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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

११. सू०] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १४१

११. सू०] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १४१
उभयसन्निधावलक्षितानि वासांस्यानयेति प्रयुक्तो येषु वासस्सु लक्षणानि न
भवन्ति तानि लक्षणाभावेन प्रतिपद्यते, प्रतिपद्य चानयति । प्रतिपत्तिहेतुश्च
प्रमाणमिति ॥ ८ ॥
असत्यर्थे नाभाव इति चेन्न; अन्यलक्षणोपपत्तेः ॥ ९ ॥
यत्र भूत्वा किञ्चिन्न भवति तत्र तस्याभाव उपपद्यते । न चालक्षितेषु
वासस्सु लक्षणानि भूत्वा न भवन्ति, तस्मात्तेषु लक्षणाभावोऽनुपपन्न इति ?
न; अन्यलक्षणोपपत्तेः । यथाऽयमन्येषु वासस्सु लक्षणानामुपपत्तिं पश्यति, नैव-
मलक्षितेषु । सोऽयं लक्षणाभावं पश्यन्नभावेनार्थं प्रतिपद्यत इति ॥ ९ ॥
तत्सिद्धेरुलक्षितेष्वहेतुः ? ॥ १० ॥
तेषु वासस्सु लक्षितेषु सिद्धिर्विद्यमानता येषां भवति, न तेषामभावो
लक्षणानाम् । यानि च लक्षितेषु विद्यन्ते लक्षणानि, तेषामलक्षितेष्वभाव
इत्यहेतुः । यानि खलु भवन्ति तेषामभावो व्याहत इति ? ॥ १० ॥
न; लक्षणावस्थितापेक्षासिद्धेः ॥ ११ ॥
केवल चिह्न न होना ही उन अचिह्नित वस्त्रों को चिह्नित वस्त्रों से पृथक् कर रहा था,
अतः चिह्नाभाव वाले जितने वस्त्र मिले उन्हें वह ले आया। यहाँ चिह्नाभाव ही उस
ज्ञान में कारण बना, अतः अभाव का प्रामाण्य सिद्ध है ॥ ८ ॥
'अर्थ (सत्ता) के न होने पर अभाव नहीं बनेगा'—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि
उस अभाव का अन्य लक्षणों से उपपादन हो सकता है ॥ ९ ॥
जहाँ कुछ पहले है फिर वह न रहे, तब तो उसका अभाव बताना ठीक है, परन्तु
जो है ही नहीं उसका अभाव कैसे होगा ? अचिह्नित वस्त्रों में तो कोई चिह्न था नहीं,
फिर उनमें चिह्नाभाव का ज्ञान प्रयोक्ता को कैसे हो गया ?—यह पूर्वपक्षी का मन्तव्य
भी उचित नहीं; क्योंकि अन्य लक्षणों द्वारा वहाँ उस अभाव का ज्ञान बन सकता है ।
यथा—वह प्रयोक्ता चिह्नित वस्त्रों में जैसे लक्षण पाता है वैसे अचिह्नितों में नहीं पावे
तो 'वैसे लक्षण न पाना' ही एक तरह से उस अभाव का लक्षण उपपन्न हो गया और
अचिह्नित अर्थ का बोधक बन गया ॥ ९ ॥
अलक्षितों में उस लक्षण का न होना अभाव की सिद्धि में हेतु नहीं बन
सकता ? ॥ १० ॥
उन चिह्नित वस्त्रों में जिन लक्षणों की विद्यमानता है, उनका अभाव तो है नहीं,
फिर जो लक्षण (चिह्न) लक्षित (चिह्नित) में हैं, उनका अलक्षितों में भी अभाव बताना
हेतु कैसे बनेगा ? क्योंकि जो हैं उनका अभाव बताना तो विरुद्ध है ? ॥ १० ॥
अहेतु नहीं है; लक्षण(वस्थित की अपेक्षा से उसकी सिद्धि हो जायेगी ॥ ११ ॥
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० २. आ०
न ब्रूमः–यानि लक्षणानि भवन्ति तेषामभाव इति, किन्तु केषुचिल्लक्षणा-
न्यवस्थितानि, अनवस्थितानि केषुचित् । अपेक्षमाणो येषु लक्षणानां भावं न
पश्यति तानि लक्षणाभावेन प्रतिद्यत इति ॥ ११ ॥
प्रागुत्पत्तेरभावोपपत्तेश्च ॥ १२ ॥
अभावद्वैतं खलु भवति—प्राक् चोत्पत्तेरविद्यमानता, उत्पन्नस्य चात्मनो
हानादविद्यमानता । तत्रालक्षितेषु वासस्सु प्रागुत्पत्तेरविद्यमानतालक्षणो
लक्षणानामभावः, नेतर इति ॥ १२ ॥
शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १३-३९ ]
‘आप्तोपदेशः शब्दः’ इति प्रमाणभावे विशेषणं ब्रुवता नानाप्रकारः शब्द
इति ज्ञाप्यते । तस्मिन् सामान्येन विचारः—किं नित्यः, अथानित्य इति ? विमर्श-
हेत्वनुयोगे च विप्रतिपत्तेः संशयः ।
१. आकाशगुणः शब्दो विभुर्नित्योऽभिव्यक्तिधर्मक इत्येके । २. गन्धादिसह-
वृत्तिर्द्रव्येषु सन्निविष्टो गन्धादिवदवस्थितोऽभिव्यक्तिधर्मक इत्यपरे । ३. आकाश-
गुणः शब्द उत्पत्तिनिरोधधर्मको बुद्धिवदित्यपरे । ४. महाभूतसंक्षोभजः शब्दोऽना-
श्रित उत्पत्तिधर्मको निरोधधर्मक इत्यन्ये ।
हम यह नहीं कहते कि ‘जो लक्षण हैं, उनका अभाव है’; अपितु ‘कुछ में लक्षणों
के होने पर, कुछ अलक्षितों में व्यवस्थित (वृत्ति) भी रह जाते हैं, प्रयोक्ता जिन वस्तुओं
में उन लक्षणों को नहीं देख पाता उनको लक्षणाभाव से जान लेता है’ ॥ ११ ॥
उत्पत्ति से पूर्व अभावोपपत्ति बन जाने से भी अहेतु नहीं है ॥ १२ ॥
दो प्रकार का अभाव होता है—१. उत्पत्ति से पहले वस्तु का न रहना, तथा
२. उत्पन्न के नाश से न रहना । यहाँ अचिह्नित वस्त्रों में उत्पत्ति से पूर्व पहले वाला
अभाव है, न कि दूसरे प्रकार का । अतः यहाँ वस्तु की अविद्यमानता के लक्षण का
अभाव सिद्ध हुआ उससे प्रमेय का प्रतिपादन होने से वह प्रमाण है—यह सिद्ध हो
गया ॥ १२ ॥
प्रमाण-लक्षण में ‘आप्तोपदेश’—यह विशेषण देकर ‘शब्द नाना प्रकार का होता
है’ यह बताया है । उस शब्द पर साधारणतः विचार कर रहे हैं कि क्या वह नित्य है,
या अनित्य ? क्योंकि विप्रतिपत्ति के विमर्शपिक्ष होने पर संशय हुआ ही करता है ।
वहाँ कुछ (मीमांसक) विद्वान् शब्द को विभु, नित्य तथा अभिव्यक्तिधर्मक मानते
हैं । कुछ (साङ्ख्यकार) विद्वान् ‘शब्द गन्धादि के साथ द्रव्य में रहने वाला गन्धादि की
तरह रहता हुआ अभिव्यक्तिधर्मक हैं’—ऐसा मानते हैं । दूसरे (वैशेषिक) विद्वान् शब्द
को आकाश का गुण तथा उत्पत्तिनिरोधधर्मक मानते हैं । ‘महाभूतों के संयोगविशेष से
उत्पन्न होनेवाला शब्द अनाश्रित है, उत्पत्तिधर्मा भी है, और निरोधधर्मा भी’—ऐसा
कुछ (बौद्ध) विद्वान् मानते हैं ।