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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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५०६ नाट्यशास्त्र

४५. जो अलं अर्थात् पर्याप्त रूप में काकु के स्वरूप का सम्पादन करता
है वह 'अलङ्कार' है। तीनों स्थानों में प्रत्येक की ऊर्ध्व, अधः तथा मध्य की
कल्पना के द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित के निर्वाह के द्वारा
इसका स्वरूप निष्पन्न होता है। इनमें आवेश के अभाव के कारण सभी स्थानों
में मध्यम भाग में यह विद्यमान होता है किन्तु ऊर्ध्व तथा अधः भाग में यह
आवेश की स्थिति या भाव में होता है। इस प्रकार तीनों स्थानों में प्रत्येक
का अवलम्बन करने से छः अलङ्कार बन जाते हैं।
गद्यभाग—उच्चो नाम इत्यादि। इनमें शिर के अधोभाग में दूरस्थ व्यक्ति
के साथ भाषण करने में 'तार' बतलाया गया है जो स्वर काकु का विषय
है। विस्मय के ज्ञान होने पर वही रस काकु तथा दूसरों को भयभीत करने
पर वही अभिनय से विभाव काकु हो जाता है। स्वर काकु से ही श्रुति काकु
होता है जो भिन्न होता है। यह श्रुति काकु आक्षेप के अवसर पर ऊर्ध्व अर्थात्
तारतम होता है जिसका होता स्थान शिर ही है। यहाँ तार शब्द प्रकर्ष का
उपलक्षण है। इन आक्षेपादि में अवस्थाओं के अनुसार श्रुति, विभाव एवं रस
भेद से तीन रूप में काकुओं का विभाग हो जाता है। जो उर के ऊर्ध्वभाग
में है वह मन्द्र है तथा उसी उरः के नीचे भाग में अत्यन्त मन्द्र नीच काकु है।
दीनता की अवस्था में वही काकु दो रूपों को ग्रहण करती है। अपनी चित्त-
वृत्ति के अर्पण करने से रस काकु तथा पररूप में उत्पादन करने पर विभाव
काकु होती है। यहाँ प्रधानतया दोनों का आदर किया गया है और स्थानों से
इन दोनों का आदर नहीं किया जाता किन्तु जो प्रधान है उसी के अंश का
व्यपदेश होता है। स्वाभाविक भाषण वहाँ होता है जहाँ वक्ता आवृत्त-कंठ
स्वर वाला हो। आवृत्तकण्ठ स्वर का अर्थ है संवृत स्वर से युक्त कंठ वाला
व्यक्ति। त्रास के भय से गिर जाने वाला त्रस्त पतित। त्रास के समय काकु
दीप्त ही होती है। कण्ठ स्थान में ऊर्ध्व भाग निष्पन्न होती है, इससे स्पष्टतः
सिद्ध है कि स्थान भेद ही अलङ्कारता का प्रयोजक है।
५६. अब सभी का संग्रह कर कहते हैं—'यानि सौम्यार्थ' इत्यादि से।
सौम्य = जो सोम की तरह आह्लादक हो। सुखभाव = यहाँ सुख के हेतु
तथा कार्य दोनों का सुखभावकृत् शब्द से समासभेद से संग्रह किया गया है।
५७. नाना—नाना आश्रयों से उपेत अर्थात् युक्त का अनेक स्थानों में
निवेश करते हुए पाठ्य का प्रयोग या विधान रखना चाहिए। काकुओं को
पर्याप्त या परिसीमित करने में कारण होता है उनके आश्रयों या स्थानों
का भेद।

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