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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४९८ नाट्यशास्त्र
अर्थात् यह तभी कहा जा सकता है । जब आप कुपित हों जब कि आपके
कुपित होने का कोई अंदेशा ही नहीं है ।
३६. परिदेवन :—अब परिदेवन का स्वरूप बतलाते हैं—‘दोषैर्यदन्य’
इत्यादि से । जैसे बालरामायण में दशरथ के नाम से जो राम को निर्वासन देने
आदि में दोष कहे गये थे उन प्रसिद्ध दोषों का राक्षसों के साथ सम्बन्ध जोड़ना
उचित है, दशरथ के साथ नहीं । ऐसे युक्तियुक्त वाक्यों का प्रयोग करना
‘परिदेवन’ समझना चाहिये । जैसे—नरेन्द्रे वृद्धे स्त्रीवशः यत्नमयशः’ ( राजा
ने बुढ़ापे में स्त्री के वश होकर अयश में अपने को डाल दिया ) इसके
अतिरिक्त किसी प्रयोजन से अन्य के नाम पर अभिहित जो अर्थ है
उनका प्रसिद्ध अर्थों ( दोषों ) के साथ सम्वाद अर्थात् अन्य के मन में स्थित
दोषों का सम्बन्ध बतला देना, जो वस्तुतः किसी अन्य के साथ होना उचित
हो तो ऐसे वाक्यों का कथन भी ‘परिदेवन’ होता है । जैसे इस पद्य में :—
एनां पश्य पुरस्तटीमिह किल क्रीडाकिरातो हरो
गाण्डीवेन किरीटिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः ।
इत्याकर्ण्य कथाऽद्भुतं हिमनिधावद्रौ सुभद्रापते—
र्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दण्डयोर्मण्डनम् ।।
[ इस सामने की तटी को तो देखो, यहाँ कीड़ा के बहाने से किरात
वेषधारी भगवान् शिव के चूडान्तर पर ( मस्तक पर ) अर्जुन ने गाण्डीव
धनुष का बड़े वेग से शक्तिशाली प्रहार किया था । ऐसी सुभद्रापति ( अर्जुन )
के शौर्य की अद्भुत कथा को सुन कर जिसने अपने भुजाओं को मन्द मन्द
मण्डलाकार किया या भुजाओं में मण्डन किया । ]
यहाँ तट के विलोकन के उद्देश्य से जो धनञ्जय का व्यापार बतलाया गया
उसने किसी राजा के मन में दोषों का सम्बन्ध उत्पन्न कर डाला अर्थात् उसे
ईर्ष्या हो गयी कि मेरे मनुष्य होने तथा अर्जुन के भी मनुष्य रहने पर मेरी
अर्जुन के सदृश पराक्रम करने की सामर्थ्य कहाँ ( अर्थात् उससे मैं न्यून हो रहा
हूँ ) । अतएव इस मण्डन से अधिकार स्थित लोगों को क्या मद होगा । इस
प्रकार उस विषय में परम औचित्य का ख्यापन रूप प्रयोजन ‘परिदेवन’ है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि कवि के व्यापार के बल से प्राप्त अर्थ जो लौकिक
एवं स्वाभाविक कारण जहाँ विद्यमान हो वहीं ‘लक्षण’ होता है । यह इन
उदाहरणेों से तथा लक्षणों से व्याख्यात हुआ ।