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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९

१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९
विभागश्च—
तत्त्रिविधम्—वाक्छलम्, सामान्यच्छलम्, उपचारच्छलं चेति ॥ ११ ॥
वाक्छललक्षणम्
तेषाम्—
अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ॥ १२ ॥
'नवकम्बलोऽयं माणवकः' इति प्रयोगः। अत्र 'नवः कम्बलोऽस्य' इति वक्तु-
रभिप्रायः। विग्रहे तु विशेषः, न समासे। तत्रायं छलवादी वक्तुरभिप्रायादवि-
वक्षितमन्यमर्थम्—'नव कम्बला अस्येति तावदभिहितं भवता' इति कल्पयति,
कल्पयित्वा चासम्भवेन प्रतिषेधति—'एकोऽस्य कम्बलः कुतो नव कम्बलाः' इति।
तदिदं सामान्यशब्दे वाचि छलं वाक्छलमिति।
अस्य प्रत्यवस्थानम्—सामान्यशब्दस्यानेकार्थत्वेऽन्यतराभिधानकल्पनायां
विशेषवचनम्। 'नवकम्बलः' इत्यनेकार्थाभिधानम्—'नवः कम्बलोऽस्य' इति,
'नव कम्बला अस्य' इति। एतस्मिन् प्रयुक्ते येयं कल्पना 'नव कम्बला अस्य'
इत्येतद्भवताऽभिहितं तच्च न सम्भवति' इति, एतस्यामन्यतराभिधानकल्पनायां

अतः अब उसका विभाग किया जा रहा है—
१. वाक्छल, २. सामान्यछल, तथा ३. उपचारछल—यों वह तीन प्रकार का
होता है ॥ ११ ॥
उनमें समासादिवृत्तिविषयक वाक्छल का व्याख्यान करते हैं—
सामान्येन कथित अर्थ में वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अर्थ की कल्पना 'वाक्छल'
कहलाता है ॥ १२ ॥
जैसे 'नवकम्बल वाला यह माणवक है' इस वाक्य में 'नवकम्बल' शब्द से वक्ता का
अभिप्राय बहुव्रीहि समास द्वारा 'नवीन कम्बल वाला' में है। इस शब्द के विग्रह में
विशेषता है, समास में नहीं। वहाँ यह छलवादी, वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अन्य
अर्थ—'नौ हैं कम्बल जिसके' की कल्पना कर असम्भव अर्थ से उसका खण्डन करता
है—'अरे इसके पास तो एक ही कम्बल है, नौ कहाँ से आये !' यह सामान्येन कथित
अर्थबोधक वाक् (वाणी) में छल 'वाक्छल' कहलाता है।
इसका प्रतीकार यों है—सामान्य शब्द के अनेकार्थक होनेपर किसी एक की कल्पना
के लिये विशेषतया कथन करना पड़ता है। 'नवकम्बल' यह शब्द अनेकार्थाभिधायी है—
'नया है कम्बल जिसके' या 'नौ हैं कम्बल जिसके'। इस शब्दप्रयोग में आपकी 'नौ हैं
कम्बल जिसके' यह कल्पना सम्भव नहीं है; क्योंकि अनेकों में किसी विशिष्ट एक की

७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ०
विशेषो वक्तव्यः । यस्माद्विशेषोऽर्थविशेषु विज्ञायते—अयमर्थोऽनेनाभिहित इति,
स च विशेषो नास्ति । तस्मान्मिथ्याभियोगमात्रमेतदिति ।
प्रसिद्धश्च लोके शब्दार्थसम्बन्धोऽभिधानाभिधेयनियमनियोगः । 'अस्याभि-
धानस्यायमर्थोऽभिधेयः' इति समानः सामान्यशब्दस्य, विशेषो विशिष्टशब्दस्य ।
प्रयुक्तपूर्वाश्चेमे शब्दा अर्थे प्रयुज्यन्ते, नाप्रयुक्तपूर्वाः । प्रयोगश्चार्थसम्प्रत्ययार्थः,
अर्थप्रत्ययाच्च व्यवहार इति । तत्रैवमर्थगत्यर्थे शब्दप्रयोगे सामर्थ्यात् सामान्य-
शब्दस्य प्रयोगनियमः । 'अजां ग्रामं नय', 'सर्पिराहर', 'ब्राह्मणं भोजय' इति
सामान्यशब्दाः सन्तोऽर्थावयवेषु प्रयुज्यन्ते । सामर्थ्याद्यत्रार्थक्रियादेशना सम्भवति
तत्र प्रवर्तन्ते, नार्थसामान्ये; क्रियादेशनाऽसम्भवात् । एवमयं सामान्यशब्दः 'नव-
कम्बलः' इति योऽर्थः सम्भवति-'नवः कम्बलोऽस्य' इति, तत्र प्रवर्तते; यस्तु न
सम्भवति-'नव कम्बला अस्य' इति, तत्र न प्रवर्तते । सोऽयमनुपपद्यमानार्थ-
कल्पनया परवाक्योपालम्भस्ते न कल्पत इति ॥ १२ ॥
सामान्यच्छललक्षणम्
सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम् ॥ १३ ॥
कल्पना करने से पूर्व तद्बोधक कोई विशिष्ट वचन करना चाहिए, जिससे वह विशेष अर्थ
जाना जा सके कि इस शब्द द्वारा यहाँ यही अर्थ बोधित है । वैसा विशेष यहाँ कुछ नहीं
कहा गया, अतः आपका यह अभियोग मिथ्या है ।
लोक में समग्र शब्दार्थ-सम्बन्ध अभिधानाभिधेय-नियम से जुड़ा हुआ है—इस शब्द
का यही अर्थ अभिधेय है । सामान्य के बोधक शब्द के साधारण तथा विशेष शब्द के
विशिष्ट अर्थ होंगे । पहले कभी उस अर्थ के लिये प्रयुक्त हुए शब्द ही आज उस अर्थ
में प्रयुक्त किए जा सकते हैं, अपूर्व नहीं; क्योंकि शब्दों का प्रयोग अर्थज्ञान के लिए होता
है, अर्थज्ञान से व्यवहार चलता है । इस प्रकार, अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग मानने पर
प्रकाशक होने से उस अर्थ में सामान्यशब्द का प्रयोग-नियम भी मानना उचित है ।
'अजा को गाँव ले जाओ', 'घी लाओ', ब्राह्मण को खिलाओ' आदि शब्द सामान्य होते
हुए अपने अपने किसी एक अर्थ में ही प्रयुक्त होते हैं। जैसे ये अपनी सामर्थ्य से, जहाँ
विशेष अर्थक्रियादेशना सम्भव हो, वहीं प्रवृत्त होते हैं। अर्थसामान्य में क्रियादेशना सम्भव
नहीं होती । इस रीति से 'नवकम्बल' यह सामान्यशब्द 'नये कम्बल वाला' इस अर्थ में
ही प्रयुक्त होता है, 'नौ कम्बल वाला' यह अर्थ वक्ता के अभिप्राय में अन्वित नहीं,
अतः उस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता । इसलिए प्रकृत में उपपन्न न होनेवाली अर्थकल्पना
से परवादी के वाक्य का उपालम्भ उचित नहीं है ॥ १२ ॥
अतिसामान्य योग से सम्भव अर्थ की असम्भव अर्थकल्पना करना 'सामान्यच्छल'
कहलाता है ॥ १३ ॥