नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०५
क्रम से पाठ है उसी रूप में योजना अभीष्ट नहीं है। अतः हास्य में मध्यमा या
पञ्चमी जाति के स्वरों का ग्रहण कर उसी अवसर पर उच्च मध्यम स्थान का
स्पर्श कर पाठ किया जाता है। इसी प्रकार शृङ्गार, हास्य तथा वीर इन तीनों
में षड्जा तथा आर्षभी के अंश को लेकर उसी में उदात्त एवं कम्पित वर्णों से
पाठ किया जाता है। बीभत्स में धैवती के अंश स्वर का आश्रम लेकर स्वरित
वर्ण से पाठ किया जाए, भयानक में उसी धैवतीयांश स्वर का आश्रय लेकर
कम्पित वर्णों से पाठ होता है। इस प्रकार आगे की जातियों के विनियोग के
अनुसारी स्वरों के अनुवाद द्वारा उदात्तादि वर्णों में न कि स्वरों में तात्पर्य
लिया जाए क्योंकि उनका अन्तरालाप ग्रहण ही प्रयोजन है।
४४. इस प्रकार काकु की उत्पत्ति का प्रतिपादन कर उसके अर्थ के विषय
में व्यापार दिखलाते हुए उद्देश्य क्रम का अनुसरण कर उसके प्रभेद दिखलाते
है—'द्विविधा काकु' इत्यादि के द्वारा। वाक्य जहाँ साकाङ्क्ष है वहाँ
साकाङ्क्ष काकु होगी। वक्तृगत आकाङ्क्षा का वाक्य में उपचार रहता है।
उस आकाङ्क्षा का निश्चय प्रकरणादि के बल से तथा आकांक्षा की विशिष्ट-
विषयता का अवगम प्रकरण के बल से होता है। यही बात यहाँ कारिका के
द्वारा कही गयी है। 'अनियुक्तार्थकं वाक्यम्' में इसी अंश को बतलाया है।
वाक्य के सङ्केत-बल के आधार पर जैसा न्यून या अधिक अर्थ प्रतीत हो वैसा
ही प्रमाण बल से निर्णय के योग्य वाक्य हो तो वह निराकांक्ष तथा इसके
विपरीत अर्थवाला हो तो साकाङ्क्ष वाक्य होगा।
वाक्य में स्थित काकु का अब आगे अभिधान करते हैं—'तत्र साकाङ्क्षम्'
इत्यादि गद्य भाग से। जिसका अर्थ नियुक्त नहीं होता वह अनियुक्तार्थ है जिसे
साकाङ्क्ष बतलाया गया है—उसकी मन्द्र स्वर से उपक्रम कर तार स्वर से
समाप्ति करते हुए पाठ किया जाता है। यहाँ ( सब ) क्रिया विशेषण कितने
आते है—इसे भी बतलाने के लिये कहते हैं कि कण्ठ एवं उरः स्थान में हैं।
उदात्तादि वर्ण उच्च, नीच, दीप्त आदि अलंकार जहाँ अपरिसमाप्त दशा में
( अर्धस्पष्ट रूप में ) छोड़ना क्रिया विशेषण है तथा इस क्रियाविशेषण के
रूप में पठ्यमान वाक्य में ध्वनिगत धर्मविशेष या विकार विशेष ( ही )
काकु है। यह काकु आकांक्षा के अन्त में या अर्थ की परिसमाप्ति पर अथवा
उस अर्थ में नहीं अथवा अर्थ विशेष में रहती है अथवा विशेषार्थ के न होने
पर भी होती है। अतः कोई निश्चय नहीं होने से इसके ( काकु के ) अनेक
स्थल होते हैं।