नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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भी है या पिता के नाम से भी—'जैसे 'हे माठरपुत्रि; इत्यादि, या पुत्र के
नाम से भी—जैसे—'हे सोमशर्मजननि इत्यादि ।
२६. पुरोहित आदि उत्तम पात्र भी राजा की तरह भार्या को 'आर्ये'
पद से सम्बोधित करें, परन्तु यौवनावस्था में ।
३०. औत्पत्तिकानि = स्वकल्पित अतएव जो अप्रख्यात है । तल्लिङ्गा-
र्थानि = प्रकृत अर्थ की सूचना करने वाले ।
३१. इसी को निदर्शन के द्वारा स्पष्ट करते हैं—'ब्रह्मक्षत्रस्य' इत्यादि से ।
प्रश्न—नाम तो संज्ञा मात्र होता है उसे जैसा चाहे रख सकते हैं । उत्तर—
नाम के अनुरूप कर्म होना चाहिए अतः नाम रखते समय कर्म का भी ध्यान
रखना चाहिए । नाम का अक्षर ग्रहों के अभिचार एवं यन्त्र, मन्त्र एवं तन्त्र
के अनुसार अनुष्ठित कर्मादि के द्वारा होता है अतः जब पीड़ित हो जाते हैं
तो उनका इन्हीं से शान्तिक या पौष्टिक कर्म द्वारा उपचार भी किया जाता
है तथा पुरुष को फल प्राप्ति भी अपने नाम के अनुरूप ही होती है ।
३७. नट स्वयं कवि भी होता है तथा कवित्व युक्त भी । इसी अभिप्राय
को ध्यान में रख कर भाषाविधान को समझकर पाठ्य के प्रयोग का विधान
बतलाया गया है अर्थात् परिज्ञान पूर्वक काव्य का निर्माण हो तथा अवसर
आने पर पाठ्य का प्रयोग भी रहे । यदि अन्य कवि हो तो पाठ्य की संज्ञा
प्रयोग का मूलभूत तत्त्व हो जाता है। अतः तदनुसार ही प्रयोक्ताओं को
इसका व्यवहार समझ कर करना चाहिए । षडलङ्कार हैं—( १ ) स्वर,
( २ ) स्थान, ( ३ ) वर्ण, ( ४ ) काकु, ( ५ ) अलंकार तथा ( ६ ) अङ्ग ।
इनसे भूषित काव्य ही पाठ्य कहलाता है ।
पाठ्य स्वर आदि छः अलंकारों के अधीन होता है अतः पाठ्य के गुणों
को बतलाने की बात कही गयी है । गुण अर्थात् जो उपकारक है तथा जिनसे
काव्य उपकृत होकर पाठ्य होता है ।
अब गुणों का उद्देशक्रम से व्याख्यान करते हैं—'तत्र' इत्यादि से । इनमें
प्रथम स्वर है जिसके विषय में जो भी वक्तव्य है वह आगे गेयाधिकार प्रकरण
में ( ना० शा० अध्याय २८ में ) दिखलाया जाएगा । स्वर ही काकु में भी
उपयोगी होता है तथा स्थानादि उसके 'परिकर होते हैं। यहाँ स्थान शब्द
के द्वारा काकुओं के अपने रूप की निष्पत्ति हेतु आश्रय दिखलाया गया है ।
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित नाम से शास्त्र में स्वर प्रसिद्ध हैं,