नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
४९२ नाट्यशास्त्र
भूमिः कण्टकिनी पुरो विटपिनः प्रायो बहूपद्रवाः
भूयश्चैव दिवाकरो मृगयते सन्ध्याङ्गनासङ्गमम् ।
तद्विश्रम्य जनोऽयमत्र सदने ग्राम्योचितां सेवतां
प्रातः पान्थ विचार्य चेतसि चिरं स्थातासि गन्तासि वा ॥
[ यह भूमि कांटों से युक्त है, सामने वाले वृक्षों में उपद्रव भरा है तथा
इधर यह सूर्य भी अपनी सन्ध्यावधू के साथ मिलन को खोज रहा है । इसी
कारण इस समय घर में विश्राम लेकर ग्राम्योचित क्रिया का उपभोग करना
उचित है और प्रातः होने पर विचार करना कि आगे जाना ही है या
ठहरना है । ]
( इसे ही अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' माना है तथा इसका जो अन्य लक्षण
भी मिलता है उसे यथा स्थान देखना चाहिए )
२३. प्रतिषेध :—अब प्रतिषेध का निरूपण करते हैं—‘कार्येषु’ इत्यादि
से । जैसे अमरूक के इस पद्य में :--
लग्ना नांशुकपल्लवे भुजलता न द्वारदेशेऽर्पिता
नो वा पादयुगे तथा निपतितं तिष्ठेति नोक्तं वचः ।
काले केवलमम्बुदालिमलिने गन्तुं प्रवृत्तः शठः
तन्व्या बाष्पजलोपकल्पितनदीपूरेण रुद्धः प्रियः ॥
[ वह पुरुष जब अम्बुराशि से मलिन मेघों वाले समय में दूर देश जाने
को उद्यत हुआ तो उसे रोकने के लिये उस बाला ने न तो कपडे को पकड़ा,
न द्वार देश पर अर्गला सी भुजलता को फैलायी, न उसके चरणों में गिरी
और न ठहरने के लिये शब्द ही कहे किन्तु वह विरह में रोने लगी तो उसके
आँसुओं की नदी बहने से वह शठ उसके प्रवाह से मार्ग अवरुद्ध हो जाने से
आगे नहीं जा सका । ]
इस पद्य के तृतीयपाद से नायक के विपरीत कार्य की प्रवृत्ति दिखलाई
गयी है और पश्चार्ध से नायिका की । यद्यपि कर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति यहाँ
ही सामने आती है परन्तु अन्तिम कार्य से उसने प्रिय की यात्रा का निवारण
कर ही डाला । यह बात चतुर्थपादगत कविचातुर्य से दिखलाई गयी अतः
यहाँ 'प्रतिषेध' है ।
२४. पृच्छा :—अब पृच्छा का निरूपण करते हैं—'यत्राकारोद्भवैः'
इत्यादि से । जैसे वेणीसंहार में—
किं भीमाद् गुरुदक्षिणां गुरुगदाद् भीमप्रियः प्राप्तवान् ( वे० सं० ६। )
[ क्या उन ने भयंकर गदाधारी तथा प्रिय भीम से गुरुदक्षिणा
प्राप्त की ? ]
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९३
यहाँ आकार एवं अभिप्राय सूचक काक्वादि से उद्धृत शक्ति के द्योतक
वाक्य के कारण 'पृच्छा' है ।
२५. दृष्टान्त :—अब 'दृष्टान्त' कहते हैं—'विद्वान्' इत्यादि से । जैसे
अभिनवगुप्तपाद के इस पद्य में :—
हा हालाहल लेहने हतमतिः सोऽयं समुत्कण्ठितो
गाढाङ्गारगरिम्णि चैष जडधीर्देहं निविक्षेप्स्यसि ।
ग्राम्योऽप्याजगवीं गुहं गलगुहां मोहादयं धावति
व्याधूयेतरसङ्गतानि यदयं सार्धं खलैः खेलति ॥
[ अरे यह कैसा दुर्बुद्धि है जो अति भीषण विष को चाटने के लिये
उत्कण्ठित हो रहा है, यह धधकते अंगारों वाली अग्नि में अपने शरीर को
पटकना चाहता है, यह गँवार पुरुष मोहवश अजगर की गले रूपी गुहा में
घुसने के लिये दौड़ लगा रहा है, क्योंकि यह उत्कृष्ट संगति को छोड़ कर
दुष्टों के साथ खेलना चाहता है । ]
यहाँ
४९४ नाट्यशास्त्र
उड़ा ले गया हो । नहीं—मेरे सामने साधारण शत्रु तो क्या देवशत्रु राक्षस
भी उसे हरण नहीं कर सकते हैं। वह फिर भी आँखो से वह कैसे एकदम
ओझल हो गयी, यह कैसा व्यवहार है । ]
यहाँ आद्यभाग संशय का उदाहरण है तथा शेष भाग उपपत्ति का है ।
२८. आशी : —अब आशी: को बतलाते हैं—'यथा शास्त्रार्थ' इत्यादि
से । जैसे रत्नावली में—'पादाग्रस्थितया' ( १।१ ) इत्यादि । प्रश्न—यह
आशी: अलंकार लक्षण कैसे हो गया । उत्तर—क्योंकि यहाँ वर्णनीय
स्तुति ही है ।
२९. प्रियवचन : —अब प्रियवचन को बतलाते हैं—'आदौ यत्'
इत्यादि से । जैसे :—
किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः किन्तु नाहं समर्थः
तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः ।
गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्यां
उन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥
[ दूसरों के घर की बात से हमें क्या वास्ता किन्तु मैं चुप रहने में समर्थ
नहीं हूँ, क्योंकि दाक्षिणात्यों का स्वभाव ही है कि वे स्वभाव से ही वाचाल
होते हैं । अच्छा, वह दूसरों के घर की बात क्या है, तो कहता हूँ कि आपकी
वल्लभा कीर्ति घरों, बाजारों, चौराहों और मद्यशाला तक में उन्मत्त हुई सी
घूम रही है । ( अर्थात् आपकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त हो रही है । ]
यहाँ आपकी वल्लभा घूम रही है यह कथन आरम्भ में क्रोध का जनक
होकर भी 'हन्त कीर्तिः' कहने पर हर्ष का भी उत्पादक है, अतः 'प्रियवचन'
है । यहाँ व्याजस्तुति नहीं है क्योंकि जहाँ निन्दा का अंश है वहाँ स्तुति नहीं
है और पूरी तरह से नहीं निन्दा है ।
३०. कपटसङ्घात : —अब कपट-संघात को बतलाते हैं—'छलयुक्त्या'
इत्यादि से । यहाँ छल के प्रयोग या बहाने से वञ्चना करने वाला कथन या
अर्थ को अन्यथा ग्रहण करना कपट है तथा उसका संघात 'लक्षण' बनता है ।
यह कपट वस्तुक्रम से या दैव से या शत्रु के प्रयोग से उद्भूत होता है । इनमें
वस्तुक्रम से उद्भूत जैसे-मालतीमाधव में मकरन्द का मालतीवेषधारण करना ।
दैवोद्भूत जैसे—नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन का शंखचूड को छलना ।
शत्रु के प्रयोग से उद्भूत जैसे छलितराम नाटक में लवणासुर द्वारा प्रेषित
राक्षसों के द्वारा मन्थरा और कैकेयी का वेष धारण कर गर्भवती सीता को
निर्वासित करवाना । इसके अतिरिक्त अन्य भी हैं—जैसे कृत्यारावण के प्रथम
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९५
अंक में सीता के वेष को धारण करने वाली शूर्पणखा के द्वारा लक्ष्मण को
वञ्चित एवं तिरस्कृत करना । 'ता सव्वहा अण्ण एव्व दे अणिबद्धं अभिप्पाअं
लक्खेभि' [ तत् सर्वथा अन्यमेव तेऽनिर्बन्धमभिप्रायं लक्षयामि ] इत्यादि से ।
३१. क्षमा :—अब क्षमा को बतलाते है—'दुर्जनोदाहृतै' इत्यादि से ।
दुर्जन के क्रोध उत्पन्न करने वाले कथनों से सभी के समक्ष सभा में तिरस्कृत
होकर भी जो पुरुष क्रोध नहीं करता वह क्षमावान् है । ऐसे उस पुरुष
के वर्णन योग्य कवि व्यापार को 'क्षमा' लक्षण समझना चाहिए । इससे यह
भी सूचित होता है कि औचित्य के अनुरूप भिन्न वृत्तियों का विभावादि के
उपयुक्त सञ्चय काव्यलक्षण के रूप में संग्रह के योग्य होगा । इसका उदाहरण
जैसे आचार्य अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
श्रोत्राय दुष्टवचनं प्रति किं न कोपः क्षोभं करोति हृदये ननु कोप एव ।
मित्रं ममैष तु निजात्मनि योऽपकारं कृत्वा ममाशुभकलङ्क-विघातहेतुः ॥
[ क्या कानों को बुरे वचन सुन कर क्रोध नहीं होता परन्तु जो हृदय में
क्षोभ उत्पन्न करे वह तो कोप है ही परन्तु जो अपकार करके भी मेरे अशुभ
कलंक को दूर करने में कारण बनता हो वह तो मेरा मित्र ही होगा यह
निश्चय ही कहा जा सकता है । ]
३२. प्राप्ति :—अब प्राप्ति को दिखलाते है—'दृष्ट्वैवावयवं' इत्यादि से ।
जैसे शाकुन्तल में—
अभ्युन्नता पुरस्तादवगाढ़ा जघनगौरवात् पश्चात् ।
द्वारेऽस्य पाण्डुसिकते पदपङ्क्तिर्दृश्यतेऽभिनवा ॥ (अ० शा० ३।५)
[ पीली रेत से युक्त इस लतामंडप के द्वार पर आगे की ओर उठा हुआ
तथा कटि भार के कारण पीछे की ओर गहरा होने वाला यह नवीन
पदचिह्न दिखाई पड़ रहा है । ]
इस लक्षण ( पद पंक्ति रूप अंश ) को देख कर वह यहाँ होगी ऐसा
शकुन्तला के सद्भाव का उन्नयन 'प्राप्ति' है ।
३३. अब पश्चात्ताप को दिखलाते हैं—'अकार्यं सहसा' इत्यादि से ।
सहसा का अर्थ है बिना विचार के किसी न करने योग्य कार्य को करके ।
जैसे—'मुखमंसविवर्ति पक्ष्मलाक्ष्याः ।
कथमप्युन्नमितं न चुम्बितन्तु ॥ ( शाकु० ३ । २२ )
[ उस मनोहरनेत्रों वाली का कन्धे की ओर मुड़ा हुआ मुंह किसी प्रकार
उठाया तो परन्तु मैं चूम न सका । ]
४९६ | नाट्यशास्त्र
३४. अनुवृत्तिः —अब अनुवृत्ति को बतलाते है—'प्रश्रयेणार्थ' इत्यादि
के द्वारा। जैसे भट्टेन्दुराज का पद्य है :—
राजा यद्यनुरुद्ध्यसे यदि भवेद्वाच्यं पुरा मादृशां
तत् सङ्क्रन्दनगोप किञ्चन मनाक् पृच्छत्यधीरो जनः ।
अग्रे रोहणचारिणां सरभसं सञ्चूर्यमाणश्रियं
कम्प्रत्याययितुं प्रयासरसिको यत्नेन रत्नायसे ॥
[ राजा यदि अनुरोध या आग्रह करें और वह भी यदि मेरे जैसे व्यक्ति
को कहने योग्य हो तो हे इन्द्रकीट, यह अधीरजन पूछता है कि रोहण पर्वत
पर सञ्चार करते समय सहसा आगे आने पर बलात् चूर-चूर किये जाने भी
प्रयास करने में रसिक तुम किसे विश्वास देकर समझाने के लिये अपने को
बड़े यत्न से अपने को रत्न के समान मान रहे हो, यह तो बतलाओ । ]
यहाँ अप्रस्तुत प्रशंसा के होने पर भी अप्रस्तुत का जो स्वरूप या शरीर-
गत वैचित्र्य है वह लक्षण के द्वारा ही हो रहा है, क्योंकि लक्षण शरीर भूत है
यह पहिले कहा जा चुका है ।
३५. उपपत्ति :—अब उपपत्ति बतलाते हैं—'प्राप्तानाम्' इत्यादि से ।
यहाँ 'प्राप्तानाम्' में वीप्सागर्भ निर्देश है अर्थात् जो जो प्राप्त होते हों ।
दोषाणाम् अर्थात् अवस्तुभूत क्योंकि उन अर्थों में उपपत्ति का कोई योग या
सम्बन्ध नहीं दिखलाई देता है । जैसे विक्र० के पद्य 'तिष्ठेत् कोपवशात्' इत्यादि
में । ( इसे सम्पूर्ण दिखाया जा चुका है, पृ० ४६३ पर ) । अथवा
जैसे :—क्वाकार्यं शशलक्ष्मण, क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा
चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ (विक्र०)
[ अप्सरः कन्या में आसक्ति रूप अकार्य कहाँ और कहाँ चन्द्र का उन्नत
वंश । यह कार्य कुलमर्यादा के विपरीत है । क्या वह फिर कभी दिखाई
पड़ेगी । अरे ! दोषों की शान्ति के लिये हमारा शास्त्र ज्ञान होता है । अरे ।
कोप में भी उसका मुख नितना मनोहर है । निष्पाप एवं पूज्यजन क्या कहेंगे ऐसे
सदाचार के परित्याग करने पर । पर अब तो वह स्वप्न में भी मिलना दुर्लभ
है । अरे मेरे मन, तुम धैर्य एवं स्वस्थता रखो । कौन युवक धन्य होकर उसके
अधर का आस्वादन करेगा । ]
३६. युक्ति :—अब युक्ति का लक्षण करते हैं—'साध्यते' इत्यादि से ।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९७
जैसे :—लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलकाण्डमृणालदण्डाः ॥
[ यह कोई अन्य ही लावण्य सरिता है जहाँ चन्द्र के साथ कमल भी तैर
रहे हैं, जिसमें हाथियों की कुम्भतटी उन्मग्न हो रही है और कदलकाण्ड
तथा मृणालदण्ड भी बह रहे हैं । ]
यहाँ स्पृहणीय उत्कृष्ट नेत्र, मुख आदि का परस्पर शोभात्मक तथा आनु-
कूल्य से उपलक्षित समवाय हैं उससे उपपन्न सरिता रूप अपूर्व अर्थ को सिद्ध
करने वाली अर्थ योजना के कारण यह 'युक्ति' है ।
३७. कार्य :—अब कार्य को बतलाते हैं—'यत्रापसारयन्' इत्यादि से ।
दोष को दूर कर गुण का तत्काल वाच्छनीय अर्थ में नियोजन करें या गुण
को हटा कर दोषों की किसी प्रकृत अर्थनीय पदार्थ में योजना करें तो 'कार्य'
होता है । इसका प्रथम स्थिति में यह उदाहरण है :—
'तावत् स्वात्मनि संश्रितद्रुमलताश्लेषोऽध्वगैर्वर्जनम्' इत्यादि ।
[ पथिकजन मार्गस्थित द्रुम के साथ लता के संश्लेष को भी कामोत्तेजक
होने से देखने की इच्छा छोड़ कर त्याग देते हैं, क्योंकि वैसा वे अपने लिये
ठीक नहीं मानते । ] इत्यादि ।
द्वितीय का उदाहरण है अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
विश्वप्रभो वितरतां कमलां किमन्यत् भूयात् स कोऽपि घटितो भवतोपकारः ।
दूराध्वगेषु पुनरम्बु तथा विकीर्णमन्ते यथा त्रिभुवने प्रसृतं यशस्ते ॥'
[ हे विश्व के नियन्ता, कमला को हमें प्रदान कीजिये, अन्य बात से हमें
क्या प्रयोजन ! कमला के देने से आपके द्वारा हमारा महान् उपकार हो
जाएगा । दूरस्थ पथिकों के लिये ऐसा जल प्रदान दीजिये जिससे त्रिभुवन में
आपका यश फैल जाए क्योंकि यही अन्तिम कार्य है जो करने योग्य है । ]
यहाँ आपने इसका महान् उपकार किया तथा पथिकों के लिये अतिशय
जल को तृष्णा निवारणार्थ प्रदान किया परन्तु इसके साथ विश्वप्रभो इस अर्थ
की पर्यालोचना से 'कार्य' रूप अर्थ की प्राप्ति हो जाती है ।
३८. अनुनीति :—अब अनुनीति का लक्षण बतलाते हैं—'अपूर्व' इत्यादि
के द्वारा । अपूर्व अर्थात् अतिशय तीव्र क्रोध को उत्पन्न करने के लिये जो
अपराध हो उसे दूर करना 'अनुनीति । जैसे रत्नावली में 'प्रसीदेति
ब्रूयामिदमसति कोपे न घटते' ( र० २ । १६ ) [ आप प्रसन्न हों ऐसा यदि
कहता हूँ तो यह कथन आपके क्रोध के बिना बनता नहीं है ( इत्यादि )
३२ ना० शा० द्वि०
४९८ नाट्यशास्त्र
अर्थात् यह तभी कहा जा सकता है । जब आप कुपित हों जब कि आपके
कुपित होने का कोई अंदेशा ही नहीं है ।
३६. परिदेवन :—अब परिदेवन का स्वरूप बतलाते हैं—‘दोषैर्यदन्य’
इत्यादि से । जैसे बालरामायण में दशरथ के नाम से जो राम को निर्वासन देने
आदि में दोष कहे गये थे उन प्रसिद्ध दोषों का राक्षसों के साथ सम्बन्ध जोड़ना
उचित है, दशरथ के साथ नहीं । ऐसे युक्तियुक्त वाक्यों का प्रयोग करना
‘परिदेवन’ समझना चाहिये । जैसे—नरेन्द्रे वृद्धे स्त्रीवशः यत्नमयशः’ ( राजा
ने बुढ़ापे में स्त्री के वश होकर अयश में अपने को डाल दिया ) इसके
अतिरिक्त किसी प्रयोजन से अन्य के नाम पर अभिहित जो अर्थ है
उनका प्रसिद्ध अर्थों ( दोषों ) के साथ सम्वाद अर्थात् अन्य के मन में स्थित
दोषों का सम्बन्ध बतला देना, जो वस्तुतः किसी अन्य के साथ होना उचित
हो तो ऐसे वाक्यों का कथन भी ‘परिदेवन’ होता है । जैसे इस पद्य में :—
एनां पश्य पुरस्तटीमिह किल क्रीडाकिरातो हरो
गाण्डीवेन किरीटिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः ।
इत्याकर्ण्य कथाऽद्भुतं हिमनिधावद्रौ सुभद्रापते—
र्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दण्डयोर्मण्डनम् ।।
[ इस सामने की तटी को तो देखो, यहाँ कीड़ा के बहाने से किरात
वेषधारी भगवान् शिव के चूडान्तर पर ( मस्तक पर ) अर्जुन ने गाण्डीव
धनुष का बड़े वेग से शक्तिशाली प्रहार किया था । ऐसी सुभद्रापति ( अर्जुन )
के शौर्य की अद्भुत कथा को सुन कर जिसने अपने भुजाओं को मन्द मन्द
मण्डलाकार किया या भुजाओं में मण्डन किया । ]
यहाँ तट के विलोकन के उद्देश्य से जो धनञ्जय का व्यापार बतलाया गया
उसने किसी राजा के मन में दोषों का सम्बन्ध उत्पन्न कर डाला अर्थात् उसे
ईर्ष्या हो गयी कि मेरे मनुष्य होने तथा अर्जुन के भी मनुष्य रहने पर मेरी
अर्जुन के सदृश पराक्रम करने की सामर्थ्य कहाँ ( अर्थात् उससे मैं न्यून हो रहा
हूँ ) । अतएव इस मण्डन से अधिकार स्थित लोगों को क्या मद होगा । इस
प्रकार उस विषय में परम औचित्य का ख्यापन रूप प्रयोजन ‘परिदेवन’ है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि कवि के व्यापार के बल से प्राप्त अर्थ जो लौकिक
एवं स्वाभाविक कारण जहाँ विद्यमान हो वहीं ‘लक्षण’ होता है । यह इन
उदाहरणेों से तथा लक्षणों से व्याख्यात हुआ ।
अष्टादश अध्याय
( भाषा-विधान )
१. शास्त्रों में प्रसिद्ध संस्कृत भाषा के विपरीत प्राकृत भाषा के प्रसंग से
संस्कृत से जिनका रूप विपरीत है तथा जिनका विधान नहीं किया गया है
ऐसे शब्दों के भाग रूप का निरूपण तथा नाट्य के अनुरूप व्यवहार में आने
वाले मारिष आदि नामीसमूह के पठनधर्म क्या प्राकृत में भी संस्कृत जैसे ही
होना चाहिए या अन्यथा, इस विचार या आशंका के कारण प्रसंगतः
कर्तव्य दशरूपकों के स्वरूप का भी निरूपण प्रभावित होता है। इसी प्रकार
पूर्व अध्याय के अन्त में पाठ्य का उपसंहार करने से सम्प्रति 'प्राकृत-पाठ्य'
का विवरण आवश्यक है।
२. अपभ्रंश के विषय में विधान को दर्शाने के लिये—'नाना' इत्यादि
से कहा गया है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है—नाना अर्थात् भिन्न-भिन्न
जो अवस्थाएँ देश विशेष से हैं उनमें आत्मा अर्थात् नियतस्वभाव जिसमे
हो; अर्थात् प्रसिद्धि के कारण जो देशविशेष में नियत की गई हो ऐसी
भाषाएँ। इससे यह भी प्राप्त हुआ कि संस्कृत भाषा के शब्द ही वाचक हैं
अन्य अर्थात् प्राकृत भाषा के जो शब्द हैं वे अनुमानतः वाचक होंगे। इसीलिये
कहा गया है कि अन्यत्वेन प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न-अवस्था शब्द का
यहाँ देशविशेष अर्थ कैसे हुआ। उत्तर—क्योंकि जिसमें लोक निवास करते
हैं अतः देश विशेष अवस्था ही है और फिर देशविशेष में ही लोक निवास भी
होता है।
३. संस्कृत तथा प्राकृत भाषा में प्रातिपदिक शब्द समान होने पर
भी विभक्ति में स्वर के कारण विपर्यास होना आवश्यक रहता है। देशी पद
का भी प्रयोगदशा में स्वरगत सम्बन्ध से ही यहाँ उपयोग किया जाता है अतः
वह भी प्राकृत ही है। अन्य आचार्य के मत में प्राकृत वह है जिसमें व्युत्पन्न
नहीं की गई प्रकृति से प्राप्त तथा अव्युत्पन्न जन से जो शब्द प्रयोज्य है तो
वही प्राकृत। इसके तीन प्रभेद यहाँ उद्देश्य क्रम में दिखलाये हैं।
४-५ जो शब्द संस्कृत तथा प्राकृत में समान है उन्हें दिखलाते हैं—
'कमलामल' इत्यादि से। प्राकृत में विभक्तियों में लिङ्गगत स्वातन्त्र होता है
अतः संस्कृत प्राकृत में ( परस्पर ) भेद रहना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा
कि—'संस्कृतेष्वपि' अर्थात् संस्कृत भाषा भी योग को प्राप्त करती है।
५०० नाट्यशास्त्र
भाषा-श्लेष तथा पताका-स्थानक आदि में इनके प्रयोग कहे गये हैं। यहाँ अपि
शब्द से यह भी कहा गया है कि प्राकृत में प्रयुक्त शब्दों में समास होने पर
उन शब्दों में संस्कृत की समानता नहीं होती जैसे कमल, अमल, इन्द्र
इत्यादि में ।
६-७. अब विभ्रष्ट को—‘ये वर्णः’ इत्यादि से दिखलाते हैं तथा पुनः
इसी को आगे—‘एओआर’ इत्यादि कारिका से भी दिखलाते हैं ।
१७. अपरस्पर निष्पन्नाः = एक दूसरे से संश्लिष्ट नहीं होने वाले अर्थात्
असंयोग वाले या असंयोगरूप वर्ण । अब जहाँ वर्ण संयुक्त हैं उनके विषय में
( संयुक्तानाम् ) भी ।
१८. संयुक्त वर्णों के क्रमशः उदाहरण देते हैं—‘ऋप्सत्सथ्याः’ इत्यादि
से । ‘वच्छों’ में वत्स के त्स को छ हो जाता है ।
२२-२३. ब्रह्मा शब्द में म प्रथम और ह बाद में आ गया तथा ‘ब्र’ का
अन्तर्वर्ती रेफ का लोप हो गया है । इसी प्रकार रेफ का सर्वत्र लोप हो
जाता है वह चाहे ऊपर हो या नीचे—जैसे शक्र तथा अर्क में या कभी दोनों
में जैसे ‘निह्रदि’ शब्द में है ।
२५-२७. संस्कृत एवं प्राकृत भाषा ही वक्तृभेद से चार प्रकार की हो ,
जाती है—इसको दिखलाते हैं—‘भाषा’ इत्यादि से । संस्कृतभाषा ही संस्कृत
है । इसमें स्वरभेद आदि समस्त संस्कार प्राप्त होने से यह ‘संस्कृत’ कहलाती
है । भाषाओं के भेद में इसे बतलाने का आशय यही है कि यह भाषा वह है
जिसमें वैदिक शब्दों का बाहुल्य है परन्तु जो आर्यभाषा से विलक्षण है । •
२८-२६. ‘म्लेच्छशब्दोपचारा’ में उपचार पद का अर्थ है व्यवहार ।
पशुपक्षी आदि के शब्दों को भी नाट्य में किसी प्रयोग के अवसर पर सुनाना
संभावित है । एतदर्थ कहते हैं—‘नाट्यधर्मी’ इत्यादि से ।
३२. कारणव्यपदेशेन = अर्थात् किसी कारण के बहाने से या अवस्था आदि
के वश होकर ।
३२. ऐश्वर्येण प्रमत्त पद के द्वारा यहाँ वेदशास्त्रादि के अध्ययन से हीन
हो जाने की स्थिति संकेतित की गयी है ।
५६-६०. गङ्गासागरमध्य—पद से पूर्व दिशा के देशों के निवासी जन
को दिखलाया गया है । विन्ध्यसागरपद से दक्षिण सौराष्ट्र का ग्रहण किया
गया है । सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु से पश्चिम सौराष्ट्र तथा वेत्रवती ( बेतवा )
नदी से उत्तरवर्त्ती प्रदेश में स्थित प्रदेश को यहाँ लिया जाता है ।
एकोनविंश अध्याय
( सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जन )
१. वाक्यविधानं तु—यहाँ 'वाक्यविधानं' पद से भाषा को लिया
जाता है क्योंकि भाषा वाक्य के आश्रित होती है तथा वाक्य का प्रयोग किसी
संवाद के ही लिये नाट्य में किया जाता है। इस प्रकार वाक्य तथा भाषा में
अन्योन्य-रूपता का आनयन किया जाता है तथा इसी आशय से वाक्यग्रहण
पद विधान भी हो जाता है।
३. देवानां देवाः—अर्थात् जो देवताओं से स्तुत्य हैं या उनके भी आदर-
पात्र हैं। तथा-पद से यदि स्त्री हो तो उन्हें 'भगवती' पद से सम्बोधित करना
चाहिए।
४-६. नानाश्रुतधराः अर्थात् जो बहुश्रुत हैं। क्षाम्यम् = इस कथन को
स्वीकार किया जाए।
७-८. सचिव = मन्त्री, राजा का सहायक एवं परामर्शदाता। सपरि-
वारम् = आशय यही है कि हीन पात्र जब राजा को सम्बोधित करें तो
अपना नाम लेकर करें तथा उत्तमपात्र सम्बोध्य का भी नाम लेवे।
१३. कर्म अर्थात् कार्य जैसे पाकादि का विज्ञाता या व्यवसायी। विद्या =
त्रयी आदि वेदविद्या। जाति = गोत्र अथवा देश।
१५. शाक्य = बौद्धभिक्षु। निर्ग्रन्थ = क्षपणक। पाषण्ड = पाशुपत सम्प्रदाय
के साधु। स्वसमय = जैसे पाशुपतों के अपने आचारानुसार भासर्वज्ञ इत्यादि
पद से किये गये सम्बोधन।
१६. यौवन में पति को स्त्रियाँ आर्यपुत्र कह कर सम्भाषण करें परन्तु
यौवन से भिन्न दशा में श्वसुर के वंश या उसमें अपत्यप्रत्यय के साथ ही
शब्दप्रयोग किया जाए। जैसे—हे महाराज। यहाँ यौवनपद का आशय है कि
शृङ्गार के उपयुक्त स्थिति में ही।
२२. स्थानीया = पूज्य तथा अवस्था में जो थोड़ी भी बड़ी हों, ऐसी
पारिवारिक स्त्रियाँ।
२६. पत्नी को भार्या शब्द से सम्बोधित करे। इसी कारण नाट्यवेद के
महासत्र में दीक्षित सूत्रधार अपनी नटी पत्नी को 'आर्ये' कह कर बुलाता
५०२ नाट्यशास्त्र
भी है या पिता के नाम से भी—'जैसे 'हे माठरपुत्रि; इत्यादि, या पुत्र के
नाम से भी—जैसे—'हे सोमशर्मजननि इत्यादि ।
२६. पुरोहित आदि उत्तम पात्र भी राजा की तरह भार्या को 'आर्ये'
पद से सम्बोधित करें, परन्तु यौवनावस्था में ।
३०. औत्पत्तिकानि = स्वकल्पित अतएव जो अप्रख्यात है । तल्लिङ्गा-
र्थानि = प्रकृत अर्थ की सूचना करने वाले ।
३१. इसी को निदर्शन के द्वारा स्पष्ट करते हैं—'ब्रह्मक्षत्रस्य' इत्यादि से ।
प्रश्न—नाम तो संज्ञा मात्र होता है उसे जैसा चाहे रख सकते हैं । उत्तर—
नाम के अनुरूप कर्म होना चाहिए अतः नाम रखते समय कर्म का भी ध्यान
रखना चाहिए । नाम का अक्षर ग्रहों के अभिचार एवं यन्त्र, मन्त्र एवं तन्त्र
के अनुसार अनुष्ठित कर्मादि के द्वारा होता है अतः जब पीड़ित हो जाते हैं
तो उनका इन्हीं से शान्तिक या पौष्टिक कर्म द्वारा उपचार भी किया जाता
है तथा पुरुष को फल प्राप्ति भी अपने नाम के अनुरूप ही होती है ।
३७. नट स्वयं कवि भी होता है तथा कवित्व युक्त भी । इसी अभिप्राय
को ध्यान में रख कर भाषाविधान को समझकर पाठ्य के प्रयोग का विधान
बतलाया गया है अर्थात् परिज्ञान पूर्वक काव्य का निर्माण हो तथा अवसर
आने पर पाठ्य का प्रयोग भी रहे । यदि अन्य कवि हो तो पाठ्य की संज्ञा
प्रयोग का मूलभूत तत्त्व हो जाता है। अतः तदनुसार ही प्रयोक्ताओं को
इसका व्यवहार समझ कर करना चाहिए । षडलङ्कार हैं—( १ ) स्वर,
( २ ) स्थान, ( ३ ) वर्ण, ( ४ ) काकु, ( ५ ) अलंकार तथा ( ६ ) अङ्ग ।
इनसे भूषित काव्य ही पाठ्य कहलाता है ।
पाठ्य स्वर आदि छः अलंकारों के अधीन होता है अतः पाठ्य के गुणों
को बतलाने की बात कही गयी है । गुण अर्थात् जो उपकारक है तथा जिनसे
काव्य उपकृत होकर पाठ्य होता है ।
अब गुणों का उद्देशक्रम से व्याख्यान करते हैं—'तत्र' इत्यादि से । इनमें
प्रथम स्वर है जिसके विषय में जो भी वक्तव्य है वह आगे गेयाधिकार प्रकरण
में ( ना० शा० अध्याय २८ में ) दिखलाया जाएगा । स्वर ही काकु में भी
उपयोगी होता है तथा स्थानादि उसके 'परिकर होते हैं। यहाँ स्थान शब्द
के द्वारा काकुओं के अपने रूप की निष्पत्ति हेतु आश्रय दिखलाया गया है ।
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित नाम से शास्त्र में स्वर प्रसिद्ध हैं,
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०३
इनमें जो अनुरणनमय रक्ति या अनुरंजना की प्रक्रिया है उसे छोड़ देना चाहिए
( क्योंकि वह गीत में रहेगी ) । इसे छोड़ कर शेष जो केवल उच्च, नीच तथा
मध्यवर्ती स्थान का स्पर्श होता है वही पाठ्य में उपयोगी है। यदि पाठ्य में
स्वरगत रक्ति का प्रधानतः आश्रय लेगें तो फिर यह गानक्रिया होगी पाठ्य
नहीं। यहाँ गान क्रिया में उच्च आदि स्थानों का स्पर्श ही प्रधान है इसी
बात को प्रकृत में वर्णों का उपादान कर बतलाया गया है ।
॰ चित्तवृत्ति के समर्पण द्वारा अभिनय क्रिया की अनुभावरूपता के लाभ के
लिये रसों के भेद से काकुविधान रखा जाता है। इसी कारण काकुओं का
सर्वत्र अनुगत रूप होता है जिसका स्वर की अतिशयिता में उपयोग ( किया
जाता ) है। इसका आगे भी मुनि ने काकुशब्द के द्वारा उच्च, दीप्त आदि
अलङ्कारों में व्यवहार बतलाया है क्योंकि पूर्णता को प्राप्त अलङ्कार आदि
काकुओं के ही उपकारक या सम्पादक होंगे। क्योंकि काकु अर्थों में अभि-
नेयता लाता है अतः काकु ही प्रधान होता है। अन्यथा यदि काकु प्रधान
नहीं होता तो जिसका अंगों के मध्य पाठ किया गया उस मध्यगत अंग का
उपसंहार और अन्य अंगों का निरूपण आदि सभी असमञ्जस हो जाता । इस
कारण प्रकृत में पाठ्य में काकु ही प्रधान होता है यही सिद्धान्त मान्य है।
अब इन स्वरों के आश्रम को दिखलाते हैं—त्रीणि स्थानानि के द्वारा ।
यहाँ यह ध्यातव्य है कि स्वर किसी स्थान विशेष से ही उद्भूत होते हैं अतः स्वर
ग्रहण से ही स्थान भेद प्राप्त हो जाएगा पुनः स्थान का ग्रहण क्यों किया गया ?
इसका उत्तर यही है कि यहाँ स्थानपद का ग्रहण ६६ प्रकार के स्थान भेदों की
निवृत्ति करने के लिये है। ये छाछठ ( ६६ ) प्रकार किस प्रकार ?—उत्तर—
उरः प्रदेश में २२—जहाँ श्रुतियाँ तथा स्वर हैं। इसी प्रकार कण्ठ तथा मूर्धा
में होकर ये छाछठ ( २२ × ३ = ६६ ) हो जाते हैं। इन स्थानों के स्पर्श होने
पर गान ही होता है पाठ्य नहीं। इसीलिये पाठ्यगुणान् पद में पाठ्य को गुण
अर्थात् उपकरण वाचक मान कर व्याख्यान किया जाता है।
“शारीर्यामथ वीणायाम्” इत्यादि। वीणा दो प्रकार की होती है जिनमें
एक शरीर रूपी वीणा है जिसमें उरः, शिर तथा कण्ठ स्थान हैं। यह वीणा
बिम्ब स्थानीय होती है। दूसरी वीणा तुम्बी घटिता है। दण्डरूपा वीणा बाह्य
वीणा है तथा यह प्रतिबिम्ब स्थानीया है। इस बाह्य वीणा में काकु की सम्पत्ति
विद्यमान होती है जो रंजनात्मक स्वर स्वरूप है। शारीरी के साथ वीणा
शब्द के कहने का आशय यही है कि यह शरीर के मध्य में विवृत हृदयाकाश
के परिग्रहण हेतु है। क्योंकि बिना आकाश के शरीर मात्र में स्वर की निष्पत्ति
नहीं हो सकती, वह यदि होगी तो उस आकाश में ही होगी।
दूसरी जो दण्ड वीणा (तुम्बी घटिता) हैं, वह उत्तरोत्तर चिह्नित स्थान
से विशिष्ट रहकर बाह्य वीणा कहलाती है तथा इसमें भी स्वरों के निष्पत्ति
स्थान होते हैं। शारीरी वीणा में, उरः, कण्ठ तथा शिरः ये तीन स्थान (नियत)
हैं। इसी प्रकार बाह्य वीणा में भी तारों के स्थान बने हैं, वे इसमें सोपान
पंक्ति की तरह क्रमिक हैं। अतएव इनसे काकुस्वर लक्षित होता है तथा इसी
के आधार पर इसका लक्षण हुआ है। काकु जिह्वा के व्यापार से सम्पाद्य
होने से यह 'काकु' कहलाती है।
४१. इस प्रकार इन तीनों स्थानों के रूपों का विभाग कर उनका विषयभेद
दिखलाने के लिये बतलाते हैं—'आभाषणञ्च' इत्यादि के द्वारा। शिरसा =
शिरो निष्पन्न तार से। इसका उपयोग दूरस्थ संभाषण में किया जाता है।
कण्ठेन = मध्यनाद से। इसका उपयोग नातिदूर स्थल के सम्भाषण में होता
है। उरसा = मन्द्र नाद से। इसका उपयोग समीप के सम्भाषण में किया
जाता है।
४२-४३. इस प्रकार इन तीन स्थानों का पृथक् २ उपयोग दिखला कर
अब इन्हीं का एक साथ उपयोग भी दिखलाते हैं—'उरसोदाहृतम्' इत्यादि के
द्वारा। इसका आशय यही है कि पाठ्य का आरम्भ मन्द्र स्वर से करते हुए उसे
तार स्वर तक ले जाकर फिर मन्द्र पर समाप्त कर देना चाहिए। जब न तो
दीप्त रूप क्रोधादि भाव से और न मन्द्र शोकादि से हृदय आविष्ट रहे तो
वक्तव्य वस्तु के विषय गत उत्साह के विस्फारण (व्यक्ति) से स्वर को तार
तक ले जाकर उपसंहार के समय मध्य में विश्राम करे, यही सामान्यतः पाठ्य
का धर्म या विधान होता है।
४३. स्थान भेद को दिखला कर अब वर्णों के स्वरूप को दिखलाते हैं—
'उदात्तश्च' इत्यादि से। उच्च, नीच तथा मध्यम एवं उच्च, नीच रूप अवलम्बन
से स्वरों के चार धर्म हो जाते हैं। पाठ विशेष की क्रिया का विस्तार करने
वाले वर्ण 'गुण' होते हैं अथवा स्वार्थ विशेष को विवृत या प्रकटन करने वाले
वर्ण 'गुण' हैं। यहाँ तपोधनाः (कहने) सम्बोधन का आशय यह है कि आप
सूक्ष्मवेदी है अतः इस विषय के विचार के अधिकारी हैं।
अब गद्य भाग द्वारा वर्णों के विषय दिखलाते हैं—'हास्यशृङ्गारयोः'
इत्यादि से। हास्य तथा शृङ्गाररस में मध्यम तथा पञ्चम इत्यादि रूप में जिस
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०५
क्रम से पाठ है उसी रूप में योजना अभीष्ट नहीं है। अतः हास्य में मध्यमा या
पञ्चमी जाति के स्वरों का ग्रहण कर उसी अवसर पर उच्च मध्यम स्थान का
स्पर्श कर पाठ किया जाता है। इसी प्रकार शृङ्गार, हास्य तथा वीर इन तीनों
में षड्जा तथा आर्षभी के अंश को लेकर उसी में उदात्त एवं कम्पित वर्णों से
पाठ किया जाता है। बीभत्स में धैवती के अंश स्वर का आश्रम लेकर स्वरित
वर्ण से पाठ किया जाए, भयानक में उसी धैवतीयांश स्वर का आश्रय लेकर
कम्पित वर्णों से पाठ होता है। इस प्रकार आगे की जातियों के विनियोग के
अनुसारी स्वरों के अनुवाद द्वारा उदात्तादि वर्णों में न कि स्वरों में तात्पर्य
लिया जाए क्योंकि उनका अन्तरालाप ग्रहण ही प्रयोजन है।
४४. इस प्रकार काकु की उत्पत्ति का प्रतिपादन कर उसके अर्थ के विषय
में व्यापार दिखलाते हुए उद्देश्य क्रम का अनुसरण कर उसके प्रभेद दिखलाते
है—'द्विविधा काकु' इत्यादि के द्वारा। वाक्य जहाँ साकाङ्क्ष है वहाँ
साकाङ्क्ष काकु होगी। वक्तृगत आकाङ्क्षा का वाक्य में उपचार रहता है।
उस आकाङ्क्षा का निश्चय प्रकरणादि के बल से तथा आकांक्षा की विशिष्ट-
विषयता का अवगम प्रकरण के बल से होता है। यही बात यहाँ कारिका के
द्वारा कही गयी है। 'अनियुक्तार्थकं वाक्यम्' में इसी अंश को बतलाया है।
वाक्य के सङ्केत-बल के आधार पर जैसा न्यून या अधिक अर्थ प्रतीत हो वैसा
ही प्रमाण बल से निर्णय के योग्य वाक्य हो तो वह निराकांक्ष तथा इसके
विपरीत अर्थवाला हो तो साकाङ्क्ष वाक्य होगा।
वाक्य में स्थित काकु का अब आगे अभिधान करते हैं—'तत्र साकाङ्क्षम्'
इत्यादि गद्य भाग से। जिसका अर्थ नियुक्त नहीं होता वह अनियुक्तार्थ है जिसे
साकाङ्क्ष बतलाया गया है—उसकी मन्द्र स्वर से उपक्रम कर तार स्वर से
समाप्ति करते हुए पाठ किया जाता है। यहाँ ( सब ) क्रिया विशेषण कितने
आते है—इसे भी बतलाने के लिये कहते हैं कि कण्ठ एवं उरः स्थान में हैं।
उदात्तादि वर्ण उच्च, नीच, दीप्त आदि अलंकार जहाँ अपरिसमाप्त दशा में
( अर्धस्पष्ट रूप में ) छोड़ना क्रिया विशेषण है तथा इस क्रियाविशेषण के
रूप में पठ्यमान वाक्य में ध्वनिगत धर्मविशेष या विकार विशेष ( ही )
काकु है। यह काकु आकांक्षा के अन्त में या अर्थ की परिसमाप्ति पर अथवा
उस अर्थ में नहीं अथवा अर्थ विशेष में रहती है अथवा विशेषार्थ के न होने
पर भी होती है। अतः कोई निश्चय नहीं होने से इसके ( काकु के ) अनेक
स्थल होते हैं।
५०६ नाट्यशास्त्र
४५. जो अलं अर्थात् पर्याप्त रूप में काकु के स्वरूप का सम्पादन करता
है वह 'अलङ्कार' है। तीनों स्थानों में प्रत्येक की ऊर्ध्व, अधः तथा मध्य की
कल्पना के द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित के निर्वाह के द्वारा
इसका स्वरूप निष्पन्न होता है। इनमें आवेश के अभाव के कारण सभी स्थानों
में मध्यम भाग में यह विद्यमान होता है किन्तु ऊर्ध्व तथा अधः भाग में यह
आवेश की स्थिति या भाव में होता है। इस प्रकार तीनों स्थानों में प्रत्येक
का अवलम्बन करने से छः अलङ्कार बन जाते हैं।
गद्यभाग—उच्चो नाम इत्यादि। इनमें शिर के अधोभाग में दूरस्थ व्यक्ति
के साथ भाषण करने में 'तार' बतलाया गया है जो स्वर काकु का विषय
है। विस्मय के ज्ञान होने पर वही रस काकु तथा दूसरों को भयभीत करने
पर वही अभिनय से विभाव काकु हो जाता है। स्वर काकु से ही श्रुति काकु
होता है जो भिन्न होता है। यह श्रुति काकु आक्षेप के अवसर पर ऊर्ध्व अर्थात्
तारतम होता है जिसका होता स्थान शिर ही है। यहाँ तार शब्द प्रकर्ष का
उपलक्षण है। इन आक्षेपादि में अवस्थाओं के अनुसार श्रुति, विभाव एवं रस
भेद से तीन रूप में काकुओं का विभाग हो जाता है। जो उर के ऊर्ध्वभाग
में है वह मन्द्र है तथा उसी उरः के नीचे भाग में अत्यन्त मन्द्र नीच काकु है।
दीनता की अवस्था में वही काकु दो रूपों को ग्रहण करती है। अपनी चित्त-
वृत्ति के अर्पण करने से रस काकु तथा पररूप में उत्पादन करने पर विभाव
काकु होती है। यहाँ प्रधानतया दोनों का आदर किया गया है और स्थानों से
इन दोनों का आदर नहीं किया जाता किन्तु जो प्रधान है उसी के अंश का
व्यपदेश होता है। स्वाभाविक भाषण वहाँ होता है जहाँ वक्ता आवृत्त-कंठ
स्वर वाला हो। आवृत्तकण्ठ स्वर का अर्थ है संवृत स्वर से युक्त कंठ वाला
व्यक्ति। त्रास के भय से गिर जाने वाला त्रस्त पतित। त्रास के समय काकु
दीप्त ही होती है। कण्ठ स्थान में ऊर्ध्व भाग निष्पन्न होती है, इससे स्पष्टतः
सिद्ध है कि स्थान भेद ही अलङ्कारता का प्रयोजक है।
५६. अब सभी का संग्रह कर कहते हैं—'यानि सौम्यार्थ' इत्यादि से।
सौम्य = जो सोम की तरह आह्लादक हो। सुखभाव = यहाँ सुख के हेतु
तथा कार्य दोनों का सुखभावकृत् शब्द से समासभेद से संग्रह किया गया है।
५७. नाना—नाना आश्रयों से उपेत अर्थात् युक्त का अनेक स्थानों में
निवेश करते हुए पाठ्य का प्रयोग या विधान रखना चाहिए। काकुओं को
पर्याप्त या परिसीमित करने में कारण होता है उनके आश्रयों या स्थानों
का भेद।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०७
अङ्गानि इत्यादि के द्वारा काकु की ही प्रधानता है इसका उपसंहार
करते हैं—‘अथाङ्गानि’ इत्यादि गद्यभाग से । वाक्य का जो न्यास, त्यजन या
अनादरण है वह नाद का ही है । अतः भाव एवं अभाव, उपचय तथा अपचय
और आरोह तथा अवरोह इनके कारण नाद छः प्रकार हो जाता है । स्वर के
रूप में विहित अन्तराल विशिष्ट श्रुतियों में जो वैस्वर्य है, वह ध्वनिगत
विसंवाद से होता है यह ( ऐसे स्थानों पर ) सर्वत्र समझना चाहिए ।
शृङ्गार में ( जो ) उदात्त एवं स्वरित को अर्पण एवं विच्छेद आदि अङ्गों
को तथा विलम्बित को अलङ्कार कहा गया वह दूरस्थ पुरुष के साथ आभाषण
में कर्तव्य है । शिरः स्थान में षड्ज या पञ्चम में से किसी एक के स्थायी स्वर
के आश्रय के द्वारा अंश स्वर के विभाग से चार चार को मिला कर किया
जाता है । यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो फिर दूरस्थ के साथ आभाषण आदि
सभी कथन पुनरुक्त हो जाएगा । दीपन तथा प्रशमन के विषय में यह विधि है
कि मन्द्र करने के बाद तार नहीं किया जाता है, इसी प्रकार मन्द्रतार से तार
तर को और तारतर से मन्द्र को भी नहीं करना चाहिए ।
समग्रतः काल-तत्त्व की भावना अशक्य है अतः उद्देश्य ग्रन्थ से ही लय और
विराम कहे जाते हैं तथा जिनमें उद्देश्य कुछ भी नहीं होता । विच्छेद से लय
को स्वीकार किया गया है । विच्छेद का अर्थ है विराम । यह विराम कितने
समय वाला हो इसी प्रश्न से लय भी मान लिया जाएगा । इस प्रकार यह
विच्छेद की भी परीक्षा हो गयी ।
अर्थ की समाप्ति के लिये विराम किया जाता है । अर्थ = अवान्तर वाक्य
का अर्थ । केवल छन्द की अपेक्षा से विराम नहीं किया जाता क्योंकि कवि
प्रयोग के अधीन ( परतन्त्र ) रहता है और जब कवि ( ही ) परतन्त्र है
तो फिर उसे विराम वाले छन्दों में विराम के लिये प्रयत्न करना ( ही )
चाहिए । प्रयोग कवि के आधीन नहीं है इसीलिये कहा भी गया कि विराम
अर्थ की अपेक्षा या अधीनता के कारण किये जाते हैं । एक, दो या तीन आदि
संख्याओं का यहाँ जो निर्देश किया गया है वह ( इसी ) नियम का उपलक्षण
समझना चाहिये । जैसे :—‘किं गच्छ’ इत्यादि पद्य में है ।
प्रश्न—अवान्तर वाक्य के अर्थ में विराम का विधान है तो फिर एक
वाक्यता न रखना ( या मीमांसाशास्त्र के अनुसार वाक्यभेद करना ) दूषण
होता है । उत्तर—कभी-कभी एकवाक्यताभाव दूषण नहीं भूषण भी हो जाता
५०८ नाट्यशास्त्र
है। इसके उपपादन में यही कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की सूचना
देने में या अंकुरगत अर्थ (मूलभूत अर्थ) को कहने में उपचार में अल्पाक्षर
वाले पद की काव्य में (या पद्य में) स्थिति रहनी चाहिये। काव्य अनेक
विध सूचाभिनय तथा अंकुर के प्रकारों से युक्त होता है यदि यही स्वल्पाक्षर
वाले असमस्त पद वाला भी हो तो। क्योंकि अनेक या बहुअक्षर वाले पदों के
बीच सूचा तथा अंकुर की उपपत्ति नहीं होती है।
६१. विराम के होने पर (ही) अभिनयस्थ पदार्थ को विषयानुरूप प्रयोग
में दिखलाया जा सकता है, वह पदार्थ विराम से अवगत होता है तथा कार्य
की अवधि या समाप्ति में विराम रखना होता है। तब समापनीय पदार्थ का
स्वरूप उसकी विरामावस्था में प्रतीत हो जाता है इसीलिये कहा गया है कि
विराम होने पर अभिनय अर्थ को दर्शाता है तथा विराम के अभाव में यही
असमञ्जस हो सकता है या यही कि अभिनय के अर्थ का वहन विराम ही
करता है।
६२-६६. इसी तथ्य को बतलाते हैं—‘यत्र व्यग्रा’ इत्यादि से भी। इस
प्रकार इसी बात को पहिले दृष्टि की प्रमुखता के तात्पर्य से बतलायी थी अब
यहाँ दृष्टि समन्वित हस्तों की प्रधानता से बतलाने से पुनरुक्ति नहीं होती
है। इसी की व्यापकता को दिखलाई है ‘प्रायः वीर, रौद्र आदि में करना
चाहिये’ इत्यादि कथनों से। कुञ्चितौ = संकोच युक्त। अलङ्कार यहाँ उच्च,
दीप्त इत्यादि होंगे जिन्हें वृत्त के विराम स्थल में रखना चाहिए। जैसे—
‘यो यः शस्त्रं बिभर्त्ति (वे० सं० ३।) में है भी।
उच्च दीप्त ‘काकु’ को पद के अन्त में नहीं रखा जाए। वीर तथा रौद्र
रस में भी स्रग्धरा प्रभृति लम्बे वृत्तों में अर्ध या आदि में विराम नहीं रखना
चाहिए किन्तु पद के अन्त में ही। जैसा कि कहा भी है—‘प्राणवशेन वा’।
अर्थात् आरम्भ में आधे में प्रायः प्राण वायु का संवेग नहीं होता। आशय यही
कि पद के अन्त में ही विच्छेद किया जाए। अथवा ‘प्राणवशेन में’ प्राणशब्द का
अर्थ है रस भावादि। अतः रस एवं भावादि के औचित्य से यहाँ विच्छेद किया
जा सकता है तथा यह विच्छेद पाद का आरम्भक या आदि में भी हो सकता
है। इससे यह भी दिखलाया गया है कि अनुबन्ध (आरम्भ) भी विच्छेद
में उपयोगी होता है। ‘शेषम्’ इत्यादि। जहाँ चित्तवृत्ति की प्रधानता नहीं
हो किन्तु विभावादि की हो तो वहाँ अर्थ के अनुरोध पर विराम रखे जाते
हैं। क्लृप्ताक्षर अर्थात् सन्ध्यक्षर। कला के प्रमाण वाला जो काल है तदनुसार
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०९
विलम्बित लय से पाठ करना चाहिए। इस प्रकार विच्छेद ही प्रमाण है,
यह तथ्य दिखलाया गया।
७०-७१. शेषाणाम्—इत्यादि। यहाँ शेषाणाम् का अर्थ है ह्रस्व अक्षरों
का। अर्थयोगेन पद से का आशय है कि जैसे अर्थ की स्फुट प्रतीति हो उसी
प्रकार विच्छेद करना चाहिये न कि अतिविलम्बित लय से पाठ करे। इस
पर यहाँ प्रश्न होता है कि कला का प्रमाण कितना रहे ? तो इसके उत्तर में
यही समझना चाहिए कि विलम्बित एक, दो, तीन, चार तथा पाँच कलाओं
तक ( का ) रहता है। गुर्वक्षर अर्थात् कृप्याक्षर।
७२. अथवा में वा शब्द से अधिक के लिये भी सहमति या अनुज्ञा देने
का संकेत किया गया है। कारणोपेतम् में कारण का अर्थ है चिन्तन आदि से
दीर्घकाल तक स्मरण होना।
७३. वृत्तविराम से अर्थविराम प्राथमिकता पाता है यही बात 'ये
विरामाः' इत्यादि से दिखलाते है। तज्ज्ञैः में तत् पद का अर्थ है विरामात्मक
वृत्तगत पदार्थ। उत्क्रम्यापि का आशय है कि यद्यपि उपक्रम विशेष का
था किन्तु उपसंहार सामान्य में है। अतएव इस प्रकार विराम को पढ़ा जाए
कि जिससे विवक्षित अर्थ की प्रतीति हो सके।
७४-७५. भिन्नवृत्तम् इत्यादि। वृत्त को तोड़कर नहीं पढ़ना चाहिए।
ऐसा विच्छेद न करे कि जिससे प्रकृत में कोई दूसरा ही वृत्त प्रतीत होने लगे
जिससे भ्रान्ति उत्पन्न हो। अपशब्द एवं भिन्नवृत्त दोषों के कहने से पुनरुक्ति
नहीं समझना चाहिए क्योंकि वस्तुतः उसके अभाव में भी विच्छेद के वश से
उसकी प्रतीति हो जाती है। इसीलिये यह कहा गया कि जहाँ विराम का
स्थल नहीं हो वहाँ विश्राम नहीं किया जाता है। विराम की इस प्रकार
व्यापकता बतलाकर न्यूना या दीप्ता को दिखलाने के लिए कहा कि—'दीन
स्थिति में काकु को दीप्त न करे'। इससे यहाँ बतलाया गया कि शोकादि में
मग्न चित्तवृत्ति को छोड़कर अन्य प्रसंगों में सर्वत्र काकु का दीपन शोभाधायक
होता है।
इस प्रकार स्वर, उसके तीन स्थान या आश्रय, उनके उपयोगी उदात्त
आदि वर्ण एवं उनके स्वरूप, स्वरूप के पूर्ति कारण अलङ्कार और इतिकर्तव्यता
रूप सभी अंगों को यहाँ कहा गया। (यह ध्यान रहे कि) स्वरभेद से काकु
का भेद होता है। स्वरभेद तब होगा जब काकु की विवक्षा होगी और जब
उसी काकु की विवक्षा करेंगे तो रस, भाव आदि धर्मान्तरों की उत्पत्ति या
५१० नाट्यशास्त्र
उदय भी होगा। स्वरों के स्थानों का भेद अलङ्कारों एवं अङ्गों के कारण
नहीं होता है। यहाँ 'वर्जितं काव्यदोषैः' पदों से यह भी दिखलाया कि पूर्व
अध्याय के विवरण से इस अध्याय के अर्थ की संगति है।
७६. इस कारिका से-संस्कृत भाषा के लिये दिखलाये गये काकुविधान
का प्रकृत अध्याय के पूर्व प्रतिपादित प्राकृत भाषा में भी अतिदेश है—यह
दिखलाया गया है।
७७. प्रकृत अध्याय के अर्थ का उपसंहार करते हुए यहाँ अग्रिम अध्याय के
अर्थ का सूत्रपात—'दशरूप' इत्यादि से किया गया है। वक्ष्यमाण या अग्रिम
अध्याय में जिनका विवरण दिया जा रहा है उन दशरूपकों के विधान में
जो उपयुक्त पाठ्य ( कहने योग्य या संवाद ) है उसकी योजना इन्हीं ( प्रकृत
अध्याय में दर्शित ) प्रकारों से की जाए।
७८. यहाँ 'तु' शब्द से व्युत्क्रम की सूचना दी गयी है। इस प्रकार
प्रसङ्ग या क्रमप्राप्त जो काकुविधान नहीं था उसे भी अपेक्षावश बतला दिया
गया है। 'अनुपूर्वशः' का आशय है कि अब जो क्रमप्राप्त दशरूपकों का
विधान विवरण है उसको विभागादि विवरणों के सहित पूर्णतः अगले अध्याय
में कहूँगा ॥ शिवम् ॥
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र के श्री बाबूलाल शुक्ल, शास्त्रि प्रणीत
प्रदीप हिन्दी व्याख्यान की अतिरिक्त टिप्पणियों का
द्वितीय-भाग सम्पूर्ण ॥ शिवम् ॥
परिशिष्ट २
पद्यार्धानुक्रमणिका
पद्य पृष्ठ पद्य पृष्ठ
अ अञ्चितौ कूर्परांसौ तु ७८
अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन् १८३ अश्लिष्ट कपोतश्च ३८
अङ्कच्छेदे तु निर्वृत्तं १८४ अचिन्तयन्त्यभिनव २४१
अकार्यं सहसा कृत्वा ३२२ अज्जुकेति च वक्तव्या ३५५
अङ्कुशग्रहणाक्षाशं १४९ अट्टितश्च पुनर्वाम १२४
अकाराद्याः स्वरा ज्ञेया २०२ अट्टितं शकटास्यञ्च ११५
अक्रोधः क्रोधजननै ३२१ अत ऊर्ध्वं व्याख्यास्ये ८३
अङ्गालङ्कारचेष्टा तु १९८ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि
अङ्गालङ्कारयोज्या तु १९८ ७५, ११४, २६९, ३३४, ३७३
अङ्गकाव्यकृतं हास्यं १५७ अतश्च विपुलाभ्या तु २७१
अङ्गनेपथ्यसत्वानि २०० अतश्च संयुतान् हस्तान् ६४
अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च १९० अतः परं प्रवक्ष्यामि १०, ३४, ४३, ८१,
अङ्गाभिनयमेवादौ ५ ८५, ९४, ११५, १२१, १२७, १६१, २९७,
अङ्गारकारकव्याध ३५४ अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य १७७
अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः ५ अतः परं लक्षयिष्ये १३
अङ्गसौष्ठवसम्पन्नै १११ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा १०३
अङ्गहारविनिष्पन्नं ६ अतिक्रान्तक्रमे चैव ९३
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगात् ४८ अतिक्रान्तं पुनर्वामं ११६, ११७; १२०
अङ्गुल्यः करणं विप्राः ८२ १२०, १२१
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ४९, ६६ अतिक्रान्ता ह्यपक्रान्ता ९७
अङ्गुल्यः संहताः सर्वाः ५५ अतिक्रान्तेन पादेन १४७
अङ्गुल्यः संयुताः वक्राः ६४ अतिक्रान्तैः पदैर्विप्राः १४३
अङ्गुष्ठः कुञ्चितश्चैव ६० अतिक्रान्तं विचित्रञ्च ११५
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः ९२, ९३ अतिवृष्ट्यां सहस्राणि २१६
अग्न्यादिदैवतं प्रोक्तं २२२ अतिपीतं तथा भुक्तं ११४
अघोषा इति ये २०३ अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च १७५
अचञ्चलमकुब्जश्च ११२ अतिभाषार्यभाषा च ३३५
अचञ्चलमनाश्चैव १४४ अतिभाषा तु देवानां ३३४
अचलैर्मधुरैर्गात्रै ११४ अतिवाक्यक्रियोपेतं १९५
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव ९१ अत्तेति गणिकामाता ३५५
अञ्चितापसृतोद्बद्ध ३५ अतोऽधिकाक्षरं छन्दो २१४