सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ]

५. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६३
अस्तु तर्हि स प्रतिपक्षहीनो वितण्डा ? यद्वै खलु तत्परप्रतिषेधलक्षणं
वाक्यं स वैतण्डिकस्य पक्षः, न त्वसौ साध्यं कञ्चिदर्थं प्रतिज्ञाय स्थापयतीति ।
तस्माद्यथान्यासमेवास्त्विति ॥ ३ ॥
हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ]
हेतुलक्षणाभावादहेतवो हेतुसामान्याद्धेतुवदाभासमानाः । त इमे—
सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः ॥ ४ ॥
(क) सव्यभिचारलक्षणम्
तेषाम्—
अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ॥ ५ ॥
व्यभिचारः = एकत्राव्यवस्थितिः¹ । सह व्यभिचारेण वर्त्तते इति सव्य-
भिचारः । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दोऽस्पर्शत्वात्, स्पर्शवान् कुम्भोऽनित्यो
दृष्टः, न च तथा स्पर्शवान् शब्दः, तस्मादस्पर्शत्वान्नित्यः शब्दः' इति ।
दृष्टान्ते—स्पर्शवत्त्वमनित्यत्वं च धर्मौ न साध्यसाधनभूतौ दृश्येते, स्पर्शवाँ-
क्यों न तब 'प्रतिपक्षहीन जल्प वितण्डा है'—इतना ही लक्षणसूत्र रखा जाये ?
वितण्डावादी के परपक्षखण्डनपरक वाक्य ही औपचारिक रूप से उसका 'पक्ष' है ! हाँ,
यद्यपि वह स्पष्टरूप से किसी साध्य अर्थ की प्रतिज्ञा करके अपना कोई पक्ष नहीं रखता;
फिर भी किसी न किसी रूप में उसका भी प्रतिपक्ष बन ही सकता है, अतः सूत्रकारोक्त
लक्षण ही उचित है ॥ ३ ॥
हेतुलक्षण न घटने से वस्तुतः जो अहेतु हों, परन्तु हेतु-सादृश्य से जिनका हेतु की
तरह आभास (प्रतीति) होता हो, वे 'हेत्वाभास' कहलाते हैं। वे ये हैं—
१. सव्यभिचार, २. विरुद्ध, ३. प्रकरणसम, ४. साध्यसम तथा ५. कालातीत—
ये पांच 'हेत्वाभास' कहलाते हैं ॥ ४ ॥
उनमें—
जो ( हेतु ) एक ही (साध्य तथा साध्याभाव) के अन्त (अधिकरण) में न रहे उसे
'सव्यभिचार' हेत्वाभास कहते हैं ॥ ५ ॥
'व्यभिचार' से तात्पर्य है—एक जगह न रहना। व्यभिचार के साथ जो प्रवृत्त हो
वह 'सव्यभिचार' कहलाता है। इसका उदाहरण—'शब्द नित्य है, अस्पर्श होने से;
लोक में स्पर्शवान् घट अनित्य देखा गया है, शब्द स्पर्शवान् नहीं है अतः अस्पर्शत्वहेतु से
वह नित्य है'। यहाँ दृष्टान्तस्थ स्पर्शवत्त्व अनित्यत्व हेतुओं में साध्यसाधनभाव नहीं देखा
१. व्यवस्था—इति पाठ० ।

६४ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० २ . आ०
श्चाणुर्नित्यश्चेति । आत्मादौ च दृष्टान्ते-'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः'
( १. १. ३४ ) इति अस्पर्शत्वादिति हेतुर्नित्यत्वं व्यभिचरति—'अस्पर्शा बुद्धिर-
नित्या च' इति । एवं द्विविधेऽपि दृष्टान्ते व्यभिचारात्साध्यसाधनभावो नास्तीति
लक्षणाभावादहेतुरिति ।
नित्यत्वमप्येकोऽन्तः, अनित्यत्वमप्येकोऽन्तः, एकस्मिन्नन्ते विद्यत इति
ऐकान्तिकः, विपर्ययादनैकान्तिकः, १उभयान्तव्यापकत्वादिति ॥ ५ ॥
(ख) विरुद्धलक्षणम्
सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः ॥ ६ ॥
तं विरुणद्धीति तद्विरोधी, अभ्युपेतं सिद्धान्तं व्याहन्तीति । यथा—'सोऽयं
विकारो व्यक्तेरपैति नित्यत्वप्रतिषेधात्', न नित्यो विकार उपपद्यते । 'अपैतोऽपि
विकारोऽस्ति, विनाशप्रतिषेधात्' । सोऽयं नित्यत्वप्रतिषेधादिति हेतुर्व्यक्तेर-
पैतोऽपि विकारोऽस्तीत्यनेन स्वसिद्धान्तेन विरुध्यते । कथम् ? व्यक्तिः = आत्म-
लाभः, अपायः = प्रच्युतिः; यद्यात्मलाभात् प्रच्युतो विकारोऽस्ति ? नित्यत्वप्रति-
षेधो नोपपद्यते । यद्व्यक्तेरपेतस्यापि विकारस्यास्तित्वं तत् खलु नित्यत्वमिति ।
जाता; क्योंकि स्पर्शवान् भी अणु और नित्य हो सकता है। आत्मा-आदि दृष्टान्तस्थ
“उदाहरणसादृश्य से साध्य का साधक 'हेतु' है” ( १ . १ . ३४ )—इस हेतुलक्षण से
'अस्पर्शत्व' हेतु नित्यत्व से व्यभिचरित होगा; क्योंकि बुद्धि अस्पर्शवती होती हुई भी
अनित्य है। इस प्रकार दोनों ही तरह के दृष्टान्तों में साध्यसाधनभाव न होने से हेतु-
लक्षण नहीं घट पायेगा, अतः वह हेतु नहीं बन सकता ।
यहाँ नित्यत्व एक अन्त है, अनित्यत्व भी एक अन्त है। एक अन्त (अधिकरण) में
साध्यसाधनभाव रहे अतः 'ऐकान्तिक' हेतु कहते हैं। इसके विपरीत 'अनैकान्तिक' कह-
लाता है; क्योंकि वह दोनों अन्तों में व्याप्त रहता है ॥ ५ ॥
जो हेतु अभ्युपगतार्थ का विरोधी हो वह 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहलाता है ॥ ६ ॥
उसका जो विरोध करे वह हुआ 'तद्विरोधी' अर्थात् जो प्रतिज्ञा तथा हेतु से प्रकाशित
सिद्धान्त का विरोध करे। जैसे साङ्ख्यकार का मत है—'परिणामाख्य कार्य अभिव्यक्त
स्वरूप से विश्लिष्ट हो जाता है, अनित्य होने से', 'अभिव्यक्तिरहित वह परिणामाख्य कार्य
रहता भी है, स्वरूपहानि न होने से'; यहाँ 'विकार नित्य उपपन्न नहीं होता' यह हेतु
'व्यक्ति से असंश्लिष्ट होकर भी विकार रहता है, स्वरूप-हानि न हो ने से' इस स्वसिद्धान्त
से विरुद्ध पड़ता है। कैसे? 'व्यक्ति' कहते हैं आत्मलाभ को, 'प्रच्युति' कहते हैं असंश्लेष को।
उसमें नित्यत्वप्रतिषेध उपपन्न नहीं है, क्योंकि आत्मसत्ता से अलग होकर भी विकार
१. 'उभयत्र'—इति पाठ० ।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri