नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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उड़ा ले गया हो । नहीं—मेरे सामने साधारण शत्रु तो क्या देवशत्रु राक्षस
भी उसे हरण नहीं कर सकते हैं। वह फिर भी आँखो से वह कैसे एकदम
ओझल हो गयी, यह कैसा व्यवहार है । ]
यहाँ आद्यभाग संशय का उदाहरण है तथा शेष भाग उपपत्ति का है ।
२८. आशी : —अब आशी: को बतलाते हैं—'यथा शास्त्रार्थ' इत्यादि
से । जैसे रत्नावली में—'पादाग्रस्थितया' ( १।१ ) इत्यादि । प्रश्न—यह
आशी: अलंकार लक्षण कैसे हो गया । उत्तर—क्योंकि यहाँ वर्णनीय
स्तुति ही है ।
२९. प्रियवचन : —अब प्रियवचन को बतलाते हैं—'आदौ यत्'
इत्यादि से । जैसे :—
किं वृत्तान्तैः परगृहगतैः किन्तु नाहं समर्थः
तूष्णीं स्थातुं प्रकृतिमुखरो दाक्षिणात्यस्वभावः ।
गेहे गेहे विपणिषु तथा चत्वरे पानगोष्ठ्यां
उन्मत्तेव भ्रमति भवतो वल्लभा हन्त कीर्तिः ॥
[ दूसरों के घर की बात से हमें क्या वास्ता किन्तु मैं चुप रहने में समर्थ
नहीं हूँ, क्योंकि दाक्षिणात्यों का स्वभाव ही है कि वे स्वभाव से ही वाचाल
होते हैं । अच्छा, वह दूसरों के घर की बात क्या है, तो कहता हूँ कि आपकी
वल्लभा कीर्ति घरों, बाजारों, चौराहों और मद्यशाला तक में उन्मत्त हुई सी
घूम रही है । ( अर्थात् आपकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त हो रही है । ]
यहाँ आपकी वल्लभा घूम रही है यह कथन आरम्भ में क्रोध का जनक
होकर भी 'हन्त कीर्तिः' कहने पर हर्ष का भी उत्पादक है, अतः 'प्रियवचन'
है । यहाँ व्याजस्तुति नहीं है क्योंकि जहाँ निन्दा का अंश है वहाँ स्तुति नहीं
है और पूरी तरह से नहीं निन्दा है ।
३०. कपटसङ्घात : —अब कपट-संघात को बतलाते हैं—'छलयुक्त्या'
इत्यादि से । यहाँ छल के प्रयोग या बहाने से वञ्चना करने वाला कथन या
अर्थ को अन्यथा ग्रहण करना कपट है तथा उसका संघात 'लक्षण' बनता है ।
यह कपट वस्तुक्रम से या दैव से या शत्रु के प्रयोग से उद्भूत होता है । इनमें
वस्तुक्रम से उद्भूत जैसे-मालतीमाधव में मकरन्द का मालतीवेषधारण करना ।
दैवोद्भूत जैसे—नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन का शंखचूड को छलना ।
शत्रु के प्रयोग से उद्भूत जैसे छलितराम नाटक में लवणासुर द्वारा प्रेषित
राक्षसों के द्वारा मन्थरा और कैकेयी का वेष धारण कर गर्भवती सीता को
निर्वासित करवाना । इसके अतिरिक्त अन्य भी हैं—जैसे कृत्यारावण के प्रथम