नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके परिग्रहण हेतु है। क्योंकि बिना आकाश के शरीर मात्र में स्वर की निष्पत्ति
नहीं हो सकती, वह यदि होगी तो उस आकाश में ही होगी।
दूसरी जो दण्ड वीणा (तुम्बी घटिता) हैं, वह उत्तरोत्तर चिह्नित स्थान
से विशिष्ट रहकर बाह्य वीणा कहलाती है तथा इसमें भी स्वरों के निष्पत्ति
स्थान होते हैं। शारीरी वीणा में, उरः, कण्ठ तथा शिरः ये तीन स्थान (नियत)
हैं। इसी प्रकार बाह्य वीणा में भी तारों के स्थान बने हैं, वे इसमें सोपान
पंक्ति की तरह क्रमिक हैं। अतएव इनसे काकुस्वर लक्षित होता है तथा इसी
के आधार पर इसका लक्षण हुआ है। काकु जिह्वा के व्यापार से सम्पाद्य
होने से यह 'काकु' कहलाती है।
४१. इस प्रकार इन तीनों स्थानों के रूपों का विभाग कर उनका विषयभेद
दिखलाने के लिये बतलाते हैं—'आभाषणञ्च' इत्यादि के द्वारा। शिरसा =
शिरो निष्पन्न तार से। इसका उपयोग दूरस्थ संभाषण में किया जाता है।
कण्ठेन = मध्यनाद से। इसका उपयोग नातिदूर स्थल के सम्भाषण में होता
है। उरसा = मन्द्र नाद से। इसका उपयोग समीप के सम्भाषण में किया
जाता है।
४२-४३. इस प्रकार इन तीन स्थानों का पृथक् २ उपयोग दिखला कर
अब इन्हीं का एक साथ उपयोग भी दिखलाते हैं—'उरसोदाहृतम्' इत्यादि के
द्वारा। इसका आशय यही है कि पाठ्य का आरम्भ मन्द्र स्वर से करते हुए उसे
तार स्वर तक ले जाकर फिर मन्द्र पर समाप्त कर देना चाहिए। जब न तो
दीप्त रूप क्रोधादि भाव से और न मन्द्र शोकादि से हृदय आविष्ट रहे तो
वक्तव्य वस्तु के विषय गत उत्साह के विस्फारण (व्यक्ति) से स्वर को तार
तक ले जाकर उपसंहार के समय मध्य में विश्राम करे, यही सामान्यतः पाठ्य
का धर्म या विधान होता है।
४३. स्थान भेद को दिखला कर अब वर्णों के स्वरूप को दिखलाते हैं—
'उदात्तश्च' इत्यादि से। उच्च, नीच तथा मध्यम एवं उच्च, नीच रूप अवलम्बन
से स्वरों के चार धर्म हो जाते हैं। पाठ विशेष की क्रिया का विस्तार करने
वाले वर्ण 'गुण' होते हैं अथवा स्वार्थ विशेष को विवृत या प्रकटन करने वाले
वर्ण 'गुण' हैं। यहाँ तपोधनाः (कहने) सम्बोधन का आशय यह है कि आप
सूक्ष्मवेदी है अतः इस विषय के विचार के अधिकारी हैं।
अब गद्य भाग द्वारा वर्णों के विषय दिखलाते हैं—'हास्यशृङ्गारयोः'
इत्यादि से। हास्य तथा शृङ्गाररस में मध्यम तथा पञ्चम इत्यादि रूप में जिस