लें ?
युगपज्ज्ञेयानुपलब्धि होने से बुद्धि मन का गुण नहीं है ॥ १९ ॥
युगपज्ज्ञेयानुपलब्धि अन्तःकरण ( मन ) का अनुमापक है। युगपज्ज्ञेयानुपलब्धिहेतु